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मीडिया का मोतियाबिंद -3

 फज़ल इमाम मल्लिक

 
लोगों ने बताया कि अखबारों ने खबरें छापने के लिए रेट तय कर दिए हैं और बाकयदा उन्हें हर जिला मुख्यालय भेज दिया है। उन्हें यह निर्देश है कि पदयात्रा से लेकर जनसभाओं की खबरों के लिए पैसे वसूले जाएं। पैसे कितने हों, उसका पूरा उल्लेख था। ठीक किसी होटल के मीनू कार्ड की तरह खबरों की लंबाई चौड़ाई के लिए पैसे तय थे। यानी बिना पैसे दिए किसी पार्टी या उम्मीदवार की खबरें नहीं छप सकती थीं। यानी अखबारों ने तय कर रखा था कि विज्ञापन की कीमत पर वे पाठकों को खबरें परोसेंगे और हम जैसे लोग उन प्रायोजित खबरों को पढ़ने के लिए अभिश्पत थे। हैरत इस बात की थी कि इस सारे गोरखधंधे में वे अखबार ही शामिल थे जो साफ-सुथरे चुनाव की वकालत अपने-अपने तरीके से कर रहे थे।
 
खबरों की दुनिया में रहते हुए कई बार कई ऐसी बातें हो जाती हैं जिस से भीतर कहीं दूर तक अंधेरा पसर जाता है और एक अजब तरह की उदासी व पीड़ा को बूंद-बूंद कर अपने भीतर उतरता महसूस करता हूं। इस अंधेरे और उदासी के बीच ही मन बार-बार विचलित हो उठता है। यह अंधेरा और उदासी तब और बढ़ जाती है जब हम आज़ादी का कोरस गाते हुए विकास का खूब-खूब ढिढोरा पीट रहे होते हैं लेकिन यह विकास आंकड़ों तक ही सिमटा दिखाई पड़ता है। जिस विकास का माहगान सरकार और सरकारी एजंसियां ज़ोर-शोर से कर रही हैं दरअसल वह उस भारत का चेहरा है जो सरकारी आईने में ही दिखाई देता है। पर भारत का एक और चेहरा भी है। यह चेहरा उस भारत का है जहां किसानों की आत्महत्या है, बढ़ती कीमतों के बीच सिमटता दस्तरखान है, भूख और कुपोषण से होती मैतें हैं, महाजनों व सूदखोरों का खौफ है, पीड़ा है, विषमता है, बेरोज़गारी है और कुछ नहीं पाने की बेकरारी है। भारत के इस चेहरे में जीडीपी की दरें नहीं हैं, सूचकांक का उतार-चढ़ाव नहीं है, गैस के लिए देश के दो बड़े उद्योगपतियों के बीच लड़ाई नहीं है, संसद में इन दोनों की दलाली करते सांसद नहीं हैं और न ही पार्टियों का हाथ गरीबों के साथ है। भारत के इस चेहरे में भय, भूख और बेकारी है, जहां अस्सी करोड़ लोग रोज़ाना बीस रुपए भी कमा नहीं पाते हैं लेकिन देश का दूसरा चेहरा ऐसा है जहां लखपति नेता पांच सालों में करोड़पति बन जा रहे हैं। इस चेहरे में देश के बीस लोगों के लिए ही नीतियां बनाई जा रही हैं और उन्हें अमीर से अमीरतरीन बनाने के लिए सरकार हर कोशिश कर रही है। उदारीकरण के नाम पर उन आम लोगों की आंखों से सपने छीनने की कोशिश की जा रही है जो वोट डाल कर नेताओं और पार्टियों को सत्ता के शिखर पर बिठाते हैं। संसद में बढ़ती कीमतों पर चिता कम जताई जाती है, इस बात पर चिता ज्य़ादा जताई जा रही है कि भारत की नदियों से निकलने वाले तेल पर मुकेश अंबानी का हक ज़्यादा बनता है या अनिल अंबानी का। हैरत और दुख इस बात को लेकर ज़्यादा होती है जब सि तरह की बहस में बढ़-चढ़ कर वे लोग भी हिस्सा लेते हैं जो अपने