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हुसैन से थोडा निराश हूँ,-वामन ठाकरे

हिमांशु बाजपेयी

 विजुअल आर्ट्स के क्षेत्र में देश के सबसे बड़े नाम वामन ठाकरे जी को फोटोग्राफी,चित्रकला और रचनात्मकता का त्रिवेणी संगम माना जा सकता है। विश्व के सर्वश्रेष्ठ पचास फोटो आर्टिस्ट्स में स्थान रखने वाले वो भारत के एकमात्र व्यक्ति हैं,इसके साथ ही वह रॉयल हिस्ट्री सोसाइटी लन्दन से मान्यता प्राप्त देश के एकमात्र फोटो-हिस्टोरियन भी हैं। फोटोग्राफी,चित्रकला,और कलमकारी तीनों में ही बुलंदी पर काबिज़ पद्मश्री वामन ठाकरे जी से भास्कर.कॉम के हिमांशु बाजपेयी ने उनके भोपाल स्थित आवास पर उनके जीवन और विसुअल आर्ट्स से जुड़े मुख्तलिफ पहलुओं पर बातचीत की-

- ठाकरे जी फोटोग्राफी और चित्रकला आप दोनों के ही सिद्धहस्त कलाकार हैं,सूक्ष्मतम रूप में इन कलाओं के मूल में वो कौन सा बिंदु है जिसने आपके अन्दर कलात्मकता को विकसित किया ?
वामन ठाकरे-  मेरा मानना है की कलात्मकता का विकास आत्मबोध से होता है या आत्मिक प्रेरणा से। चित्रकला में चित्रकार किसी ऑब्जेक्ट को उसके सुन्दरतम रूप में चित्रण करना चाहता है लेकिन ये सुन्दरता उसके अपने बोध से जन्म लेती है। इसी लिए मैं बार बार कला में नवीनता और अलग होने की बात करता हूँ. मैं रामटेक में पैदा हुआ । ये दो पहाडियों के बीच बसा एक मनोरम स्थल है जिसे कालिदास ने रघुवंशम की रचना करने के लिए चुना था। भगवान् राम के बनवास से भी इसकी मान्यता जुडी है. इसी उर्वर भूमि की मोहक छटा ने मेरे मन में सुन्दरता को महसूस करने की वृत्ति विकसित की। चित्रकला ने मुझे शुरू से ही आकर्षित किया क्यूंकि मेरे लिए उन दिनों यही मेरे लिए सहज थी। कोयले की मदद से मन में उपजती किसी भी छवि को दीवार पर उकेर देता था,और फिर गुरुजनों के प्रोत्साहन से मैं एक चित्रकार बनने में सफल हुआ।
कोयले से दीवार रंगते हुए आप कूची और कैनवास तक पहुंचे , लेकिन एक चित्रकार फोटोग्राफी की तरफ कैसे मुड़ा?
मैं मूलतः एक चित्रकार ही हूँ क्यूंकि मेरी कलाभिव्यक्ति का पहला जरिया चित्रकला ही थी।लेकिन जब मैं कला के क्षेत्र में ही करियर बनाने को लेकर गंभीर हुआ तो फिर मैंने फोटोग्राफी और चित्रकला दोनों का विधिवत प्रशिक्षण देश की सबसे प्रतिष्ठित कला संस्थाओं से लिया।ये मेरे लिए बहुत अच्छा रहा क्यूंकि चित्रकला से जुड़े एक बुरे अनुभव ने मेरा मन इस तरफ से खट्टा कर दिया और मैं फोटोग्राफी की तरफ मुड़ गया.ये भी एक सही घटना ही थी ।क्यूंकि मुझे बड़ी पहचान इसी कला ने दी। इसके अलावा फोटोग्राफी में चित्रकला से ज्यादा स्कोप है देश में भी और विदेश में भी.फोटोग्राफी में चित्रकला की अपेक्षा ज्यादा प्रदर्शनियां, प्रतियोगिताएं और सम्मान हैं।
आप चित्रकला से जुड़े किसी बुरे अनुभव के बारे में बता रहे थे जिसने चित्रकार के तौर पर आपका मन खट्टा कर दिया,क्या था वो अनुभव ?
1963-64 की बात है तब तक मैं चित्रकार के तौर पर ही सक्रिय था। दिल्ली में ललित कला अकादमी में पेंटिंग्स की प्रदर्शनी के लिए मैंने भी अपने तीन पोट्रेट भेजे थे। जोकि रिजेक्ट हो गए थे.मुझे रिजेक्ट होने पर ज्यादा दुःख नहीं हुआ क्यूंकि वो मेरा शुरूआती दौर था और मैं मानता था की ललित कला अकादमी की प्रदर्शनी में शामिल होने के लिए वाकई बहुत उत्कृष्टता चाहिए। सो अगर मैं नहीं चुना गया तो कोई बात नहीं.मैं तब सरकारी सेवा में था. किसी काम से दिल्ली गया तो सोचा की अपने पोट्रेट अकादमी से वापस ले लूँ। मैं जब ललित कला अकादमी के स्टोर में पहुंचा तो सन्न रह गया.मेरे पोट्रेट मैंने जिस तरह पैक करके भेजे थे वो उसी हालत में थे।उन्हें देखना तो दूर खोला तक नहीं गया था। मुझे उस दिन ह्रदय से बहुत पीडा हुई और फिर मैंने अपने दुसरे हुनर फोटोग्राफी की आज़माइश शुरू की।
फोटोग्राफर के बतौर आपके जीवन का सबसे मुश्किल अनुभव कौन सा रहा ?
