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फिर से परिवारवाद की बहस

सविता वर्मा 

नेहरू गांधी परिवार को परिवारवाद के नाम पर पानी पी-पी कर कोसने वाले समाजवादियों ने अब परिवारवाद का नया रिकार्ड कायम कर दिया है। बिहार में लालू यादव जब चारा घोटाले में फंसे तो घर के काम में उलङाी राबड़ी देवी को उन्होंने समूचे बिहार का राज सौंप दिया। बाद में उनकी ससुराल पक्ष के लोग भी परिवारवाद का विस्तार करने में जुट गए। वीपी सिंह के मंडल की मलाई खाने वालों में लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव प्रमुख माने जते हैं। लालू यादव ने परिवारवाद शुरू किया तो मुलायम सिंह यादव भी पीछे नहीं रहे बल्कि अब तो वे सबसे आगे निकल गए हैं। डिंपल यादव उनके परिवार की पांचवीं सदस्य होंगी जो संसद के रास्ते में है। कई छोटी पार्टियों के सांसदों की इतनी संख्या संसद में नहीं होगी जितनी मुलायम सिंह के परिवार के सदस्यों की है। उदाहरण के लिए राष्ट्रीय जनता दल और लोक जनशक्ति पार्टी है। लोजपा का तो कोई सांसद ही नहीं है। ऐसे में मुलायम सिंह की समाजवादी बहू का राजनीति में पदार्पण परिवारवाद की बहस को नए सिरे से शुरू कर सकता है। डाक्टर राम मनोहर लोहिया से लेकर समाजवादी चिंतक मधु लिमए तक ने कांग्रेस के परिवारवाद पर काफी हमला किया था। अब उनके शिष्य जो कर रहे हैं, उसे समाजवादी किस रूप में लेते हैं, यह देखना होगा। मुलायम कितने समाजवादी हैं, यह तो उनके घर से ज्यादा कहीं और दिखता ही नहीं। समाजवादी पार्टी उनके घर के सभी लोगों को सत्ता का सुख पहले ही चखा चुकी थी, बस बहू डिंपल बाकी थी। पुत्र अखिलेश के इस्तीफे से खाली हुई फिरोजबाद लोकसभा से डिंपल की उम्मीदवारी की घोषणा ने अब उनके लिए भी द्वार खोल दिए हैं। अगर कोई अप्रत्याशित उलट-फेर न हुआ तो संसद के अगले सत्र में मुलायम का आधे से ज्यादा परिवार लोकसभा में ही बैठा नजर आएगा। खुद मुलायम, भाई राम गोपाल, पुत्र अखिलेश और बहू डिंपल और भतीज धमेन्द्र। लोकसभा में शायद ही किसी और परिवार के एक साथ इतने सदस्य मौजूद नजर आएं। जो वहां नहीं होंगे, वे उत्तर प्रदेश की विधानसभा में होंगे। शिवपाल यादव विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं। मुलायम के एक भाई राजपाल यादव की पत्नी प्रेमलता इटावा की जिला पंचायत अध्यक्ष हैं। माना कि इटावा, मैनपुरी, फिरोजबाद आदि यादव बैल्ट के मजबूत गढ़ हैं लेकिन वहां पर अन्य लोगों को भी तो मौका दिया जा सकता है। कई यादव नेता मुलायम सिंह के परिवारवाद से नाराज होकर छिटकने लगे हैं। हाल ही में विनोद यादव उर्फ कक्का ने मुलायम को अलविदा कह दिया और भरथना विधानसभा उपचुनाव में मुलायम को महंगा पड़ सकता है।
बत्तीस साल की डिंपल यादव का जन्म राजपूत परिवार में हुआ और उन्होंने लखनऊ के आर्मी पब्लिक स्कूल से पढ़ाई शुरू कर लखनऊ विश्वविद्यालय से १९९७ में स्नातक की डिग्री ली। दो बेटियों और एक बेटे की मां डिंपल यादव को पेंटिंग और पढ़ने का शौक है। उनकी बड़ी बेटी आठ साल की है तो बाकी दो जुड़वां बच्चे करीब चार साल के हैं। ऐसे में परिवार के साथ-साथ राजनीति की पारी शुरू करने ज रही डिंपल यादव समाजवादियों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है।
दरअसल सिद्धांतों और विचारधारा की बात करनी वाली जमात यह भूल रही है कि गैर कांग्रेसी दलों ने भी परिवारवाद को कम प्रश्रय नहीं दिया। दिग्गज जट नेता चौधरी चरण सिंह की तीसरी पीढ़ी के जयंत चौधरी संसद पहुंच चुके हैं। कश्मीर में शेख अब्दुल्ला की तीसरी पीढ़ी सत्ता में है। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री, चंद्रशेखर, देवगौड़ा और वीपी सिंह के पुत्र राजनीति में हैं। देवीलाल के दोनों पुत्र राजनीति में हैं। उत्तर में प्रकाश सिंह बादल परिवारवाद का प्रसार करने में जुटे हैं तो दक्षिण में एम करूणानिधि के परिवार के कई सदस्य सत्ता का सुख भोग रहे हैं। यह सूची काफी लंबी है। पवार,पायलट, सिंधिया और जीतेन्द्र प्रसाद की दूसरी पीढ़ी संसद में युवा तुर्क के रूप में नई पहचान बना रही है। ऐसे में समाजवादियों की बहू डिंपल यादव का राजनीति में कदम रखना फिर से परिवारवाद की बहस को जिंदा करता है।भास्कर डॉट कॉम से 
 
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