को गरीब-गुरबा का हिमयाती और धरती-पुत्र कहलाने में फक्र महसूस करते हैं। देश में हर रोज़ किसान आत्महत्या करते हैं लेकिन गंभीरता से इन पर न तो किसी को नीति बनाने की पहल होती है और न इसके लिए कोई नेता या पार्टी आरपार की लड़ाई करता दिखता है। हां, देश के पैसे पर अपनी सुरक्षा के नाम पर जवानों की भीड़ जमा करने के लिए खूब-खèूब हायतौबा मचाई जाती है। देश का यह अलग चेहरा है जो संसद के बाहर और भीतर आम आदमियों में शुमार नहीं किया जा सकता। इनके लिए आम आदमी महज़ एक वोट होता है, जिसे चुनाव में इस्तेमाल करो और फिर अगले चुनावों तक उसे भूल कर वह सब करो जो उनके हित के लिए ज़रूरी होता है। यही वजह है कि गरीब और गरीब होता जा रहा है और अमीर और अमीर। नेताओं के बैंक बैलेंस हर चुनाव के कई-कई गुणा बढ़ रहा है, कैसे और कहां से यह रकम आती है, न तो कोई नेता बताना चाहता है और न ही वह दल जिससे से उनका जुड़ाव होता है। पर देश का एक चेहरा और है। इस चेहरे में देश के अस्सी करोड़ से ज्यादा लोगों का अक्स उभरता है।
पर यह चेहरा संसद और विधानसभाओं में बैठे नेताओं को नज़र नहीं आता है। आएगा भी नहीं क्योंकि इस चेहरे को देखने के लिए संवेदनशील होना बेहद ज़रूरी है वर्ना लाख कोशिश कर लें, देश की यह तस्वीर दिखाई नहीं पड़ेगी। बचपन में सुनी एक कहानी याद आ रही है। हालांकि कहानी पूरी तरह याद नहीं है पर वह कुछ सि तरह थी कि राजा के दरबार में एक जुलाहे में दावा किया कि वह बहुत नफीस कपड़े बुनता है। राजा ने उससे कहा कि वह ऐसा कपड़ा बुने जो अब तक किसी राजा ने नहीं पहनी है। जुलाहे ने हामी भर ली। जुलाहे ने राजा से कहा कि वह उनके लिए ऐसा नफीस कपड़ा बुनेगा जो आज तक किसी राजा ने नहीं पहना होगा लेकिन वह कपड़ा उसी शख़्स को दिखाई देगा जिसने कोई गुनाह किया होगा राजा को जुलाहे की यह शर्त थोड़ी अजीब लगी पर उन्होंने उस जुलाहे को कपड़ा बुुनने की मंज़ूरी दे दी।कुछ दिनों बाद दावे के मुताबिक जुलाहा राजा के दरबार में आया और राजा को अपना बुना कपड़ा पेश किया। राजा परेशान, जुलाहे के हाथ में कुछ नहीं था। पर वह यह दावा करने का जोखिम नहीं उठा सकता था क्योंक जुलाहे ने पहले ही कह दिया था कि यह कपड़ा उस व्यक्ति को ही दिखाई नहीं देगा, जिसने कोई गुनाह किया होगा। राजा पसोपेश में था कि अगर उसने कह डाला कि कपड़ा तो दिखाई ही नहीं दे रहा है तो लोग उसे पापी समझेंगे। वह इससे बचना चाहता था इसलिए उसने जुलाहे के बुने कपड़े की तारीफ में ज़मीन-आसमान एक कर दिया। दरबार में मौजूद दरबारियों और मुसाहिबों में भी असमंजस था। वे देख रहे थे कि जुलाहे के हाथ में कोई कपड़ा नहीं है पर वे पापी होने का इल्ज़ाम अपने सर नहीं ले सकते थे। इसलिए उन्होंने भी राजा की हां में हां मिलाते हुए जुलाहे की तारीफ की। यानी दरबार में मौजूद दरबारियों ने जुलाहे की शान में कसीदे पढ़ने में एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ लगी रही। ज़ाहिर है कि दर्जी से लेकर दूसरे लोगों तक वह