ताजा खबर
शुरुआत तो ठीक ही हुई है महाराज ! केशव प्रसाद मौर्य होंगे यूपी के सीएम ? उत्तर प्रदेश में मोदी का रामराज ! आधी आबादी ,आधी आजादी?
नए आयाम दिखा गया लखनऊ फिल्मोत्सव

 लखनऊ, सितम्बर। लखनऊ फिल्मोत्सव मे सिनेमा एक अलग आयाम में दिखा। बालीवुड और हालीवुड की चकाचौंध और ग्लैमर से दूर फिल्मोत्सव में तीनों दिन आम सरोकार की ऐसी फिल्में छायी रही जिनके विषय बेहद ज्वलंत थे लेकिन व्यावसायिकता की दौड़ में हाशिए पर चले गए। इन फिल्मों में न कहीं से फूहड़ता थी और न नंगापन लेकिन बदलते समाज की वह तस्वीर जरूर थी जिससे आज के सिनेमा का संबंध टूट सा गया है। सूर्य शंकर दास की फिल्म नियामराज का शोक गीत गहराते पर्यावरण संकट की कड़वी हकीकत से रूबरू कराती है तो राहुल ढोलकिया की फिल्म परजनिया गुजरात में गोधरा के बाद अल्पसंख्यकों पर हुए हमलों की दु:खद दास्तान बयां करती है। फिल्मोत्सव में एक सत्र बच्चों की फिल्मों के नाम रहा तो दूसरा सत्र बाइसिकिल थीफ जसी दुनिया की सबसे बड़ी फिल्मों को समर्पित रहा जिसने दूसरे विश्व युद्ध के बाद छाई गरीबी से जूङाते एक नौजवान की संघर्ष गाथा से दुनिया को हिला दिया था।

उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के वाल्मीकि रंगशाला में आज सुबह का सत्र बच्चों के नाम रहा। जनसंस्कृति मंच के दूसरे लखनऊ फिल्मोत्स में अंतिम दिन तीन खण्डों में दस फिल्में दिखाई गई। पटना की सांस्कृतिक मंडली हिराल की बाल कलाकार रूनङाुन के गीत से इस सत्र की शुरूआत हुई। इसके बाद मणिपुरी कार्टून मूीज की ओर से राजेश चक्रर्ती निर्देशित एनिमेशन फिल्म ‘हिप हिप र्हु’ दिखाई गई। जोद अख्तर ने इसमें बच्चों के लिए बहुत ही प्यारे गीत लिखे हैं जिसे शान, कविता कृष्णमुर्ति, सुनिधि चौहान जसे चर्चित गायकों ने स्र दिया है। संगीत निशीथ मेहता का है। इसके बाद अरूण खोपकर की फिल्म ‘हाथी का अंडा’ दिखाई गई। इस फिल्म में बाबा एक र्ष के किंटो से अपनी प्रिय किताब अलिफ लैला-अरेबियन रातें के बारे में बताता है और कहता है उसकी कहानी कभी खत्म नहीं होती है। इस कहानी में बाबा किंटों को एक हाथी का किस्सा सुनाता है जिसमें हाथी एक अंडा देना चाहता है लेकिन असफल रहता है।
दोपहर के सत्र में राहुल ढोलकिया की फिल्म ‘परजनिया’ और सबा दीवान की फिल्म ‘द अदर सांग’ दिखाई गई। परजनिया गुजरात में गोधरा के बाद अल्पसंख्यकों पर हमले की घटनाओं पर बनी फिल्म है। फिल्म में एक पारसी परिवार  का दस र्षीय बेटा परजन हिंसक घटनाओं के दौरान गायब हो जता है। पिता साइरस उसे ढूंढता है और इस प्रयास में उसे स्यं को बचाने के लिए लड़ना पड़ता है। फिल्म में निर्देशक गोधरा और गोधरा के बाद की घटनाओं का कारण जनने का प्रयास फिल्म के एक पात्र एलन के जरिए करता है। सबा दीवान की फिल्म ‘द अदर सांग’ वाराणसी की मशहूर गायिका रसूलन बाई की एक लुप्त गीत की खोज के जरिए उनकी जिन्दगी के तमाम पहुलुओं को सामने लाती है। साथ ही उन गीतों और इतिहास के बारे में बताती है जो लोगों की स्मृति से गायब हो गए हैं। 
शाम के सत्र में उड़ीसा में चल रहे जनसंघषरें पर बनी छह फिल्में दिखाई गईं। इन फिल्मों में सूर्य शंकर दास की नियामराज का शोक गीत, मनुष्य का अजयबघर, किस के नाम पर मारे गए शहीद, नीला माध नायक की कलिंग नगर में पर्यारण प्रदूषण, मानस मुदुली  संजय राय की नोलिया साही थी। इस मौके पर फिल्मकार सूर्या शंकर दास स्यं उपस्थित थे और फिल्म के प्रदर्शन के बाद उन्होंने दर्शकों से बातचीत की। सूर्य शंकर की नियामराज का शोकगीत, कालाहांडी  रायगडा जिले में स्थित नियमगिरि पहाड़ का होने वाले खनन पर है। इस म्यूजिक डाक्यूमेन्ट्री में डोंगरिया आदिवासी डम्बू प्रास्का लोक गायक हैं। वह अपने गीत के माध्यम से नियमगिरि के भगान नियामराज के बारे में बताते है और पहाड़ के खनन से होने वाले पर्यारण विनाश  डोंगरिया आदिवासियों के जीन पर आने वाले खतरे के दर्द को स्र देते हैं। अजयबघर सरकार द्वारा नुमाइश की स्तु बनाने के खिलाफ  आदिवासियों के प्रतिरोध की कहानी है तो उनकी पांच मिनट की फिल्म शहीद में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की उड़ीसा के आदिासियों के खदेड़ने की साजिश और प्राकृतिक संसाधनों के लूट के खिलाफ संघर्ष को दर्ज किया गया है। 
फिल्मोत्स में समकालीन भारतीय कला में जनपक्षधर प्रृत्तियां-सन्दर्भ चित्त प्रसाद, जनुल आबेदीन और सोमनाथ होर पर सुप्रसिद्घ चित्रकार अशोक भौमिक का व्याख्यान हुआ। उन्होंने स्क्रीन पर चित्रों के माध्यम से अपनी बात रखी। उन्होंने भारतीय आधुनिक कला के इतिहास में राज र वर्मा के चित्रों से शुरू करते अनीन््र नाथ ठाकुर, नन्द लाल बोस, एमएम मजुमदार, अमृता शेरगिल के दौर का जिक्र किया और इस दशक के महत् को चिन्हित करते हुए सोमनाथ होर, जनुल आबेदीन, चित्त प्रसाद के कला कर्म पर प्रकाश डाला। उन्होंने बातचीत में प्रोगेसि आर्टिस्ट ग्रुप के बारे में बताया जिसकी स्थापना हुसैन, रज और सूज ने १९४७ में की थी। उनकी बातचीत में बंगाल का अकाल और तेभागा किसान आन्दोलन का बार-बार जिक्र आया। उन्होंने साफ कहा कि जनोन्मुख होना ही आधुनिक होना है। 
 

 

email ईमेल करें Print प्रिंट संस्करण
  • जहां पत्रकारिता एक आदर्श है
  • जहां आये कामयाब आये
  • नामवर की नियति
  • चिड़िया ते बाज तुड़वाऊं?
  • प्रभाष जोशी और इंडियन एक्सप्रेस परिवार
  • एक ऋषि की यात्रा का अंत
  • असली मैदान तो यूपी बनेगा
  • राजकाज
  • भगतों की चांदी है
  • मेरठ के बांके!
  • बाबरी विध्वंस की आयी याद
  • इतिहास में उपेक्षित तिलका मांझी
  • आखिरी पड़ाव गोमोह जंक्शन
  • संगम के अखाड़े में लेफ्ट-राइट
  • एक थे लोकबंधु राजनारायण
  • अपनी जमीन ही नसीब हुई
  • रवीश के सामाजिक सरोकार
  • गिरोह क्यों कहते हैं
  • ई राजेंद्र चौधरी कौन है ?
  • मीडिया में धूमते चेहरे
  • Post your comments
    Copyright @ 2016 All Right Reserved By Janadesh
    Designed and Maintened by eMag Technologies Pvt. Ltd.