जनादेश

जब तक जिए शान से जिये चन्द्रशेखर असली समस्या तो बुद्धि है सादगी में मुस्कुराता चेहरा यानी चंद्रशेखर गांव ,गरीब और पेड़ के लिए सत्याग्रह गुजर जाना एक दरख्त का जोमैटो में चीन का निवेश रुका कोई क्यों बनती है आयुषी क्या समय पर हो जाएगा वैक्सीन का ट्रायल हरफनमौला पत्रकार की तलाश काफ़्का और वह बच्ची ! कोरोना ने चर्च भी बंद कराया सरकार अपनी जिम्मेदारियों से क्यों भाग रही है? वसूली का दबाव अलोकतांत्रिक विपक्षी दलों ने कहा ,राजधर्म का पालन हो पुर्तगाल ,गोवा और आजादी कब शुरू हुई बाबाओं की अंधविश्वास फ़ैक्ट्री कोरोना से बाल बाल बचे नीतीश आंदोलनकारी या अतिक्रमणकारी ओली के बाद प्रचंड की भी राह आसान नही खामोश हो गई सितारों को उंगली से नचाने वाली आवाज

अब कैसे बूझे प्यास जब कुंओ पर हो कब्ज़ा

धीरज चतुर्वेद

छतरपुर.सूखा बुंदेलखंड का परिचायक बन चुका है. अच्छी बारिश हो फिर भी सूखे के हालात. इस समस्या के मूल कारणो और स्थाई निदान की योजना से सभी वाकिफ है. जरूरत है ईमानदार पहल की. यही बेईमान के कारण बुंदेलखंड का सूखा निपटाने के लिये आजादी के बाद से अरबो रूपये खर्च हो गये पर सूखा नही मिटा. यहां तक कि यूपीए की सरकार ने बुंदेलखंड विशेष पैकेज आंबटित किया. पैकेज की राशि से बुंदेलखंड का सूखा तो नही निपटा पर नौकरशाही, ठेकेदार और सफेदपोशो के रेैेकेट ने तिजोरियां जरूर गीली कर ली. लाकडाउन में मजदूरो को रोजगार देने के लिये रोजगार मूलक कार्यो को नगरनिकायो के जरिये शुरु करने का निर्णय लिया है. यह वह मौका है जब बुंदेलखंड के परम्परागत जल स्त्रोतो को पुर्नजीवित किया जा सकता हैं. खासकर कुंआ और बाबडियो को जीवनदान देने की पहल हो सकती है जो कचराघर बन मृत हो चुके है या फिर कब्जाये जा चुके है. सुनकर आश्चर्य होगा कि सामाजिक और धार्मिक परम्पंराओ को निभाने के लिये बुंदेलखंड में कुओ की जगह हेंडपंप पूजे जाने लगे है. दर्दीय हालात जीवनदायिनी समझे जाने वाले जलस्त्रोतो के है और सूखे से जूझ रहे बुंदेलखंड के लोगो के. गर्मी के दिन आते ही कई घटनाये सुर्खियां बनती है जो इलाके में जल की कीमत जान से ज्यादा होने को दर्शाती हे. बीते तीन दशकों के दौरान भले ही प्यास बढ़ी हो, लेकिन सरकारी व्यवस्था ने घर में नल या नलकूप का ऐसा प्रकोप बरपाया कि पुरखों की परंपरा के निशान कुएं गुम होने लगे. यह सभी जानते हैं कि बुंदेलखंड की जमीन की गहराई में ग्रेनाईट जैसे कठोर चट्टानों का बसेरा है और इसे चीर कर भूजल निकालना लगभग नामुमकिन. असल में यहां स्थापित अधिकांश हैंडपंप बरसात के सीपेज जल पर टिके हैं जोकि गरमी आते सूखने लगते हैं. छतरपुर जिला मुख्यालय के पुराना महोबा नाके की छोटी तलैया के आसपास अभी सन 90 तक दस से ज्यादा कुएं होते थे. इनमें से एक कुंए पर तो बाकायदा नगरपालिका का पंप था जिससे आसपास के घरों को जल-आपूर्ति होती थी. पुराने नाके के सामने का एक कुआं लगभग दो सौ साल पुराना है. पतली ककैया ईंटों व चूने की लिपाई वाले इस कुएं के पानी का इस्तेमाल पूरा समाज करता था. यहां से निकलने वाले पानी की कोई बूंद बरबाद ना हो, इसलिए इसकी पाल को बाहर की तरफ ढलवां बनाया गया था. साथ ही इसके ‘‘ओने’’ यानी जल निकलने की नाली को एक टैंक से जोडा गया था ताकि इसके पानी से मवेशी अपना गला तर कर सकें. सिद्धगनेशन, कोरियाना मुहल्ला, साहू मुहल्ला आदि के कुओं में सालभर पानी रहता था और समाज सरकार के भरेसे पानी के लिए नहीं बैठता था. यह गाथा अकेले महोबा रेाड की नहीं, शहर के सभी पुराने मुहल्लों की थी- गरीबदास मार्ग, तमराई, शुक्लाना, कड़ा की बरिया, महलों के पीछे, हनुमान टौरिया सभी जगह शानादार कुएं थे, जिनकी सेवा-पूजा समाज करता था. ठीक यही हाल टीकमगढ़,पन्ना और दमोह के थे. प्रााचीन जल संरक्षण व स्थापत्य के बेमिसाल नमूने रहे कुओं को ढकने, उनमें मिट्टी डाल पर बंद करने और उन पर दुकान-मकान बना लेने की रीत सन 90 के बाद तब शुरू हुई जब लोगों को लगने लगा कि पानी, वह भी घर में मुहैया करवाने की जिम्मेदारी सरकार की है और फिर आबादी के बोझ ने जमीन की कीमत प्यास से महंगी कर दी. पुराने महोबा नाके के सामने वाले कुएं की हालत अब ऐसी है कि इसका पानी पीने लायक नही रहा. सनद रहे जब तक कुएं से बालटी डाल कर पानी निकालना जारी रहता है उसका पानी शुद्ध रहता है, जैसे ही पानी ठहर जाता है, उसकी दुर्गति शुरू हो जाती है. यह समझना जरूरी है कि बुंदेलखंड में लघु व स्थानीय परियोजनाएं ही जल संकट से जूझने में समर्थ हैं. चूंकि बुंदेलखंड में पर्यावास तथा उसके बीच के कुएं ताल-तलैयों के ईदगिर्द ही बसती रही हैं, ऐसे में कुएं , तालाबों से पानी का लेन-देन कर धरती के जल-स्तर को सहेजने, मिट्टी की नमी बनाए रखने जैसे कार्य भी करते हैं. छतरपुर शहर में अभी भी कोई पांच सौ पुराने कुएं इस अवस्था में है कि उन्हें कुछ हजार रूप्ए खर्च कर जिंदा किया जा सकता हे. ऐसे कुंओं को जिला कर उनकी जिम्मेदारी स्थानीय समाज की जल बिरादरी बना कर सौप दी जाए तो हर कंठ को प्याप्त जल मुहैया करवाना कोई कठिन कार्य नहीं होगा. ईमानदारी से अगर लोगो की प्यास बुझाने के इंतजाम करना है तो कुओं का अलग से सर्वेक्षण करा कर उन्हें पुनर्जीवित करने की एक योजना शुरू की जाए ताकि समाज अपनी परंपरा व प्यास दोनों को बचा सके.

Share On Facebook

Comments

Subscribe

Receive updates and latest news direct from our team. Simply enter your email below :