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आफत में फंसे हैं आडवाणी

 आलोक तोमर 

लाल कृष्ण आडवाणी जैसी आफत में फंसे हैं वैसी भारत में कम नेताओं के सामने आई होगी। एक तरफ माफी की मुद्रा में उन्होंने जसवंत सिंह को पटाने की कोशिश की और कहा कि मेरी आत्मा नहीं चाहती थी कि जसवंत सिंह को निकाला जाए तो जसवंत सिंह ने जवाब दिया कि एक महीने क्या आत्मा सो रही थी? इसके अलावा भारतीय जनता पार्टी ने भी जसवंत सिंह को ले कर दिए गए बयान पर खासी नाराजगी है। सीधे पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह से ले कर आडवाणी शिविर के अरुण जेटली और सुषमा स्वराज ने कहा कि दुख हम सबको हुआ है मगर आडवाणी जी को याद रखना चाहिए कि पार्टी सबसे पहले है। मगर सबसे सही हमला गोवा के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और आडवाणी के शिष्य रह चुके मनोहर पारीकर ने किया है। उन्होंने कहा है कि आडवाणी साल दो साल के मेहमान है और उन्हें इज्जत से खुद रिटायर हो जाना चाहिए। यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पारीकर को संघ परिवार राजनाथ सिंह की जगह भाजपा का अध्यक्ष बनाने की भूमिका बना चुका है। पारीकर का बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि गोवा से लगे हुए महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और आडवाणी के सामने धर्म संकट हैं कि वे स्टार प्रचारक के तौर पर गए और सरकार नहीं बनी तो उनकी रही सही इज्जत भी धूल जाएगी। महाराष्ट्र में टिकट के बंटवारे को ले कर वैसे ही झगड़ा है और मनोहर जोशी के घर में हमला भी हो चुका है। विधानसभा चुनाव के बाद आडवाणी भाजपा कार्यकर्ताओं की रैली बुलाना चाहते हैं और वहां कहना चाहते हैं कि पार्टी अभी तक जीवित है। हाल में जो विदेशी अतिथि आडवाणी से मिलने आए उनसे भी आडवाणी ने सफाई की मुद्रा में कहा कि चुनाव के नतीजे बताते हैं कि भारत का लोकतंत्र परिपक्व हो चुका है और छोटी मोटी पार्टियों को उसने निरस्त कर दिया है। गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता मनोहर पारीकर ने अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी पर निशाना साधते हुए कहा है कि उनकी राजनीतिक पारी लगभग समाप्त हो चुकी है। पारीकर ने कहा कि आडवाणी की सक्रिय राजनीति में अब बस कुछ ही वर्षो की पारी बची है। उन्होंने कहा कि अचार तैयार होने में एक साल का समय लगता है लेकिन आप अगर इसे दो या उससे अधिक साल तक रखते हैं तो वह खराब होने लगता है। आडवाणी की पारी लगभग समाप्ति की ओर है। उनके पास एक.दो साल हैं। हो सकता है कि उसके बाद वे पार्टी के मार्गदर्शक की भूमिका में आ जाएं।नेतृत्व परिवर्तन की मांग करते हुए पारीकर ने कहा कि पार्टी को किसी युवा को अध्यक्ष के रूप में पेश करना चाहिए, जिसकी विश्वसनीयता हो। उन्होंने कहा कि मैं बुजुर्गो के खिलाफ नहीं हूं लेकिन भाजपा को उन नेताओं को तरजीह देनी चाहिए जो 40 से 60 की उम्र के हों। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के उत्तराधिकारी के रूप में जिन युवा नेताओं के नामों की चर्चा है, उनमें पारीकर भी हैं।