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वाजपेयी युग का अवसान

आलोक तोमर
जसवंत सिंह की किताब पूरी पढ़ गया हूं मगर अब तक समझ में नहीं आता कि इसमें नया क्या हैं? एक निरपेक्ष लेकिन तार्किक विश्लेषण करना और इतिहास को अपने नजरिए से देखना इतना बड़ा जुर्म नहीं हैं कि तीस साल से पार्टी से जुड़े एक मजबूत नेता को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए।
जसवंत सिंह की भाजपा से बेरहम विदाई दरअसल पार्टी में अटल बिहारी वाजपेयी युग की समाप्ति का एक और ऐलान है। राजनाथ सिंह ने घोषणा की और पढ़े लिखे रविशंकर प्रसाद ने उसका जबरन बचाव किया मगर सच यह है कि अटल जी के जमाने में पार्टी मे जो उदारता और सहिष्णुता थी वह अब भाजपा में खत्म हो गई हैं। यह वही पार्टी है जो हिंदू धर्म को सभी धर्मों का आदर करना सिखाती है मगर अपने भीतर एक विचार का आदर नहीं कर पाई।
जसवंत सिंह के बारे में अब भाजपा के बंधक महारथी तरह तरह की बातें कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि उनका जनाधार नहीं है। मगर भाजपा में जो सबसे बुध्दिजीवी और पढ़े लिखे नेता है उनमें जसवंत सिंह सबसे आगे आते हैं और अटल जी की सरकार में वित्त और विदेश जैसे मंत्रालय इस भूतपूर्व सैनिक ने ऐसे ही नहीं संभाल लिए। इस बार तो वे लोकसभा मेंं हैं मगर पूरे पांच साल वे राज्यसभा में प्रतिपक्ष के बहुत सफल नेता रहे।
अभी कल तक भाजपा जसवंत सिंह को इतना काबिल समझती थी कि सुषमा स्वराज का लोकलेखा समिति के अध्यक्ष का पद उन्हें सौप दिया था और एक किताब लिख दी तो वे अछूत हो गए? असल में आडवाणी को बहुत समय से लग रहा था कि वाजपेयी की पहल पर जसवंत सिंह उनके प्रधानमंत्री बनने के रास्ते में रोड़े अटका रहे हैं।
आपको याद होगा कि कांधार के मामले पर जब विवाद छिड़ा था तो आडवाणी जैसे बड़े नेता ने साफ झूठ बोल दिया था कि आतंकवादियों को छोड़ने और जसवंत सिंह के उनके साथ कांधार जाने के फैसले में वे शामिल नहीं थे। यह फैसला मंत्रिमंडल की बैठक में हुआ था और आडवाणी देश के गृह मंत्री की हैसियत से उसमें शामिल थे। यह और किसी ने नहीं, खुद अटल जी ने बताया है।
और अगर जिन्ना की तारीफ करना गुनाह है तो यह गुनाह आडवाणी कई वर्ष पहले कर चुके होते। जसवंत सिंह ने तो सिर्फ किताब लिखी है, आडवाणी तो जिन्ना की मजार पर फूल चढ़ाने गए थे और वहां बयान दिया था कि जिन्ना से ज्यादा धर्म निरपेक्ष नेता भारत में दूसरा नहीं हुआ। जसवंत सिंह ने नेहरू की भी आलोचना की है और उनके निकाले जाने से एक संदेश यह मिलता है कि भाजपा नेहरू को पूज्य मानती है और उनकी निंदा बर्दाश्त नहीं कर सकती।
जसवंत सिंह को पार्टी से निकालने के लिए भारतीय जनता पार्टी को बहुत हिम्मत जुटानी पडी। जसवंत सिंह ने तो किताब का धूमधाम से विमोचन करवा कर अपनी ओर से पार्टी को चुनौती दे ही दी थी।
जब निकले जाने की खबर शिमला में ही मौजूद पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने जसवंत सिंह को मोबाइल पर दी तो उनका पहला सवाल था कि अध्यक्ष जी आपने मुझे शिमला आने ही क्याें दिया था। इसके बाद जो संवाद हुआ उसे ठाकुराें का उग्र संवाद ही कहा जा सकता है और उसे राजनाथ सिंह या जसवंत सिंह जब चाहेंगे और अगर चाहेंगे तो सार्वजनिक करेंगे।
