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कांग्रेस से बेहतर नहीं है भाजपा

सुरेंद्र किशोर 

भाजपा ने केंद्र में 1998 से 2००4 तक लगातार छह साल तक शासन किया,पर उसने यह साबित कर दिया कि वह भ्रष्टाचार और राजनीति के अपराधीकरण के मामलों में कांग्रेस से कत्तई बेहतर नहीं है।नतीजतन उसके वोट बैंक में इतना इजाफा नहीं हो सका कि वह संकट में काम आ जाता।
 सत्ता में आने के बाद भाजपा ने भ्रष्टाचार व राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ घोर नरमी और दूसरी ओर भावनात्मक मुद्दों के प्रति गरमजोशी दिखाई और इसका खामियाजा उसे आज भी भुगतना पड़ रहा है।नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार की भाजपा ने जब इसके ठीक उलट शैली अपनाई तो उसे इसका वोट व सीट की दृष्टि से लाभ मिल रहा है।काश ! भाजपा ने सन् 1998 में केंद्र में सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मेादी के बदले 'नीतीश कुमार-सुशील मोदी जैसी शैली अपनाई होती तो उसे आज ये दिन नहीं देखने पड़ते।यह बात और है कि नीतीश -सुशील की सरकार सन् 2००5 में बनी,पर शैली तो शैली ही होती है। 
 आज भाजपा में विद्रोह मचा है क्योंकि कई नेता यह समझ रहे हैं कि यह दल अब उन्हें सत्ता नहीं दिला सकता है।न ही उन लक्ष्यों को हासिल कर सकता है जिसकी वह घोषणा करता रहा है।
 भाजपा ने केंद्र में 1998 से 2००4 तक लगातार छह साल तक शासन किया,पर उसने यह साबित कर दिया कि वह भ्रष्टाचार और राजनीति के अपराधीकरण के मामलों में कांग्रेस से कत्तई बेहतर नहीं है।नतीजतन उसके वोट बैंक में इतना इजाफा नहीं हो सका कि वह संकट में काम आ जाता। यहां तक कि भाजपा अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीतिक दृश्य से ओझल होने का झटका भी बर्दास्त नहीं कर सकी। याद रहे कि यह झटका मात्र तीन प्रतिशत मतों का ही था।याद रहे कि वाजपेयी की अनुपस्थिति और नेहरू-इंदिरा परिवार के राहुल गांधी की दमदार उपस्थिति के कारण भाजपा के करीब तीन प्रतिशत वोट कांग्रेस की तरफ चले गये और कांग्रेस दुबारा सत्ता में आ गई।
 दूसरी ओर, नीतीश कुमार की राजनीतिक व प्रशासनिक शैली अपना कर बिहार भाजपा ने बिहार में अपना वोट बढ़ाया और सीटें भी। 2००5 के बाद के चुनाव नतीजे इसके सबूत हैं।हालांकि बिहार की शैली यानी नीतीश कुमार की शैली।पर सरकार में रहकर उसको समर्थन देने का लाभ जदयू के साथ -साथ भाजपा को भी मिला।नीतीश शैली का मतलब है भ्रष्टाचार व राजनीति के अपराधीकरण पर जोरदार सरकारी हमला।
 जसवंत सिंह निष्कासन प्रकरण से एक बार फिर यह बात साबित हुई है कि भाजपा की चिंता का मुख्य विषय भीषण सरकारी भ्रष्टाचार व राजनीति का घोर अपराधीकरण नहीं है बल्कि अब भी भावनात्मक मुद्दे ही हैं। भावनात्मक मुद्दे ही अब भी उसके मर्म स्थल को बंधते हैं।इस दल के भविष्य के लिए इसे अच्छा नहीं माना जा रहा है।
