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पुनर्जन्म की पहेली

 हृदय नारायण दीक्षित

अमेरिका के एक वैज्ञानिक ने अमरत्व का रसायन खोजने का दावा किया है। अमरत्व मनुष्य की आदिम अभिलाषा है। विश्व के प्राचीनतम ज्ञान रिकार्ड ऋग्वेद में देवताओं को अमर बताया गया है, देव अमृत बंधु हैं, बाकी प्राणी मरण धर्मा हैं। वैदिक साहित्य में अमरत्व की चिन्तनधारा है। विज्ञान इस दिशा में सक्रिय है, अच्छी बात है लेकिन पुनर्जन्म का प्राचीन भारतीय विचार विज्ञान की सबसे बड़ी चुनौत्ी है। पुनर्जन्म से जुड़ी तमाम घटनांए विश्व स्तर पर अक्सर घटित होती हैं। एक अमेरिकी ने भारत के कई सिने कलाकारों के पूर्वजन्म की दिलचस्प जानकारी पिछले बरस ही दी थी। गीता विश्वख्याति का दर्शनग्रन्थ है। यहां अर्जुन के प्रश्न हैं, श्रीकृष्ण के उत्तर हैं। चैथे अध्याय की शुरूवात प्राचीन इतिहास से होती है। श्री कृष्ण ने कहा “प्राचीन काल में यह योग ज्ञान मैंने विवस्वान को बताया था। विवस्वान ने मनु को बताया और मनु ने इक्ष्वाकु को। (गीता 4.1) आगे कहा, “यह ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी राजर्षि जानते आए हैं।” (वही, 2) अर्जुन ने श्रीकृष्ण को टोंक दिया, “आपका जन्म तो बाद में हुआ, विवस्वान का पहले। तब आपने उन्हें कैसे ज्ञान दिया?” (वही, 4) तर्क स्वाभाविक है। इक्ष्वाकु ऋग्वेद में राजा हैं। मनु उनके पहले हैं। विवस्वान सूर्य के पर्यायवाची है। श्रीकृष्ण अर्जुन के समकालीन हैं। गीता महाभारत युद्धपूर्व सम्पन्न श्रीकृष्ण अर्जुन सम्वाद है। महाभारत के शान्तिपर्व में युद्ध के बाद का विवरण है। यहां भी पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान हस्तांतरण का यही क्रम है “पूर्व काल में विवस्वान ने मनु को, फिर मनु ने इक्ष्वाकु को यह ज्ञान दिया। परम्परा चलती रही।” (शान्तिपर्व 348) लेकिन यहां शुरूवात श्रीकृष्ण से नहीं विवस्वान से होती है, गीता में यह शुरूवात श्रीकृष्ण से होती है। अर्जुन की जिज्ञासा सही है। श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया “बहूनि में व्यतीतानि जन्मानि तव - मेरे तुम्हारे (यानी सबके) पहले बहुत से जन्म हो चुके हैं। मै। जानता हूँ, तू नहीं जानता।” (4.5) यहां पुनर्जन्म की स्थापना है। पुनर्जन्म भारतीय आस्था है, लेकिन ईसा ने भी श्रीकृष्ण की ही तर्ज पर कहा था “जब अब्राहम हुआ था मैं उसके भी पहले था।” (जौन, 8.58) जैसे कृष्ण ने स्वयं को पूर्व हुए लोगों के भी पहले विद्यमान बताया वैसे ही ईसा ने स्वयं को पूर्व हुए एब्राहम के भी पहले विद्यमान बताया। असल में प्रकृति सतत् परिवर्तनशील है। रूप बदलते रहते हैं, व्यक्त अव्यक्त होता है सो दिखाई नहीं पड़ता। अव्यक्त फिर लौटता है, व्यक्त होता है, नया रूप होता है, नया जन्म दिखाई पड़ता है। पुनर्जन्म पहेली है। दर्शन और विज्ञान की चुनौती है। वैदिक साहित्य में 4 वेदों के साथ ब्राह्मण ग्रन्थों व उपनिषदों की गणना होती है। वेद इतिहास हैं, स्तुतियां हैं, काव्य हैं, इनमें प्रत्यक्ष संसार है, भौतिक सुख हैं, गीत गाता आनंदमगन समाज है। लेकिन प्रत्यक्ष