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शोपियां कांड के बाद

 राजेंद्र तिवारी

शोपियां कांड के बाद से फिर जोर-शोर से सेना और अर्धसैनिक बलों को जम्मू-कश्मीर से वापस किए जाने की बात जोर पकड़ रही है। आखिर सुरक्षाबलों से जम्मू-कश्मीर के लोगों को दिक्कत क्या है? 2000 से करीब साढ़े चार साल तक मैं जम्मू-कश्मीर में था। उस दौरान वहां जो कुछ मैने अपनी आंखों से देखा, उसे मैं यहां आप लोगों से शेयर करना चाहता हूं। 
• नवंबर 2003 की बात है। मुफ्ती को मुख्यमंत्री बने एक साल बीत चुका था, 2002 के मुकाबले हालात काफी सामान्य हो चुके थे। आप कश्मीर के किसी भी कोने में बिना किसी डर के जा सकते हैं। मैं अपने एक सहकर्मी के साथ सोनमर्ग जा रहा था। शाम का वक्त था। सोनमर्ग के करीब 25-30 किमी रह गया था कि बर्फबारी शुरू हो गई। हम लोग एक गांव के पास रुक गए। थोड़ी दूर पर सड़क किनारे सेना के दो जवान ड्यूटी पर थे। वे एक बंद दुकान के शेड के नीचे खड़े थे। हमने सोचा कि उनसे बात की जाए। हम उनके पास पहुंचे। दुआ-सलाम हुई। दोनों जवान बहुत गर्मजोशी से मिले। बताया कि वे हरियाणा के रहने वाले हैं और हमसे भी हमारे बारे पूछा। घर-परिवार की जानकारी ली और फिर बताया कि वे दो साल से घर नहीं जा पाए हैं। तभी शाम की चाय सप्लाई करने वाला आर्मी का ट्रक वहां से निकला। उन दोनों ने हमें भी चाय पिलाई। बातचीत हो ही रही थी कि सिर पर लकड़ियों का गट्ठर रखे 12-14 साल की एक कश्मीरी बच्ची अपने छोटे भाई (लगभग 10 वर्ष) के साथ आती दिखाई दी। जवान मेरे सहकर्मी से बात कर रहा था और उसे पता चल चुका था कि उसका (मेरे सहकर्मी) का विवाह नहीं हुआ है। लड़की को देखते ही उस जवान की आंखे चमक उठीं, उसने मेरे सहकर्मी से कहा भाईसाहब क्या वो लड़की पसंद है आपको? हम कुछ जवाब देते उससे पहले ही वह बोला पसंद हो तो ले जाइए। हमें लगा वह मजाक कर रहा है। तब तक वे बहन-भाई और पास चुके थे। जवान ने कहा कि भाईसाहब इस लड़की को दुकान के पीछे ले जाकर पसंद कर लो। जमे तो साथ लिए जाना। इतना कहकर वह बच्ची की तरफ बढ़ा और उसका हाथ पकड़कर ले आया और मेरे सहकर्मी से बोला ले जाइए। उसका भाई कांप रहा था, बच्ची की जान सूख चुकी थी। बर्फबारी तेज थी। हमने उस जवान से थोड़ा डपट कर कहा कि ये क्या कर रहे हो। जाने दो बच्ची को। तो दूसरा जवान बोला, साहब सब आतंकवादियों की औलादें हैं। बच्ची का भाई दूर बर्फबारी में खड़ा सब सुन-देख रहा था और किसी अनहोनी की आशंका से कांप रहा था। हमने कहा मुंशी जी, जाने दीजिए इन बच्चों को। दोनों जवानों ने उन्हें जाने दिया लेकिन हमसे बोले साहब आप डरते क्यों हो। यहां कोई कुछ नहीं बोल सकता। हम वहां से चल पड़े। मेरे दिमाग में कुछ सवाल उठे जो आज तक कौंधते रहते हैं- हमारे फौजियों को कश्मीरी लोग अपना कैसे मानें? ये जवान यहां की बच्चियों से ऐसा सुलूक इसलिए कर पाते हैं कि उनके पास असीमित अधिकार हैं, यदि कोई नानुकुर करे तो क्या ये जवान उसे या उसके घरवालों को आतंकी बताकर मार नहीं सकते? उस छोटे बच्चे के दिल-दिमाग में हमारी फौज और बाकी हिंदुस्तानियों को लेकर नफरत नहीं भर रही होगी? वह बड़ा होगा तो क्या ऐसी घटनाओं को कभी भूल पाएगा? 