जहां तक जसवंत सिंह के बारे में आडवाणी के बयान का सवाल है तो आडवाणी जानते हैं कि पार्टी में आम जनमत जसवंत सिंह के साथ हैं और आडवाणी एक लंबी भारत यात्रा पर निकलने वाले है इसलिए रास्ते में उठने वालें सवालों का अभी से जवाब दे रहे है। मगर वे पारीकर का क्या करेंगे जिन्होंने उन्हें बाकायदा सड़ा हुआ  आचार कह दिया हैं। पारीकर ने आडवाणी की तुलना सचिन तेंदूलकर से की और कहा कि सचिन भी महान खिलाड़ी है लेकिन जल्दी ही उन्हें भी रिटायर होना पड़ेगा। जसवंत सिंह जयपुर में थे और उन्होंने कहा कि तथाकथित निष्कासन के बाद आडवाणी एक महीने तक खामोश रहे क्योंकि वे अपने आपको बेदाग साबित कर के इल्जाम दूसरो पर मढ़ना चाहते थे। उन्होंने कहा कि इस बीच हो सकता है कि आडवाणी ने मेरी किताब पढ़ ली हो और वे मेरे विचारों से सहमत हो गए हों। जसवंत सिंह ने कहा कि आडवाणी मेरे पुराने मित्र हैें और भले ही मैं पार्टी में नहीं हूं मगर उन्होंने पार्टी में जो योगदान किया है उसे याद दिलाने की जरूरत नहीं है। पार्टी के महासचिव अनंत कुमार तक ने कहा कि भाजपा के संसदीय बोर्ड में जो फैसला लिया गया था वह निर्विरोध था और सामूहिक था। आडवाणी इसमें शामिल थे और सच यह है कि निष्कासन शब्द सबसे पहले उन्होंने ही बोला था। राजनाथ सिंह तो खामोश है और वैसे भी उनके बोले का कोई अर्थ होता नहीं है, मगर पार्टी के ज्यादातर महत्वपूर्ण नेता याद दिला रहे हैं कि कांधार कांड में हर फैसले में आडवाणी शामिल थे मगर उन्होंने अपनी किताब और बाद के बयानों में बार बार कहा कि उन्हें कुछ पता नहीं था। इसका सीधा सीधा अर्थ यह है कि पार्टी की राय में आडवाणी बूढ़े हो चुके हैं और अपनी यदाश्त भी काफी हद तक खो चुके है इसीलिए आडवाणी का राजनैतिक पुनर्वास अब संभव नहीं दिखता और देर सबेर उन्हें पार्टी का नेतृत्व छोड़ना ही पड़ेगा। अपने हाल के बयानों से उन्होंने यह और सुनिश्चित कर दिया है कि पार्टी के मार्गदर्शक की भूमिका में भी अब वे नहीं रह जाने वाले हैं।   लाल कृष्ण आडवाणी ने सबसे खतरनाक खेल यह खेला कि अटल बिहारी वाजपेयी के विश्वासपात्र रहे जसवंत सिंह, अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा को ठिकाने लगाने की पहल कर दी। इसमें दिक्कत यह है कि जिन लोगों को आडवाणी ठिकाने लगाना चाहते हैं उनका बौध्दिक आधार इतना प्रबल था और आज भी हैं कि उनके खिलाफ कोई भी फैसला लेने की हिम्मत पार्टी या आडवाणी दोनों में नहीं है। आखिर अरुण शौरी इतने दिनों से लगातार बगावत का बिगुल बजा रहे हैं और यहां तक चुनौती दे चुके हैं कि अगर पार्टी में हिम्मत हैं तो उन्हें निकाल कर बताए। इसके बावजूद उन्हें सिर्फ एक कारण बताओं नोटिस दिया गया है जिसका जवाब भी अरुण शौरी ने देना उचित नहीं समझा क्योंकि जिस दिन अरुण शौरी जवाब देंगे उस दिन पार्टी जमीन पर आ जाएगी। अरुण शौरी के तर्कों और उनके हमलों का जवाब देने की हालत में आडवाण्ाी अब भी नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि अरुण शौरी को आडवाणी या राजनीति से कुछ लेना देना नहीं हैं और अरुण शौरी जैसे फक्कड़ नेता का पार्टी कुछ बिगाड़ भी नहीं सकती।
 
 
 
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