कपड़ा गया। अब कौन शामत मोल ले और राजा को यह कहने जाए कि कपड़ा तो है ही नहीं। दर्जी ने भी कपड़ा सी कर राजा को पेश कर दिया। अब उसे पहनने की बारी थी। राजा उस कपड़े को पहन कर दरबार में आया। दरबार में मौजूद दरबारियों ने देखा कि राजा नंगा है लेकिन कोई भी यह कहना नहीं चाहता था कि राजा नंगा है क्योंकि कोई भी यह कहलाना नहीं चाहता था कि वह पापी है। पर उस सभा में एक बच्चा भी मौजूद था। राजा को नंगा देख कर उसने तपाक से कह डाला, राजा तो नंगा है। बच्चा नहीं जानता था कि राजा का मतलब क्या होता है इसलिए उसने बिना डरे-झिझके भरी सभा में कह डाला कि राजा नंगा है। दूसरी बात यह भी थी कि बच्चे ने तब तक कोई पाप नहीं किया था इसलिए उसे सच और झूट की तमीज़ थी। वर्ना वह भी उन दरबारियों की तरह ही राजा के कपड़े की तारीफ में ज़मीन-आसामान एक कर देता। 
भारत की मौजूदा तस्वीर पर नज़र डालते हैं तो कहानी कुछ-कुछ ऐसी ही नज़र आती है। राजा नंगा खड़ा है लेकिन वह अकेला नंगा नहीं है बल्कि उसके साथ खड़े लोग भी दरबार में नंगे दिखाई दे रहे हैं। दिक्कत बस सिर्फ इतनी है कि जिस हमाम में आज हम सभी खड़े हैं वहां कोी बच्चा दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता है जो सच को सच और झूट को झूट कहने की हिम्मत कर सके। हालांकि दुहाई हर कोई यह दे रहा है कि वह सच बोल रहा है और दूसरा झूट। यह किसी एक क्षेत्र की कहानी नहीं है। बल्कि हर क्षेत्र में जो कुछ भी दिखाई दे रहे है वहां गहरे अंधेरे के सिवा कुछ भी नहीं है। समय के जिस शातिर दौर से हम गुज़र रहे हैं वहां एक चमकदार दुनिया हमारे आसपास पसरी तो दिखाई पड़ती है। लेकिन इस चमकदार रोशनी के पीछे का सच एक ऐसी अंधेरी दुनिया में हमें ले जाता हैं जहां आंकड़ों की बाज़ीगरी के सिवा और कुछ नहीं है। भारत को विकास के शिखर पर खड़ा करने की खुशफहमी पालती सरकारों के पास आंकड़ों के सिवा कुछ भी नहीं है। दरअसल आज सारा खेल आंकड़ों का ही है। चैनलों में भले सच को सामने लाने के लिए तरह-तरह की दलीलें दी जा रही हैं पर दरअसल सारा खेल सच से आंखें चुराने को लेकर ही हो रही है। चाहे चैनल हों या सरकार, सारा खेल टीआरपी का है। टीआरपी की परिभाषा भले बदल जाती हो पर नंबर एक की दौड़ तो हर जगह बनी हुई हैय यह बात दीगर है कि नंबर एक बनने की सि दौड़ में चैनलों के लिए भी और सरकारों के लिए भी वह आम आदमी कहीं पीछे छूट जाता है और बाज़ार उनके सामने तरह-तरह के भेस बदल कर सामने आता है और आम आदमी के सपने, उसकी ख़्वाहिशें, उसकी महत्त्वकांक्षाएं, उसकी उम्मीदों को बेच कर सरकारें चल रही हैं और मीडिया उन्हें चला रहा है। 