के परे तमाम गहन अनुभूतियां हैं। उपनिषद् दर्शन ग्रन्थ है। समूचा वैदिक साहित्य अनूठा है। यहां ढेर सारी जिज्ञासाएं हैं। लेकिन पुनर्जन्म की मान्यता से भरापूरा है। ऋग्वेद का चैथा मण्डल ऋषि वामदेव गौतम की अनुभूति है। वामदेव कहते हैं “अहं मनुरभवं सूर्यश्चाहं, कक्षीवां - मैं मनु हुआ, मैं सूर्य हुआ, मैं ही कक्षीवान ऋषि हूँ मैं ही अर्जुनी पुत्र ‘कुत्स’ हूँ और मैं ही उशना कवि हूँ। मुझे ठीक से देखो - पश्यतां मा”। (ऋ0 4.26.1) ऋग्वेद में अंध आस्था नहीं है। सारा मजा गहन अनुभूति का है। वामदेव कहते हैं “मैंने गर्भ (ज्ञान गर्भ) में रहकर इन्द्रादि सभी देवताओं के जन्म का रहस्य जाना है।” (वही 4.27.1) जन्म प्रक्रिया रहस्यपूर्ण है। ऋग्वेद (1.164.30)में कहते हैं “मरणशील शरीरों के साथ जुड़ा जीव अविनाशी है। मृत्यु के बाद यह जीवन अपनी धारण शक्ति से सम्पन्न रहता है और निर्बाध विचरण करता है।” यहां “मृत्यु के बाद भी निर्बाध विचरण” की स्थापना ध्यान देने योग्य है। ऋग्वेद के प्रथम मण्डल का 164वाँ सूक्त गहन रूप से पठनीय है। ऋषि जीवों द्वारा भिन्न भिन्न शरीर/योनियाँ ग्रहण करने का रहस्य बताते हैं लेकिन अपने बारे में ईमानदार वक्तव्य देते हैं “मैं नहीं जानता, मैं कैसा हूँ? मैं मन से बंधा हुआ चलता हूँ। प्राचीन सत्य मेरे सामने प्रकट हुआ तो यह वाणी आई।” (1.164.37) फिर कहते हैं “अमत्र्य जीव मरणधर्मा शरीर से मिलते हुए विभिन्न योनियों में जाता है। अधिकांश लोग शरीर को ही जानते हैं पर दूसरे (जीव) को नहीं जानते।” (1.164.38) ऋग्वेद के एक दिलचस्प देवता अदिति सर्वव्यापी हैं, वे अंतरिक्ष हैं, आकाश हैं, पृथ्वी हैं, भूत हैं, भविष्य हैं। अदिति ही मृत माँ पिता दर्शनकराने में सक्षम है। ऋषि कहते हैं “हम किस देव का स्मरण करें? जो हमें अदिति से मिलवाएं, जिससे हम अपने माँ पिता को देख सकें?” (1.24.1) उत्तर है “हम अग्नि का स्मरण करें। वे हमें अदिति से मिलवाएंगे, अदिति के माध्यम से हम माँ पिता को देख सकेंगे। (वही, 2) ऋग्वेद (10.14) के देवता यम हैं “वे पुण्यवानों को सुखद धाम ले जाते हैं। विवस्वान के पुत्र यम के पास ही सबको अन्त में जाना पड़ता है।” (10.14.1) मृत्यु सारा खेल खत्म नहीं करती। मृत्यु के बाद भी यात्रा है। यह यात्रा यम के जिम्मे है। कहते हैं, “जिस मार्ग से पूर्वज गये हैं, उसी मार्ग से सभी मनुष्य ‘स्व-स्व’ (कर्म) अनुसार जाएंगे।” (वही, 2) आगे मृत पिता से प्रार्थना है “जिन जिन मार्गो से पूर्वज गये हैं हे पिता! आप उसी मार्ग से गमन करें।” (वही, 7) कहते हैं “हे पिता! पुण्यकर्मो के कारण पितरों के साथ उच्च लोग लोक में रहे। पाप कर्मो के क्षीण हो जाने के बाद पुनः शरीर धारण करें - सं गच्छस्व तन्वा सुवर्चा”। (वही, 8) यहां मृत पिता के पुनर्जन्म की कामना है। अथर्ववेद के ऋषि कहते हैं “वह पहले था। वही गर्भ में आता है, वही पिता वही माता वही पुत्र होता है। वह नए जन्म लेता है। (अथर्व 10.8.13) अथर्ववेद ऐसी स्थापनाओं से भरा पूरा है। आना-जाना, आवागमन प्राचीन मान्यता हैं। आत्मतत्व नहीं मरता, शरीर क्षीण होता है, रूग्ण होता है, वृद्ध होता