• दूसरी घटना 2000 की है। जब आतंकवाद चरम पर था। सड़कें आईईडी की होती थीं। हम सुबह-सुबह श्रीनगर से बारामुला जा रहे थे। मेरे साथ गाड़ी में बारामुला के एक कश्मीरी मित्र थे। हम पट्टन के बाहर पहुंचे थे कि देखा ट्रैफिक रुका हुआ है। हम अपनी गाड़ी को धीरे-धीरे बढ़ा रहे थे। तभी बीएसएफ जवान ने हमें रोक दिया- देख नहीं रहे हो इनकाउंटर चल रहा है। बातचीत करने पर पता चला कि वहां से बीएसएफ का काफिला जा रहा था कि थाने के ठीक सामने आईईडी विस्फोट हो गया। अलबत्ता, बीएसएफ के किसी व्यक्ति को कोई चोट नहीं लगी। हम वहीं रुक गए। हमने अपने कश्मीरी मित्र से कहा कि चलो इन जवानों से बात करके पता करते हैं कि कब तक रास्ता खुलेगा। कश्मीरी मित्र ने कहा कि मैं गाड़ी से नहीं उतरूंगा, आप लोग जाइए। हमने जवानों से बात की तो पता चला कि हो सकता है रात हो जाए। हम उन जवानों से बात करते रहे। बातों-बातों में पता चला कि जवान उप्र के हैं। उप्र के होने के नाते थोड़ा भाई-चारा पनप गया। हमें चिंतित देखकर उन जवानों ने कहा चिंता मत करिए, हम अभी एक-दो घंटे में निकलेंगे तब आप अपनी गाड़ी हमारे पीछे लगा लेना। हमने ऐसा ही किया। लेकिन जैसे ही हमने पट्टन पार किया कि फौजियों ने हमें रोक लिया- तुमको पता नहीं है कि कर्फ्यू लगा हुआ है। हमने कहा हम पत्रकार हैं। फौजियों ने इसे अनसुना करते हुए हमारी गाड़ी के दरवाजे खोले और हम सब से हाथ ऊपर करके बाहर निकलने को कहा। हम बाहर निकले। वे गालियां दे रहे थे। हमारे कश्मीरी मित्र सबसे ज्यादा परेशान थे। वहां मौजूद अधिकतर फौजी दक्षिण भारतीय लग रहे थे। हमें खड़े-खड़े करीब 15 मिनट बीते होंगे कि इस फौजी ने हमारी गाड़ी पर लगा अखबार के नाम का स्टिकर पढ़ा और फिर पूछा कहां काम करते हो, तुम लोग। हमने बताया। वह फौजी बंगाली था, हिंदी पढ़ लेता था और हमारे अखबार के मुख्य प्रसार क्षेत्र की छावनी में रह चुका था। लिहाजा उसने जांच-पड़ताल कर हमें जाने दिया। चलने के बाद हमने अपने कश्मीरी मित्र से पूछा कि आपने वहां गाड़ी से नीचे उतरने से क्यों मना कर दिया था, यह तो आपका इलाका है, उनका कहना था-जनाब ये जो बीएसएफ है, बहुत खतरनाक है। कश्मीरी को ऐसे मौकों पर बिना बात किए गोली मार सकती है। जिंदा में तो मुजाहिदीन हुए नहीं मारकर ये हमे मुजाहिदीन बना देंगे। 
• तीसरी घटना दिसंबर 2003 की है। मुफ्ती साहब की सरकार चल रही थी। श्रीनगर मे हम अपने माकेर्टिंग एक्जीक्यूटिव के घर जा रहे थे। श्रीनगर में हर गली पर सीआरपीएफ की पोस्ट हुआ करती थी। हमने देखा कश्मीरी बड़े आराम से सीआरपीएफ वालों से बात कर रहे थे। उनकी एक पोस्ट के सामने दो कारें भी खड़ी दिखाईं दीं लेकिन उससे अगली पोस्ट पर हमें अपनी कार खड़ी करने से सीआरपीएफ ने बना कर दिया। पता किया कि माजरा क्या है? पता चला, सीआरपीएफ से कश्मीरी नहीं डरते हैं। हां अपने घर या गली के सामने बनी पोस्ट पर तैनात जवानों की जेब गर्म करनी पड़ती है। एक स्थानीय आदमी ने कहा कि ये तो पुलिस से भी अच्छे हैं। 
हालांकि इन घटनाओं को अरसा बीत चुका है। जम्मू-कश्मीर में हालात भी बदल चुके हैं और सुरक्षाबलों का रवैया भी बदला ही होगा, खासतौर पर मुफ्ती सरकार के तीन साल के दौरान। लेकिन ये घटनाएं तमाम सवाल भी खड़ी करती हैं और तमाम सवालों का जवाब भी देती हैं। आपका क्या कहना है? 
हो सकता है, आप में से अधिकतर के अनुभव इससे उलट रहे हों और ये घटनाएं अपवादमात्र हों। तो आइए शेयर करें कश्मीर को लेकर अपने अनुभव, अपने विचार----
लेखक  भास्कर वेबसाइट्स के सम्पादक है। 
 
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