मीडिया के बदलते रोल ने परेशानियां और भी बढ़ाई हैं। भाषा के स्तर पर जो गड़बड़झाला हुआ है वह तो हुआ ही है, मीडिया अब दलों और नेताओं की दलाली में जुटा है यह चिता की बात है। हां, यह सब लिखते हुए अपने आप को भी इसी हमाम में खड़ा पाता हूं क्योंकि मैं भी उसी मीडिया से जुड़ा हुआ हूं जो आज हर स्तर पर स्याह को सफेद करने में जुटा है। पर यह भी सच है कि जब अखबारों से मेरा सरोकार हुआ था तो मीडिया का चेहरा इतना गलीज़ और बदनुमा नहीं था, जितना आज है। बाज़ार ने आज अखबारों का चेहरा बदल डाला है और चैनलों ने इस बाज़ार को घरों में नए-नए तरीके से इस घरों तक पहुंचाया। फिर धीरे-धीरे वह हमारे बेडरूम तक पहुंचा और आज आलम यह है कि चैनल हर वह चीज़ परोस रहे हैं, जो बाज़ार में बिकती है। बाज़ार की इस चकाचौंध से अखबार भी नहीं बच पाए और धीरे-धीरे अखबारों की चमक बाज़ार की चमक के आगे धुंधली पड़ती गईं। ऐसे में मालिक-संपादकों ने अखबार को अखबार से बाहर जाकर देखने की नई ललक पैदा हुई। ज़ाहिर है कि इसका असर खबरो पर पड़ना ही था। अखबारों से खबरें गायब होती गईं और खबरों की जगह कार-बाज़ार बेचने का नया सिलसिला शुरू हुआ। अखबार सर्कुलेशन बढ़ाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जाने लगे। यानी एक लगाओ दो पाओ की तर्ज पर अखबार खरीदो और इनाम पाओ। सर्कुलेशन की इस होड़ में धीरे-धीरे खबरें अखबारों से निकलती गईं। खबरों की जगह चीजों को बेचने के लिए अखबारों ने अपने को मंडी में बेचने के लिए ला खड़ा किया। ठीक तभी चैनलों में टीआरपी का खेल शुरू हुआ और इसी के साथ शुरू हुआ खुला खेल फर्रूखाबादी। चेनलों में खुद को ज्यादा से ज्यादा नंगा दिखाने की एक अंधी दौड़ शुरू हुई। यह दौड़ कब, कहां और कैसे ख्तम होगी, खुद चैनलों को भी पता नहीं है। मनोरंजन चैनलों के लिए रियल्टी शो नया और लुभावना बाजार दिखाई दिया। बाज़ार के इस खेल को जानते-बूझते हुए मनोरंजन चैनलों ने खुद को नंगा करने में किसी तरह की कंजूसी नहीं की। रियल्टी शो के नाम 'सच का सामना’ और 'इस जंगल से मुझे बचाओ’ जैसे रियल्टी कार्यक्रम बना कर दर्शकों के सामने परोसने की एक वहशी जनून ने चैनलों की दुनिया को इस तरह बदला कि वह राखी सावंत भी उनके उस बाज़ार का हिस्सा बन गईं जिन्हें न तो जिस्म उघाड़ने से गुरज़ था और न ही खुद को आइटन गर्ल कहलाने में। चौबीस घंटे समाचार परोसने वाले चैनल भी इस खेल में शामिल रहे। बाज़ार में खुद को बेचने के लिए चैनलों ने खुद को बाज़ार में ला खड़ा किया। ठीक बाज़ार में बिकने वाली महिलाओं की तरह। जिस्म की मंडी में जिस तरह औरतें हर शाम लाली-पाउडर-आलता लगा कर सजी-धजी बाज़ार में खड़ी हो जाती हैं और हर गुज़रने वालों को रिझाती हैं और अशलील हरकतें कर अपने ग्राहकों को बुलाती हैं, चैनलों ने भी ऐसा ही कुछ किया। तरह-तरह के स्वांग रचे और खुद को बेचने के लिए अश्लीलता से भी परहेज़ नहीं किया। यानी आज चैनलों और जिस्म की मंडी में अपने देङ बेचने के लिए खड़ी औरत में कोई फर्क दिखता है तो सिर्फ इतना कि चैनल यह काम बड़े और भव्य तरीके से करते हैं और औरतों का अंदाज़ और तरीका भौंडा होता है। 