है, मर जाता है। बोधपूर्वक जिया गया एक जीवन काफी हैं। संसार दुखमय है। बुद्ध ने यही देखा था। उन्होंने निर्वाण को दुखमय जीवन से मुक्ति का उपाय बताया। बार-बार का जन्म दुखदायी है। समूचा उपनिषद् साहित्य पुनर्जन्म से मुक्ति का दर्शन है। ईशावास्योपनिषद् के ऋषि ने आत्म तत्व बोध की उपेक्षा करने वालों के बारे में कहा कि वे मर कर अंध लोकों में जाते हैं।” (मन्त्र 3) वृहदारण्यक उपनिषद् (ब्रहा्मण 4 मन्त्र 10) में भी यह मन्त्र दोहराया गया है। ईशावास्य0 और वृहदारण्यक0 के ऋषि अविद्या के उपासकों को ‘गहन अंधकार’ में भेजते है। बुद्ध कहते हैं “भिक्षुओं चार सत्यों का बोध न होने से ही मेरा, तुम्हारा संसार में बार-बार जन्म ग्रहण करना हुआ है। वे चार बाते हैं - आर्यशील, आर्य समाधि, आर्य प्रज्ञा और आर्य विमुक्ति।” (अंगुत्तरनिकाय भाग 2) बुद्धदर्शन में पुनर्जन्म का कारण अज्ञान है, उपनिषद् दर्शन में अविद्या है। पुनर्जन्म दोनों में है। अविद्या और विद्या का मूलस्रोत उपनिषद् हैं। बुद्ध को इसकी अनुभूति हैं। उन्होंने शिष्य आनंद को बताया “आनंद! क्या जरा - मृत्यु सकारण है? कहना चाहिए, हाँ है। किस कारण से है? कहना चाहिए ‘भव’ (आवागमन) के कारण। तब भव किस कारण है? कहना चाहिए उपादान (आसक्ति) के कारण। तो उपादान क्यों है? उत्तर है तृष्णा के कारण। इसी तरह वेदना के कारण तृष्णा, इन्द्रिय बोध नामरूप आदि के कारण वेदना है।” यहां मुख्य बात तृष्णा है। तृष्णा शून्यता निर्वाण है। उपनिषदों में भी ऐसा ही है। बुद्ध और वेद उपनिषद् पुनर्जन्म पर एक मत है। आवागमन और कार्य कारण पर भी एक जैसे है। फर्क छोटा सा है। बुद्ध के लिए यह संसार दुखमय है लेकिन वैदिक ऋषियों के लिए यह आनंदमय है। बुद्ध दुख से निवृत्ति का उपाय ‘ज्ञान’/विद्या बताते हैं। वैदिक ऋषि इस संसार और इसके परे भी आनंद लोक की चर्चा करते हैं। सांसारिक सुख अस्थाई हैं, आते हैं, जाते हैं, आवागमन या बार-बार का जन्म दुखदायी है, वे इस मुक्ति और स्थाई ब्रह्मलोक/आनंद लोक की प्राप्ति के उपाय बताते है। ऋग्वेद (9.113.10) में ऐसे लोक का प्यारा वर्णन है, “यत्र कामा निकामाश्च, यत्र ब्रध्नस्य विष्टपम् - जहां सारी कामनाएं पूरी हो जाती है, आप हमें वहां अमरत्व दें।” फिर वहां की विशेषता का वर्णन और भी प्यारा है “यत्रानन्दाश्च मोदाश्य, मुदः प्रमोद आसते - जहां आनंद है, मोद है प्रमोद है, आमोद है, वहां आप मुझे अमरत्व दें।” (वही, 11) लोक भौगोलिक अवधारणा नहीं है। असल बात है बोध। लेकिन बोध हस्तांतरणीय तकनीकी नहीं है। वरना बुद्ध अपनी ‘संबोधि’ के माध्यम से लाखों करोड़ों को बुद्ध बना डालते। श्रीकृष्ण भी परमबोध के तल पर थे। उन्होंने अर्जुन को तत्व ज्ञान दिया। महाभारत हो गया। एक दिन अर्जुन ने पूछा “आपने जो ज्ञान दिया था, वह भूल गया, दोबारा बताओ।” महाभारत का यह अंश अनुगीता है। कृष्णा ने कहा “मैंने योगसिद्ध दशा में प्रबोधन दिया था, पुनरावृत्ति संभव नहीं है।” पुनरावृत्ति ही क्यों? आत्मबोध का कोई भी हस्तांतरण असंभव है। पुनर्जन्म इसीलिए पहेली है।

 
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