 लगता है कि लगातार दो लोक सभा चुनावों में अपनी पराजय से भाजपा ने कोई शिक्षा ग्रह्णा नहीं की है।सन् 2००4 के लोस चुनाव में भाजपा की पराजय का मुख्य कारण भ्रष्टाचार व राजनीति का अपराधीकरण के प्रति भारी नरमी ही थे। भाजपा के पास भावनात्मक मुद्दे तब भी थे,पर उसने दुबारा भाजपा को केंद्र में सत्ता में पहुंचाने में मदद नहीं की।सन् 1998 में सत्ता में आने के बाद आम जनता केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार से यह उम्मीद कर रही थी कि वह सरकारी भ्रष्टाचार और राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ कठोर कदम उठाएगी। भाजपा इन दो मुद्दों पर प्रतिपक्षी दल के रूप में काफी हो हल्ला करती भी रही थी।पर वह सरकार इन दो मुद्दों पर बुरी तरह समझौतावादी साबित हुई।उधर अपने सहयोगी दलों से तालमेल करने के मामले में भी भाजपा ने अनुदारता ही दिखाई। अपने एक प्रमुख सहयोगी दल लोजपा से तो भाजपा ने एक मलाईदार मंत्रालय को लेकर ही झगड़ा कर लिया।वह सहयोगी दल सन् 2००4 के लोस चुनाव में राजग के साथ होता तो सन् 2००4 में भी राजग की ही केंद्र में सरकार बनती।
 भाजपाके केंद्रीय नेतृत्व ने बिहार की नीतीश सरकार की राजनीतिक उपलब्धियों से भी कोई सबक नहीं लिया जिसने भ्रष्टाचार व अपराधीकरण के खिलाफ .बेलाग कार्रवाइयां करके अपना जन समर्थन काफी बढ़ा लिया है।नीतीश सरकार ने बिहार में कोई सांप्रदायिक या फिर जातीय भावना उभार कर वोट नहीं लिया।बल्कि उसने अपराध व भ्रष्टाचार के खिलाफ हमले की ईमानदार कोशिश करके अपना जन समर्थन बढ़ाया।बिहार सहित पूरे देश की सबसे बड़ी समस्या भीषण सरकारी भ्रष्टाचार है। उत्तर भारत के अनेक प्रांतों की दूसरी गंभीर समस्या राजनीति का अपराधीकरण व अपराध का राजनीतिकरण है।यदि केंद्र की अटल सरकार ने अपने छह साल के शासन काल में इन दो मुद्दों पर बेलाग फैसले किए होते तो राजग अटल बिहारी वाजपेयी की चुनावी दृश्य से अनुपस्थिति से इस बार हुई क्षति की भी पूत्र्ति कर लेता। सन् 2००4 के चुनाव में तो राजग की पराजय का मुख्य कारण फीलगुड के अहंकार में आकर उसके द्बारा अपने पुराने घटक दलों को तिरस्कृत करना था।तिरस्कृत दलों में लोजपा व द्रमुक शामिल थे।
 इन दो समस्याओं पर कठोर रुख अपनाने के बदले जिन्ना बनाम सरदार पटेल के भावनात्मक मुद्दे को लेकर जसवंत सिंह को दल से निकालना भाजपा का दिमागी दिवालियापन ही नजर आता है। राम मंदिर विवाद जब उसे चुनाव में काम नहीं आ रहा है तो सरदार पटेल भाजपा को अगले चुनाव में कितना काम आएंगे ? हां,भ्रष्टाचार व अपराधीकरण पर निर्मम प्रहार जरूर काम आ सकता है।बिहार में उसे काम आ भी रहा है।याद रहे कि अपराध व भ्रष्टाचार के कारण देश का विकास बाधित है।सरकारी धन आम जनता तक नहीं पहंुच पा रहा है।ऐसा नहीं कि बिहार में कोई स्वर्ग आ गया है।पर नीतीश कुमार ने अपने करीब चार साल के क्रियाकलापों से जनता को यह जरूर विश्वास दिला दिया है कि वे भ्रष्टाचार व अपराध से कोई समझौता ं करने को तैयार नहीं हैं।
 पर भाजपा ने अपने सत्ता काल में बार- बार यह साबित किया कि उसके लिए भ्रष्टाचार व अपराधीकरण 'मर्मस्थल मुद्दे नहीं हैं। अपराधीकरण व भ्रष्टीकरण को लेकर यदि भाजपा ने किसी नेता के खिलाफ वैसी ही सख्त कार्रवाई की होती जैसी कार्रवाई उसने जसवंत सिंह के खिलाफ की तो आज भाजपा पर न तो यह आरोप लगता और न उसे लगातार दो लोक सभा चुनाव हारना पड़ता।उसे चुनाव दृश्य से अटल बिहारी वाजपेयी की अनुपस्थिति और दूसरी तरफ राहुल गांधी की मजबूत उपस्थिति का जितना चुनावी नुकसान हुआ,उसकी क्षतिपूत्र्ति भी हो गई होती।