लोकसभा चुनाव में अखबारों ने भी खुèद को इसी तरह की मंडी में खूब-खूब बेचा। जिसने पैसा दिया उसकी खबरें छपीं। जिसने नहीं दिया उसकी पूछ सिंग्ल कालम तक में नहीं हुई। पर हैरत इस बात पर ज्यादा हुई कि खबरें छापने के लिए बाकायदा पैसे लिए गए और पैसे उन अखबारों ने खुले तौर पर लिए जो देश भर में पाक-साफ मतदान के लिए मुहिम चलाए हुए थे और जगह-जगह सभा-संगोष्ठी कर लोगों को बता रहे थे कि वे अच्छे और सच्चे प्रतिनिधि को चुनें। लेकिन अपने अखबारों के पन्नों पर वे अखबार ही सच्चे और अच्छे उम्मीदवारों को जगह नहीं दे रहे थे, क्योंकि उन सच्चों और अच्छों के पास अखबारों में खबर छपवाने के लिए पैसे नहीं थे। बक्सर से लेकर मधेपुरा और सहरसा से लेकर नवादा तक जहां गया, अखबारों का यह खेल देखा। खगड़िया में मेरे मित्र प्रद्युमन कुमार सर्वजन समाज पार्टी से चुनाव लड़ रहे थे। दो दिन वहां रहना हुआ था। देश के कई शहरों से प्रकाशित एक उर्दू दैनिक का रिपोर्टर उनसे मिलने आया था। देर तक वह मुझसे और प्रद्युमन से बातें करता रहा। चलने से ठीक पहले उसने प्रद्युमन से कहा कि उन्हें इस खबर के लिए अखबार को कम से कम दस हज़ार का विज्ञापन देना ज़रूरी है। बक्सर जाते हुए आरा में थोड़ी देर के लिएलिट्टी-कचरी खाने के लिए रुका था। साथ में पुराने मित्र शंकर आजाद और फोटो पत्रकार प्रभाकर भी थे। शंकर आजाद ने हाल ही में सर्वजन समाज पार्टी बनाई है और वे उसके अध्यक्ष हैं। आरा में थिएटर के कई लोग वहां मिलने जुलने आए थे। लेखक-रंगकर्मी शमशाद प्रेम के साथ कई लोग थे। उन्हें अपने आने की पहले ही इत्तला कर दी थी। आरा छेने की मिठाई काफèी मशहूर है। शमशाद से कह रखा था कि मिठाई खरीद कर रखना। पकौड़े वलिट्टी-कचरी खाते हुए चुनाव पर बातचीत निकली तो लोगों ने जो बताया वह हमें हैरत करने के लिए काफी था। थिएटर की उस टोली का जुड़ाव पत्रकारों से भी था। कइयों ने तो थिएटर के रास्ते ही पत्रकारिता में प्रवेश किया है इसलिए उन्हें पत्रकारिता का यह परिवेश उतना नहीं सुहा रहा है जो उन्हें बाहर से सुहाता रहा है। उन लोगों ने बताया कि अखबारों ने खबरें छापने के लिए रेट तय कर दिए हैं और बाकयदा उन्हें हर जिला मुख्यालय भेज दिया है। उन्हें यह निर्देश है कि पदयात्रा से लेकर जनसभाओं की खबरों के लिए पैसे वसूले जाएं। पैसे कितने हों, उसका पूरा उल्लेख था। ठीक किसी होटल के मीनू कार्ड की तरह खबरों की लंबाई चौड़ाई के लिए पैसे तय थे। यानी बिना पैसे दिए किसी पार्टी या उम्मीदवार की खबरें नहीं छप सकती थीं। यानी अखबारों ने तय कर रखा था कि विज्ञापन की कीमत पर वे पाठकों को खबरें परोसेंगे और हम जैसे लोग उन प्रायोजित खबरों को पढ़ने के लिए अभिश्पत थे। हैरत इस बात की थी कि इस सारे गोरखधंधे में वे अखबार ही शामिल थे जो साफ-सुथरे चुनाव की वकालत अपने-अपने तरीके से कर रहे थे। बैनरों-पोस्टरों के ज़रिए ही नहीं, गोष्ठी व सम्मेलनों के जरिए भी चुनावों पर बहस करवा रहे थे। इन अखबारों का यह दूसरा चेहरा था। यह चेहरा घिनौना और लिजलिजा था। धनबल व बाहुबल के खिलाफ लंबी-लंबी बहसें करने वाले अखबारों का यह अपने तरह का बाहुबल था जो अलग तरीके से चुनाव में आतंक फैला कर लोगों को वह खबरें परोस रहा था जो लोग