अब उम्र के अठहत्तरवें पड़ाव पर हूँ तो सैकडों अनुभव हैं ख़ुशी के भी,रंज के भी। लेकिन एक अनुभव मुझे सबसे पहले याद आता है क्यूंकि वो मेरे लिए सबसे मुश्किल भी था और सबसे यादगार भी।उस वक़्त फखरुद्दीन अली अहमद साहब भारत के राष्ट्रपति थे।अहमद साहब के बारे में ये बात चर्चित थी की उनका फेस फोटोजेनिक नहीं है।राष्ट्रीय फोटो डिविज़न के पांच सबसे उम्दा फोटोग्राफरो ने जिनमे डिविज़न के तत्कालीन संचालक टी काशीनाथ जी भी थे, अहमद साहब की तस्वीर ली। लेकिन एक भी तस्वीर ठीक नहीं आयी.तब काशीनाथ ने मेरे नाम का प्रस्ताव रखा. मुझे भोपाल से राष्ट्रपति भवन बुलाया गया तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. मैंने अहमद साहब से मुलाक़ात की और कुछ देर उनसे बात की।अहमद साहब मुझसे बोले तुम अपना काम भी तो करो.मैंने कहा सरकार मैं वही कर रहा हूँ,असल में मैं उनका पोज़ तलाश रहा था.मैंने उनकी सात फोटो लीं और वापस आ गया.मैं संतुष्ट था.जब में डेवलपिंग के लिए डार्करूम में पहुंचा तो मेरे होश उड़ गए। वो फिल्म आउटडेटेड थी जिसके कारण इमेज ठीक नहीं बनती.मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गयी। बहुत देर तक मैं फिल्में हाइपो में फिक्स कर रोता रहा.उसके बाद जैसे मैंने अपनी साधना उस फिल्म को डेवलप करने में झोंक दी। रीड्यूस एंड रीडेवलप प्रोसेस से मैं उस निगेटिव को सुधारने में सफल रहा। अहमद साहब को वो तस्वीर एक बार में ही पसंद आ गयी। काशीनाथ साहब को यकीं ही नहीं हुआ की आउटडेटेड फिल्म से भी ऐसी प्रिंट मिल सकती है। 
कलाकारों का श्लील -अश्लील के घेरे में फँसना एक आम बात है , कुछ लोग तो हमेशा कलाकारों को निशाने पे रखते हैं , ऐसा कलाबोध में अंतर के चलते होता है या किसी और वजह से ?
इस सवाल का कोई एक आदर्श उत्तर संभव नहीं। श्लील अश्लील आपके व्यक्तिगत दायरे हैं।कला के तौर पर कई बार वो चीज़ें श्लील में गिनी जा सकती हैं जो आमतौर पर अश्लील हो सकती हैं.इसका यह मतलब बिलकुल नहीं की कला का आम जीवन से कोई सरोकार नहीं लेकिन कला आपमें सौंदर्य को देखने का नजरिया विकसित करती है वो आपको सतह से गहराई में ले जाती है।
तो आप मकबूल फ़िदा हुसैन साहब की विवादित तस्वीरों पर उन्हें सही ठहराते हैं ?
बिलकुल नहीं, मैं इस मामले पर हुसैन साहब से थोडा निराश हूँ,मैंने पहले ही कहा की कला में नवोन्मेष की सम्भावना हमेशा रहती है लेकिन आप मान्यताओं को खारिज नहीं कर सकते और ये भी अहम् है की आपका उद्देश्य विशुद्ध कलावादी है भी या नहीं ? हुसैन साहब कलाकार के तौर पर जब ढलान पर थे तब उन्होंने तसवीरों में इस तरह के प्रयोग शुरू किये,अपने चरम में उन्हें इसकी ज़रूरत कभी नहीं पड़ी। ये जानते हुए भी की हिन्दुस्तान का एक बड़ा समुदाय चाहें जितना भी कलावादी हो जाए इसे कभी स्वीकार नहीं करेगा। कई बार बड़े लोगों से बड़े सामजिक दायित्व भी जुड़े होते हैं.मैं इसे एक सनक के तौर पर किया गया काम मानता हूँ जिसमें व्यक्तिगत प्रदर्शन ज्यादा था।
एक कलाकार के तौर पर आपने लम्बा सफ़र तय किया है,अगली पीढी तक ये सफ़र जारी रह सके इसके लिए आप क्या सोचते हैं ?
मेरी कलाकृतियाँ मेरी संतानों की तरह हैं और उम्र के इस पड़ाव पर मुझे यही चिंता खाए रहती है की मेरे बाद इनका क्या होगा।ये खजाने अगली पीढी समझ भी पाएगी या नहीं।मैंने कई बार सरकारी संस्थाओं से गुजारिश की की मेरे संग्रह को संभाला जाय लेकिन हर बार मुझे निराशा ही हाथ लगी. वो मुझसे मुफ्त में ये सब चाहते हैं और मैं कहता हूँ की ये बहुत कीमती हैं। जब अपनी तस्वीरों को विदेशी हाथ में जाते देखता हूँ, तो बहुत दुःख होता है लेकिन सरकार इसके लिए ज़रा भी गंभीर नहीं दिखती। अपने प्रदेश का कालिदास सम्मान पाने की ख्वाहिश भी सरकार से पूरी नहीं हुई.लेकिन अपने काम से पूरी तरह संतुष्ट हूँ.
नयी पीढी के लिए क्या कहेंगे ?
नयी पीढी बहुत प्रतिभावान है लेकिन उसमे एक बुराई है की वह हर चीज़ को इंस्टंट चाहती है। कला में आपको वक़्त लगता ही है। बिना उसके आप निखर नहीं सकते।
 
 
 
 
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