जनादेश

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निर्माण के बाद नई दिशा में बढ़ते युवा आर्किटेक्ट !

आकाश श्रीवास्तव /आकृति कक्कड़ 

मुंबई .लाकडाउन के दौर में हम लोगों ने वास्तुशिल्प के परम्परागत दायरे से बाहर हट कर मंथन किया .इसमें हमारे सहयोगी भी शामिल रहे .दरअसल आर्किटेक्ट या आर्किटेक्ट फर्म को लेकर परम्परागत सोच यही रही है कि किसी भी भवन के निर्माण से पहले उनकी सेवा ली जाए और कम्पलीशन प्रमाण पत्र मिलने तक उनकी सेवा जारी रखी जाए .इसके बाद अमूमन सभी भवन निर्माता चाहे वे व्यावसायिक क्षेत्र के हों या सहकारी क्षेत्र के या फिर निजी क्षेत्र के उनका आर्किटेक्ट से अनुबंध समाप्त हो जाता है .पर समस्या की शुरुआत भी यहीं से होती है यह कुछ अनुभव से हमने भी सीखा है .साथ ही आर्किटेक्ट बिरादरी के लिए एक नया रास्ता भी खुल रहा है .जिसपर कुछ युवा आर्किटेक्ट पहल कर चुके हैं .

दरअसल भवन निर्माण के बाद उसका रख रखाव यानी मेंटेनेंस कोई समूह ,समिति या पदाधिकारी करता है .ज्यादातर भवन में निर्माण के कुछ वर्ष बाद तक कोई ज्यादा समस्या नहीं आती है अगर वह कुशल आर्किटेक्ट की निगरानी में बना हो .पर कुछ समय बाद तो प्लम्बिंग से लेकर सीवर ,लीकेज ,सीलन या फिर बिजली आदि की समस्या पैदा होने लगती है जो स्वभाविक है .इसका समाधान ज्यादातर हाउसिंग सोसायटी अपने मेंटेनेंस स्टाफ से कराती है .ज्यादातर सोसायटी अपना खुद का प्लंबर ,इलेक्ट्रीशियन आदि स्थाई रूप रखती हैं या कांट्रैक्ट पर उनकी सेवा लेती हैं .दरअसल ये वे लोग होते हैं जिनकी उस भवन निर्माण में कोई भूमिका नहीं होती है .ऐसे में वे न तो भवन के बारे में ज्यादा जानकारी रखते हैं न ही वे उसकी जटिलताओं को समझते हैं .इससे समस्या शुरू होती है जो कई बार हाउसिंग सोसायटी के लिए बहुत महंगी साबित होती है .दरअसल ये किसी समस्या का समाधान करने आते हैं और उसका फौरी समाधान कर चले जाते हैं .अगर वे कुशल कारीगर न हुए तो ज्यादा से ज्यादा तोड़फोड़ भी कर देते हैं .क्योंकि वे सारा काम किसी की निगरानी में नहीं करते बल्कि स्वतंत्र रूप से उन्हें जो समझ आता है वैसा कर देते हैं .उदाहरण अगर किसी प्लंबर को बुलाया गया तो अगर वह ऐसे समय आया जब निगम का पानी चालु न हो तो वह किसी वाल्व को बदल कर चला जाता है .उसे न तो पानी के प्रेसर का ध्यान रहता है न ही और तकनीकी जानकारी .ऐसे में बाद में पानी का प्रेसर तेज होने पर वाल्व टूट जाता है और सब जगह पानी ही पानी हो जाता है .यह एक उदाहरण है .अब एक दूसरा उदहारण .कोई भी भवन जो दस पंद्रह साल पहले बना हो उसमें आज के हिसाब से कई सुविधाओं की कमी होती है .जैसे सोलर पावर सिस्टम .नए भवन में सौर्य उर्जा से सारे भवन की बिजली खपत में बड़ी कटौती की जा सकती है .कौन सा वैकल्पिक एयर कंडीशनिंग सिस्टम मुझे बिजली के बिल को कम करने में मदद करेगा?इससे पैसा भी बचता है .बदले माहौल के हिसाब से लैंड स्केपिंग भी बदली जा सकती है .पर यह सब करेगा कौन .यह सब आप प्लंबर ,इलेक्ट्रीशियन के बूते नहीं कर सकते .इसलिए हर आवासीय भवन के प्रबंधकों को आर्किटेक्ट से एक अनुबंध करना चाहिए ताकि रख रखाव से संबंधित समस्या आने पर वह अपनी निगरानी में बेहतर ढंग से काम करा सके .साथ ही भवन के मुताबिक समय समय पर अपनी सलाह भी देता रहे .यह पोस्ट कंस्ट्रक्शन कांट्रैक्ट की तरह होगा .इससे आवासीय या व्यावसायिक भवनों का मेंटेनेंस न सिर्फ बेहतर हो सकेगा बल्कि प्रोफेसनल ढंग से हो पाएगा .आर्किटेक्ट फर्म के लिए भी यह एक नया रास्ता दिखाएगा .

दरअसल आवासीय क्षेत्र में यह समस्या बढती जा रही है और वे सिर्फ छोटे कारीगरों पर निर्भर हैं जबकि इसका समाधान बहुत ही प्रोफेशनल ढंग से किया जाना चाहिए .दरअसल आवासीय क्षेत्रों के सामने ऐसा कोई विकल्प भी नहीं हैं .ज्यादातर आर्किटेक्ट या आर्किटेक्ट फर्म इस क्षेत्र की तरफ देखती भी नहीं है .दरअसल आर्किटेक्ट का परम्परागत दायरा सिर्फ भवन निर्माण तक ही रहता भी आया है .वे बाद के दौर की कंसल्टेंसी पर गौर भी नहीं करती .मुझे लगता हैं इस दिशा में भी सोचना चाहिए .निर्माण के बाद का एक बड़ा बाजार सामने है विस्तार के लिए .और इस दिशा में पहल हो चुकी है देश के दो महानगरों में .मुंबई दिल्ली के कुछ युवा आर्किटेक्ट इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं .हालांकि अभी इसका कोई औपचारिक ढांचा सामने नहीं आया है .कोई शौकिया यह काम कर दे रहा है तो कोई जान पहचान या अपने क्लाइंट के रिश्ते से .पर देर सबेर यह बड़ा बाजार तो बन ही सकता है .फोटो -बदलते परिवेश के हिसाब से बदलते घर .फोटो साभार 

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