पढ़ना नहीं चाहते थे। अखबारों के पैकेज का यह काला धंधा बहुत ही ईमानदारी के साथ चुनाव में चलाया गया। आरा के बाद मधेपुरा और सहरसा में भी ऐसी ही कहानी सुनने को मिली। पटना में मेरे एक पत्रकार मित्र ने भी इसकी पुष्टि की। उन्होंने तो यहां तक बताया कि कुछ खेल और देखना है तो पटना के उस पांच सितारा होटल चले जाएं, जहां एक केंद्रीय मंत्री ठहरे हुए हैं। रात में वहां संपादकों की भीड़ लगी रहती है। चुनावी दौरे से उनके आने का इंतजार करते हुए संपादक देर रात तक वहां डेरा जमाए रहते हैं कि कब मंत्री जी आएं और वे उनसे विज्ञापन हथियावें। विज्ञापन के इस खेल में पटना के अखबारों ने उस होटल को एक तरह से अपना दूसरा कार्यालय बना डाला था। उसी मित्र ने बताया कि दिल्ली से आए एक बड़े नेता से उनके इंटरव्यू करने के लिए अखबार ने कहा। साथ ही यह निर्देश भी दिया कि उनसे विज्ञापन की बात भी करनी है। पर मेरे उस मित्र ने उनका इंटरव्यू तो कर लिया पर विज्ञापन की बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। बिहार में चुनाव के दौरान कई ऐसी घटनाएं देखने-सुनने को मिलीं जिसने मीडिया का एक अलग चेहरा सामने रखा। इस खेल में भले सारा मीडिया जगत शामिल नहीं रहा हो पर उस चेहरे में मीडिया से जुड़े हर शख़्स का चेहरा दिखाई पड़ता है। क्योंकि मीडिया के इस हमाम में हम सब खड़े हैं, यह बात दीगर है कि कुछ लोग खेल रहे हैं और कुछ साइडलाइन पर खड़े तमाशा देख कर मज़े ले रहे हैं या फिर अफसोस कर रहे हैं। पर सच तो यह है कि जो कीचड़ पड़ी है वह पूरे मीडिया समाज पर पड़ी है। 
ऐसा नहीं है कि मीडिया के इस काले धंधे का ज़िक्र कहीं नहीं हुआ है। विज्ञापन के नाम पर खबरे छापने के इस गोरखधंधे की गूंज बहुत दूर तक सुनाई पड़ी है। यहां तक कि चुनाव आयोग तक में इसकी शिकायत की गई। लोकसभा चुनाव के बाद कई नेता और दल आत्ममंथन भी कर रहे हैं। न्यूज चैनलों की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। हार से उपजी खीज से कई दलों के नेताओं ने चैनलों के बड़े पत्रकारों के बारे में कई चौंकाने वाली लेकिन गंभीर जानकारी दी। चुनाव के दौरान किस तरह पैसे का लेनदेन हुआ और खबरें चलाने के लिए कैसे-कैसे धंधे हुए और कैसे मीडिया को मैनेज करने के लिए दलों ने खेल खेला उसकी जानकारी उन्होंने दी। यह सब कहते हुए पत्रकारों को वे बार-बार हिकारत से याद कर रहे थे। जितना ज़लील करना था उन्होंने किया। ऐसा कहते हुए बार-बार वे इस बात का उल्लेख भी करना नहीं भूल रहे थे कि सब पत्रकार ऐसे नहीं होते हैं और आप बुरा नहीं मानें पर सच यह है कि पत्रकार आज दलाली करने लगे हैं। हालांकि बीच में कई बार उनकी भाषा का प्रतिवाद भी किया और उनसे उस भाषा में तो नहीं पूछा जिस भाषा में वे बात कर रहे थे। पर पत्रकारों को चरित्र प्रमाण पत्र देने वाले उस नेता से जब नेताओं के चरित्र पर बात की तो उनकी आवाज़ का तीखापन गायब हो गया था। पर सच को झुटलाया तो भी नहीं जा सकता। चुनाव आयोग के पास मीडिया से जुड़ी