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‘‘लाल सलाम‘‘ का नारा

 अरूण जायसवाल 

वाराणसी अक्टूबर । मिर्जापुर में नक्सल की समस्या दिनों-दिन जहाँ पांव पसारती ही जा रही है वहीं शासन भी समस्या के नाम पर जमकर पैसे पानी के तरह बहाने से नहीं चूक रहा है। जबकि नक्सल समस्या की जड़ की तरफ अगर झांक कर देखें तो दलित एवं गरीबों को शोषित कर पुलिस द्वारा फर्जी केसों में फंसाकर इन्हें बलात नक्सलवादी कार्यवाही के लिए समाज के माफियाओं द्वारा विवश किया जाता है तथा गरीबों के नाजुक भावनाओं को नक्सली सोच में बदल ‘‘लाल सलाम‘‘ का नारा बुलन्द कर इनके खून व पसीनों से ही इन्हें सींच माफियाओं द्वारा सफेदपोश बन इनका नियंत्रण दिल्ली, लखनऊ जैसे महानगरों में वातानुकूलित होटलों, रेस्तराओं में बैठ किया जाता है। जो सरकार के चहेते भी जाने जाते हैं। नक्सल समस्या सर्वाधिक उप्र, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ व आन्ध्र प्रदेश में होने के कारण इन प्रान्तों में व्याप्त अशिक्षा, गरीबी, एवं पिछड़ापन तो है ही किन्तु इन प्रान्तों में जातिवादी सरकार का होना सबसे बड़ा कारण है जो इन्हें अपने मकड़जाल में फंसा जबरन नक्सल सोच को मजबूत कर वोट की राजनीति करते रहते हैं। ज्ञातव्य हो कि जनपद मीरजापुर में नवम्बर 2001 में नक्सलियों ने खोराडीह में श्रमिक महिला एवं पुरूषों के वेश में पीएसी कैम्प पर धावा बोलकर 16 अत्याधुनिक असलहे तथा भारी मात्रा में कारतूस हथिया लिया था। दूसरी घटना में नक्सलियों की मुठभेड़ ग्राम ककराही में जनपद वाराणसी से आई। पुलिस से हुई इस घटना में एक दरोगा तथा एक सिपाही को शहीद होना पड़ा था। इस प्रकार अनेक नक्सली वारदात जनपद झेल चुका है। अभी 29 सितम्बर को कानून व्यवस्था की मण्डलीय समीक्षा करने जनपद में आये प्रमुख सचिव गृह महेश चन्द गुप्ता व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक बृजलाल द्वारा मण्डल के तीनों जिलों सोनभद्र, सन्त रविदास नगर एवं मीरजापुर के पुलिस अधिकारियों की आवश्यक बैठक अष्टभुजा डाक बंगले में कर नक्सल समस्या को ही हीट में रख विस्तार से समीक्षा कर इससे प्रभावित थाना क्षेत्रों को हाई-टेक करने की घोषणा किया। नक्सल क्षेत्र के थानों पर 203 विशेष पुलिस कर्मियों की भर्ती कर नक्सलियों एवं माफियाओं पर पैनी निगाह रखने की भी घोषणा किया। इस क्षेत्र में तैनात सिपाहियों को वेतन के अतिरिक्त 1500 रू0 प्रतिमाह देने की बात कही। साथ ही इस क्षेत्र में सभी थाना एवं चैकियों को अत्याधुनिक शस्त्रों व अन्य उपकरणों से लैस करने को कहा। इस तरह की व्यवस्था से कानून व्यवस्था में सुधार होना तो सम्भव हो सकता है किन्तु नक्सली सोच में ऐसे प्रबन्ध से सुधार होना प्रतीत नहीं होता। नक्सली समस्या से उबरने के लिए गरीबों के खून पसीने से राजनीतिक रोटी सेकने वाले पंच सितारा होटलों में बैठे इनके कथित मसीहों के मुखैटों को हटा बेनकाब कर इस दलदल में फंसे गरीब दलितों की समस्या का समाधान कर उनकी सोच में बदलाव ला समस्या से निजात पाया जा सकता है। 
 
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