ताजा खबर
साफ़ हवा के लिए बने कानून नेहरू से कौन डरता है? चालीस साल पुराना मुकदमा ,और गवाह स्वर्गवासी चार दशक बाद समाजवादी चंचल फिर जेल में
घट गया गन्ने का रकबा

अंबरीश कुमार
लखनऊ, अगस्त। उत्तर प्रदेश में गन्ने का रकबा पिछले पिराई सत्र में 7.10लाख हेक्टेयर कम हो चुका है जिसमें और कमी आने की आशंका है। सूखा प्रभावित जिलों में मेरठ, सहारनपुर, शाहजहांपुर, रामपुर, बरेली और गाजियाबाद जसे जिले शामिल हैं जहां गन्ने का ज्यादा उत्पादन होता है। जबकि मुजफ्फरनगर, लखीमपुर खीरी और बहराइच जसे गन्ना उत्पादक जिलों की स्थिति अच्छी नहीं है। ऐसे में चीनी मिलों का संकट और बढ़ सकता है। देश
के समूचे चीनी उत्पादन में उत्तर प्रदेश की भागीदारी २५ फीसदी की है और वह दूसरे नंबर पर है। जबकि पहले नंबर पर महाराष्ट्र 30 फीसदी हिस्सेदारी के साथ बरकरार है। किसानों के बकाया भुगतान के चलते पिछले पिराई सीजन में ही किसानों ने गन्ने का रकबा कम कर दिया था। गौरतलब है कि 2007-08 में 28.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गन्ना लगाया गया था जबकि पिराई सत्र में यह घटकर 21.40 लाख हेक्टेयर रह गया। अब 2009-10 पेराई सत्र और गिरकर 17.88 लाख हेक्टेयर तक पहुंचने की आशंका है। चीनी मिलों को कम गन्ना मिलने की वजह से उत्तर प्रदेश में पिछले सत्र में चीनी का कुल उत्पादन घटकर 40 लाख मीट्रिक टन रह गया जबकि अनुमान 60 लाख मीट्रिक टन का था। इस बार सूखा और गन्ना का रकबा और घटने की वजह से इसमें फिर गिरावट आएगी। इस सब का असर चीनी की कीमतों पर पड़ेगा। राष्ट्रीय स्तर पर देश को करीब २२५ लाख टन चीनी की जरूरत पड़ती है। पिछले पिराई सत्र में चीनी का कुल उत्पादन १४५ लाख टन हुआ। उत्पादन में आई कमी की भरपाई करीब ८0 लाख टन के बफर स्टाक से की गई। लेकिन इस बार बफर स्टाक का भी संकट है। ऐसे में चीनी जो करीब ३0-३२ रूपए किलो बिक रही है, वह
दिवाली आते-आते 50 रूपए किलो तक पहुंच सकती है। चीनी की कमी को पूरा करने के लिए केन्द्र सरकार चीनी का आयात करेगी लेकिन कीमतों पर नियंत्रण होना मुश्किल नजर आ रहा है। मुंबई पोर्ट पर जो आयातित चीनी उतर रही है, उसकी कीमत 30 रूपए किलो आ रही है। जहिर है कि बाजर पहुंचते-पहुंचते इसकी कीमत और बढ़ेगी। वैसे भी आसपास के देशों में चीनी का दाम काफी तेज चल रहा है।पाकिस्तान में 50 रूपए किलो तो बांगलादेश और नेपाल में 55-60 रूपए किलो चीनी बिक रही है। देश के चीनी संकट में उत्तर प्रदेश का बड़ा योगदान है। उत्तर प्रदेश में चीनी का उत्पादन घटने का असर देश के बाजर पर पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश में चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का करोड़ों रूपए बकाया है। पिछले वर्ष बकाया न मिलने की वजह से किसानों के बड़े तबके ने गन्ने  की फसल की जगह दूसरी फसलों को प्राथमिकता दी जिससे गन्ने का रकबा काफी घट गया। इसके अलावा बाढ़ से भी गन्ने की फसल बुरी तरह  प्रभावित हुई है। यही वजह है कि ज्यादातर मिलें पिछले साल सौ दिन भी पेराई नहीं कर पाईं जबकि आम तौर पर ये मिलें चार से छह महीने तक पेराई करती रहीं। निजी क्षेत्र की ज्यादातर मिलों की पेराई क्षमता पांच हजर टन से लेकर बारह हजर टन प्रतिदिन की है लेकिन वे इस क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाईं। दूसरी तरफ गुड़ और खांडसारी इकाइयों ने भी चीनी मिलों के लिए संकट पैदा किया। गुड़ और खांडसारी उद्योग ने किसानों को 160 रूपए कुन्तल का भाव दिया जिससे चीनी मिलों के बजय किसानों ने इन छोटी इकाइयों को अपना गन्ना देना बेहतर समङा। इस पेराई सत्र में यह इकाइयां 170 रूपए का भाव देने की तैयारी कर रही हैं जिससे संकट और बढ़ेगा। उत्तर प्रदेश शुगर मिल एसोसिएशन के सचिव केएन शुक्ला ने कहा-राज्य सरकार को गुड़ और खांडसारी इकाइयों पर किसानों से गन्ना लेने के मामले में नियंत्रण रखना चाहिए। चीनी मिलों के लिए गन्ने के क्षेत्र आरक्षित होते हैं। जबकि गुड़ और खांडसारी उद्योग कहीं से भी गन्ना ले सकता है। शुक्ल ने चीनी मिलों के संकट का हवाला देते हुए कहा-आने वाले समय में चीनी की कीमत खुले बाजर में पांच हजर रूपए कुंतल तक ज सकती है। खास बात यह है कि निजी क्षेत्र की चीनी मिलों के पास कोई स्टाक भी नहीं बचा है। दूसरी तरफ गुड़-खांडसारी उद्योग की तरफ से 170 रूपए कुंतल की पेशकश चीनी मिलों के लिए संकट पैदा करने वाली है। गौरतलब है कि 2008-09 में चीनी उत्पादन का अनुमान 60 लाख मीट्रिक टन था लेकिन उत्पादन 40 लाख टन ही हो पाया।जनसत्ता

 

email ईमेल करें Print प्रिंट संस्करण
  • चंचल का चैनल
  • जहां पत्रकारिता एक आदर्श है
  • जहां आये कामयाब आये
  • नामवर की नियति
  • चिड़िया ते बाज तुड़वाऊं?
  • प्रभाष जोशी और इंडियन एक्सप्रेस परिवार
  • एक ऋषि की यात्रा का अंत
  • असली मैदान तो यूपी बनेगा
  • राजकाज
  • भगतों की चांदी है
  • मेरठ के बांके!
  • बाबरी विध्वंस की आयी याद
  • इतिहास में उपेक्षित तिलका मांझी
  • आखिरी पड़ाव गोमोह जंक्शन
  • संगम के अखाड़े में लेफ्ट-राइट
  • एक थे लोकबंधु राजनारायण
  • अपनी जमीन ही नसीब हुई
  • रवीश के सामाजिक सरोकार
  • गिरोह क्यों कहते हैं
  • ई राजेंद्र चौधरी कौन है ?
  • Post your comments
    Copyright @ 2016 All Right Reserved By Janadesh
    Designed and Maintened by eMag Technologies Pvt. Ltd.