कई शिकायतें आई हैं। शिकायतें कई तरह की हैं। पर यह शिकायतें सवाल ज़रूर खड़ा करती हैं। नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र से सत्यप्रकाश भारत ने बतौर निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव लड़ा था। उन्होंने आयोग के लिखे अपने पत्र में कहा है कि मीडिया तो जान-पहचान वाली पार्टी के उम्मीदवारों को ही जगह देती है। मेरे पास इतना पैसा नहीं है कि पंद्रह दिनों में अपने क्षेत्र के उम्मीदवारों को अपने बारे में बता सकूं। इसी तरह के कई पत्र आयोग को मिले हैं। पर सबसे ज्य़ादा शिकायत खबर की शक्ल में उम्मीदवारों के विज्ञापन छापने को लेकर है। पर मीडिया को इससे कोई मतलब नहीं है कि कौन उसक शिकायत कर रहा है। उन्हें इससे कुछ भी लेनादेना नहीं। मीडिया तो सत्ता और व्यवस्था के खेल में उलझा वह सब कुछ बोल और बेच रहा है जिसका आम आदमी से कोई ताअल्लुक नहीं है। रियल्टी शो के नाम पर तमाशा करने वाले चैनलों को भूख और गरीबी कहीं नहीं दिखाई देती। समाचार चैनल राखी सावंत के लिए दुबले हुए जा रहे हैं। वह किस से शादी करेगी, करेगी या भी नहीं उनका फोकस इसी पर है। राखी सावंत की शादी राष्ट्रीय समाचार बन रहा है और इसे बेचते हुए समाचार चैनल व अखबार अपनी पीठ थपथपा रहे हैं। उनके लिए महंगाई, किसानों की आत्महत्या, सूखते खेत, बदहाल किसान, पिसते मज़दूर कोई खबर नहीं है क्योंकि ये बाजाèर में बिकते नहीं हैं और जो बिके नहीं वह खबर कैसी। सरकार आज़ादी के नाम पर जो कोरस गा रही है और नेता जय हो का शोर रहे हैं चैनल और अखबार उन्हें ही लोगों के सामने परोस कर खुश हो रहे हैं। बहुत हुआ तो ब्लागों पर एक-दूसरे को गरिया कर अपने को महान समझने की खुशफहमी में जी रहे हैं। आम आदमी न तो चैनलों की सोच में है और न अखबारों के लिए उनका महत्त्व है। राजनीतिक दलों के लिए तो वह महज़ वोट ही है। ऐसे में हर अखबार व चैनल चुपचाप खड़ा तमाशा देख रहा है। एअर इंडिया के घाटे में कौन ज़िम्मेदार है, महंगाई दर शून्य से नीचे है पर महंगाई आसमान को छू रही है पर सरकार से यह कोई नहीं पूछता कि ऐसा क्यों और कैसे हो रहा है। मीडिया की भूमिका ऐसी नहीं रह गई है जिस पर हम बहुत गर्व कर सकें। तालियां पीट कर ट्रेनों व बसों में लोगों से पैसे वसूलने वालों की तरह ही मीडिया भी सब कुछ देख कर उनकी तरह ही ताली पीट रहा है। बल्कि कभी कभी तो यह लगता है कि आज़ादी की दुहाई देता हमारा मीडिया लाली, पाउडर, स्नो, गाजा, टिकुली, बेसर लगाए खुद को सजा-संवार कर बाजार में ग्राहक के इंतज़ार में खड़ा है, कोई आए पैसे दे और रात बिताने के लिए साथ ले जाए। जय हो के जयघोष के बीच ही कहीं भीतर बहुत भीतर बशीर अहमद मयूख की पंक्तियां उभरती हैं। बहुत पहले उन्होंने लिखा था-
भूख का शोर जो नहीं सुनते, कुछ ऐसे भी कान हैं यारों
अपनी दिल्ली में गूंगे-बहरों का एक ऐसा मकान है यारों। 
यकीन मानें, यह मकान अब बेतरह डराने लगा है। 
 
 
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