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जिन्ना- भारत विभाजन के आइने में

 जसवंत सिंह

जिस किताब को लेकर भाजपा में बवंडर मचा हुआ है उस किताब  को ज्यादातर लोगो ने पढ़ा भी नहीं है. जसवंत सिंह की दूसरी किताब बाजार में आते ही विवाद में आ गई। पहली किताब से हालांकि उन्हें भाजपा ने पार्टी से नहीं निकाला, लेकिन इस बार उनकी किताब जिन्ना: भारत विभाजन के आईने में ने उन्हें भाजपा से ही निष्काषित करवा दिया। आखिर क्या है विवादित अंश-
जसवंत सिंह अपनी पुस्तक के अंतहीन वार्ता खंड में लिखते हैं कि 4 मार्च 1947 को पटेल ने अपने विचारों को आवाज देते हुए कांजी द्वारकादास को एक खत लिखा था, आपकी तरह मैं कोई उदास नजरिया नहीं अपना रहा हूं, अगली जून के पहले संविधान जरूर तैयार हो जाना चाहिए। अगर लीग पाकिस्तान पर जोर देती है तो पंजाब और बंगाल का बंटवारा ही एकमात्र विकल्प हैं।
उन्हें पूरा पंजाब और बंगाल बिना सिविल वार के नहीं मिल सकेगा। किताब में जसवंत आगे लिखते हैं कि पटेल ने पहली बार भले ही सीधे तौर पर पंजाब और बंगाल के विभाजन की शर्त पर बंटवारे को स्वीकारा था। अंतहीन वार्ता खंड में जसवंत ने लिखा है कि पटेल ने पंजाब के विभाजन को मंजूरी देकर भारत के विभाजन के सिद्धांत को भी मान्यता दे दी है. जवाहर लाल नेहरू का भी विभाजन विरोध काफी हल्का पड़ चुका था। लार्ड माउंटबेटन के भारत आने के एक माह के अंदर ही इतने वर्षो तक विभाजन के मुखर विरोधी नेहरू मुल्क के बंटवारे के समर्थक बन गए।
गांधी ने किया धर्म और राजनीति का मिश्रण, जो एक अपराध था: जिन्ना
जसवंत सिंह ने अपनी किताब के 122 पन्ने पर तत्कालीन गवर्नर रिचर्ड केसी के हवाले से लिखा है कि उन्हें गांधीजी ने एक बार बताया था कि जिन्ना ने गांधीजी से कहा कि गांधाजी कई गंदे तत्वों को लाकर भारतीय राजनीति को बर्बाद कर दिया। उन्होंने राजनीति और धर्म का मिश्रण किया जो एक अपराध था। 
जिन्ना को किया महिमामंडित
किताब में वेल्स के जरिए से लिखा गया है कि नेहरू रिपोर्ट को स्वीकार किए जाने के बावजूद भी जिन्ना खुद को राष्ट्रवादी ही मानते रहे। नेहरू के जीवनीकार एस गोपाल को उद्धत किया गया है, 1936 में मुस्लिम लीग की कमान संभालने के समय भी जिन्ना राष्ट्रवादी थे, वह न तो विदेशी शासन पर विश्वास करने और न ही उसका समर्थन करने की इच्छा रखते थे।
क्यों स्वीकारा निर्वासित होना
वह व्यक्ति जो 47 वर्षो में भारत के राजनीतिक नेतृत्व की पहली पंक्ति में खड़ा था, क्यों खुद को देश के एक कोने में ही निर्वासित कर लिया? ..गोखले ने स्वयं उन्हें हिन्दू मुस्लिम एकता का राजदूत कहा था। सरोजनी नायडू ने भी इसी रूप में सराहा था। आखिर किस तकाजे ने जिन्ना को रास्ता बदलने के लिए मजबूर किया।
जिन्ना को उदार सवधर्मग्राही और सेक्यूलर माना जाता रहा, आखिर क्यों उनके मन में बंटवारे की बात आई?
नेहरू उद्दंड : गांधी
पृष्ठ संख्या 152 में केन्द्रित ध्येय कम होते विकल्प अध्याय में गांधी और नेहरू के टकराव के बारे में गांधी की तरफ से लिखा है कि नेहरू उद्दंड और परेशानी खड़ी करने वाले लोगों में से थे। उन्होंने नेहरू को पार्टी को अनुशासित करने के लिए भी निर्देश दिए।
नेहरू के पलटवार
आगे यह भी लिखा गया है कि इधर, नेहरू ने भी गांधीजी के विचारों और नेतृत्व पर सवाल उठाए। उन्होंने गांधीजी को पत्र लिखा कि जेल से छूटने के बाद आपके साथ कुछ गड़बड़ है. आपका रवैय्या बार-बार बदलता रहा.इससे लोगों में असमंजस है।
गांधी नेहरू में थे मतभेद
किताब में यह भी दर्ज है कि गांधी ने नेहरू को लिखा कि जैसा तुम कहते हो कि मैं गलत हूं और देश का नुकसान पहुंचा रहा हूं, जिसकी भरपाई हो पाना नामुमकिन है.तो तुम्हारा कर्तव्य बनता है कि तुम मेरे खिलाफ विद्रोह करो।
 
जिन्ना जाति से हिन्दू और धर्म से मुसलमान
पुस्तक में यह भी दर्ज है कि सरोजनी नायडू ने एक बार जिन्ना से कहा था कि वे जाति से हिन्दू हैं और धर्म से मुसलमान। उधर, गोपाल कृष्ण गोखले ने भी जिन्ना के बारे में कहा था जिन्ना हिंदू-मुस्लिम एकता के दूत थे।
 
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