जसवंत सिंह को पार्टी से निकालना अलग अलग लोगाें के लिए अलग अलग संकेत है। राजस्थान में जसवंत सिंह वसुंधरा राजे के लिए मुसीबत थे, उन्हे राहत मिलेगी। मगर राजनाथ सिंह भी वसुंधरा के लिए कम मुसीबत नहीं हैं। रही बात जार्ज फर्नांडीज की जो तकनीकी तौर पर अब भी एनडीए के संयोजक हैं, बोल नहीं पाते मगर कोशिश करके उन्हे जवाब देना पडेगा कि वे इस विमोचन समारोह में क्या कर रहे थे। खुशी वामपंथियाें को होगी जो इस बात से राहत महसूस करेंगे कि बंगाल में भाजपा की एकमात्र लोकसभा सीट खत्म हो गयी।
जसवंत सिंह खामोश बैठ जाएंगे ये सोचना गलत है। आखिर भाजपा की स्थापना से अबतक वे इसके सदस्य रहे हैं और विदेश और रक्षामंत्री भी रह चुके हैं। राजस्थान के एक छोटे राजपरिवार से रिश्ता रखने वाले जसवंत सिंह ने जिन्ना को भारतीय राजनीति के केन्द्र में एकबार फिर ला दिया है। अब बहस इस बात पर है कि जिन्ना की तारीफ करके आडवाणी बच गये और जसवंत सिंह बलि चढ गये। संघ परिवार तब भी आडवाणी के खिलाफ था और अब जसवंत सिंह के खिलाफ है। जाहिर है कि संघ वालाें को भी पता  है कि ज्यादा जरुरी कौन है। मगर शिमला से जो संदेश आया है वह साफ है कि भाजपा का भविष्य बहुत उाव्वल नहीं है।
जसवंत सिंह के पहले भी नेताओं ने भाजपा और इसके पहले जनसंघ से बगावत की है। मगर वे राजनीति में सफल नहीं हो पाये। सबसे पहले जनसंघ के अध्यक्ष बलराज मधोक निकाले गये और दिल्ली के पीजीडीएवी कॉलेज से पढाते हुए रिटायर हो गये। कल्याण सिंह निकले फिर वापस आये फिर निकले और अब समाजवादी पार्टी के हाशिये पर हैं।
सुब्रमण्यम स्वामी निकले तो दोबारा कभी राजनीति की मुख्यधारा में नहीं आ पाये। उमा भारती बहुत जोर-शोर से मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थीं मगर पार्टी से बगावत की तो अब उनका और उनकी लोकजनशक्ति पार्टी का दूर दूर तक पता नहीं है। जसवंत सिंह की रणनीति बताएगी कि वे भाजपा को कमजोर करेंगे या भाजपा के विरोधियाें को मजबूत।
भारतीय जनता पार्टी में जो हो रहा है वह पार्टी के लिए ही नहीं देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। आखिर भाजपा दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रतिपक्ष हैं और ऐसा प्रतिपक्ष हैं जिसके अध्यक्ष तक को आजादी से काम करने नहीं दिया जाता। राजनाथ सिंह के हर फैसले पर आडवाणी की मुहर लगना जरूरी होती है। वाजपेयी होते तो जसवंत सिंह नहीं निकाले जाते। शिमला के चिंतन शिविर में सिर्फ उनकी किताब पर बहस होती और आखिरकार पार्टी प्रस्ताव पारित कर देती कि ये जसवंत सिंह के निजी विचार है और पार्टी का इससे कोई लेना देना नहीं है।
जसवंत सिंह लोकसभा चुनाव में पार्टी की पराजय के बाद भी महत्वपूर्ण बने हुए थे। लोकसभा में पहली कतार में उन्हें जगह दी गई थी। अब जसवंत सिंह को लोकलेखा समिति के अध्यक्ष पद से सिर्फ लोकसभा अध्यक्ष निकाल सकती है और तकनीकी तौर पर ऐसा करना अनिवार्य न हो तो वे ऐसा नहीं करेंगी। आखिर भाजपा ने उन्हें मनोनीत करवा कर अपने हाथ बांध दिए हैं। जसवंत सिंह हारे नहीं हैं। उनके बेटे मानवेंद्र सिंह अब भी भाजपा में हैं। चूंकि उन्हें निष्कासित किया गया है इसलिए वे पूरे पांच साल निर्दलीय सदस्य रह सकते हैेंं। लोकसभा में जब भी जरूरी मुद्दों पर बहस होगी और एनडीए शासन का उल्लेख किया जाएगा तो जसवंत सिंह का उस बहस में शामिल होना अनिवार्य होगा और भाजपा को जसवंत सिंह की ही भाषा बोलनी पड़ेगी। राजनाथ सिंह को अब अध्यक्ष की तरह आचरण करना सीख लेना चाहिए वरना उनकी गिनती भी वैकेंया नायडू जैसे जोकरों और जना कृष्णमूर्ति जैसे निष्फल पार्टी अध्यक्ष के तौर पर होगी। 

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