 भाजपा के लिए सांप्रदायिक मुद्दे और कुछ मंडलवादी दलों के लिए जातीय मुद्दे ही अब भी आसान लगते हैं।पर अब ये चुनावी हथियार कुंद होते जा रहे हैं। 
 पर भाजपा को अपनी पुरानी उच्च सवर्णवादी व प्रमोद महाजनवादी शैली से लगता है कि इतना मोह हो गया है जिस तरह अपने मृत बच्चे से बंदरिया को मोह हो जाता है। अपनी जिन कुछ गलतियों को भाजपा सुधारने को तैयार नहीं ,उन गलतियों को एक बार फिर उसे याद दिला देना जरूरी है। भाजपा ने अक्तूबर 1997 में उत्तर प्रदेश में अपनी सरकार को बचाने के लिए अनेक खूंखार बाहुबलियों व माफियाओं को मंत्री बना दिया।एक खास परिस्थिति में सन् 1998 और 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की जरूर केंद्र में सरकार बन गई,पर उस सरकार ने अपराध व भ्रष्टाचार के प्रति अपनी भारी कमजोरी दिखा कर 'पार्टी विथ अ डिफरेंस का तमगा त्याग दिया।
 अपने मर्मस्थलीय मुद्दों की रक्षा के लिए जसवंत सिंह जैसे नेताओं को दल से निकालने का भाजपा को पूरा अधिकार है।पर उसे दिलीप सिंह जूदेव जैसों के खिलाफ भी तत्काल ऐसी ही सख्त कार्रवाई करनी चाहिए थी जिन्होंने कहा था कि 'पैसा खुदा तो नहीं,पर खुदा कसम , खुदा से कम भी नहीं।
 इतना ही नहीं याद कीजिए सन् 2००० की वह घटना जब केंद्रीय सतर्कता आयुक्त एन बिट्ठल ने अटल सरकार के चार मंत्रियों की संपत्ति की जांच करने का निदेश सी.बी.आई.को दिया था।वे चारों चर्चित हवाला घोटाले के अभियुकत रह चुके थे।इन मेंं से दो भाजपा के थे।बाद में वे बरी जरूर हो गये थे,पर सुप्रीम कोर्ट ने बाद में कहा था कि सी.बी.आई.ने हवाला घोटाले की ठीक से जांच ही नहीं की।यदि भाजपा ने अपने उन दो मंत्रियों पर सख्त कार्रवाई की हेती तो जनता का उसमें विश्वास बढèता और भाजपा को 2००4 में सत्ता से बाहर नहीं होना पड़ता।पर इसके विपरीत अटल सरकार ने सतर्कता आयोग को एक सदस्यीय की जगह तीन सदस्यीय बना दिया ताकि किसी अगले एन.बिटठल को भी किसी मंत्री के खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं हो।
 यही काम अटल सरकार ने तब किया जब सुप्रीम कोर्ट ने 2 मई 2००2 को चुनाव आयोग से कहा कि वह उम्मीदवारों के बारे में दिशा निदेश जारी करे।दिशा निदेश यह कि उम्मीदवार अपने शपथ पत्र के साथ संपत्ति,आपराधिक रिकॉर्ड व शैक्षणिक योग्यता का विवरण दे।अटल सरकार ने इस निदेश को विफल करने के लिए जन प्रतिनिधित्व कानून में ही संशोधन करा दिया।पर भला हो सुप्रीम कोर्ट का जिसने इस संशोधन को ही रद कर दिया।नतीजतन आज हम उम्मीदवारों के जो विवरण हासिल कर लेते हैं,वह भाजपा की इच्छा के विरूद्घ ही हासिल कर पाते हैं।
 पर इसके विपरीत इन दो मुद्दों पर बेलाग कार्रवाइयां करने के कारण हिंदी भारत में किसी दल को कितना राजनीतिक लाभ भी मिल सकता है,उसका प्रमाण इन दिनों बिहार प्रस्तुत कर रहा है।पर लगता है कि भाजपा में अब आर.एस.एस प्रधान मोहन भागवत की इस ताजा सलाह पर अमल करने की क्षमता बची ही नहीं है कि 'भाजपा खुद को एक बार फिर 'पार्टी विथ अ डिफरेंस के तौर पर पेश कर सके। 
 
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