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इस्लाम में कोई स्वतंत्र दार्शनिक क्यों नहीं ?

 हृदय नारायण दीक्षित

 दार्शनिक हिन्दू  कुरान का आदर करते हैं। यही सुविधा मुसलमान के पास नहीं है। यहां बात बेबात फतवे हैं। तर्क, प्रतितर्क और दर्शन दिग्दर्शन के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन होते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि इसी वजह से इस्लाम अनुयायियों में कोई स्वतंत्र दार्शनिक चिन्तक नहीं दिखाई पड़ता। 
धर्म को लेकर शुरु इस बहस का मकसद किसी कि धर्मिक भावनाओं को आहत करना नही बल्कि अन्तर्विरोध को समझ्ना है।    
 
प्रकृति यथास्थितिवादी नहीं है, सतत् परिवर्तनशील है। इसलिए दर्शन और विज्ञान के निष्कर्ष अंतिम नहीं होते। ब्रह्माण्ड विराट है, इसके रहस्य अनंत हैं। दर्शन और विज्ञान इन्हीं रहस्यों से भिड़न्त करते है। पुरानी आस्थाएं टूटती हैं, आस्थावादी नाराज होते हैं। आस्थावादी समाज, मत, मजहब और रिलीजन दार्शनिक तकरे से नाराज होते हैं। ईसा से 4०० बरस पहले यूनान में सुकरात को दार्शनिक कारणों से ही प्राणदण्ड दिया गया था। यूनान पश्चिमी दर्शन की केन्द्रीय भूमि है। सुकरात पर आरोप था कि वह पृथ्वी के नीचे और ऊपर स्वर्ग में क्या है? जैसे सवाल उछालता है कि वह देवताओं की खोज का प्रयत्न करता हैं। एथेन्स की कथित न्यायसभा के 5०1 सदस्यों में से 281 ने प्राणदण्ड के पक्ष में और 22० ने सुकरात को निर्दोष मानते हुए वोट दिया। अनाक्सागोरस पर भी देवों की अवज्ञा के आरोप थे। हेगल के मुताबिक अनक्सागोरस पर आरोप था कि वे देवता की अवमानना करते हैं। अनक्सागोरस को पेरिक्लेश ने मृत्युदण्ड से बचाया वे एथेन्स छोड़कर भाग गये। पेरिक्लेश की एक महिला मित्र पर भी ऐसे ही आरोप थे। हेराक्लिटस अग्नि को आदि तत्व मानते थे, अनक्सिमेनस वायु को। यूनान में दर्शन और आस्था की टक्कर थी तो भी दर्शन का विकास हुआ। यूनानी दर्शन के विकास में सुकरात जैसे तमाम पूर्वजों की जिन्दगियाँ कुर्बान हुईं। दर्शन के क्षेत्र में भारत विश्व अग्रणी हुआ। यहां आस्था और धर्म का विकास बाद में हुआ और दर्शन का पहले। मार्क्सवादी विचारधारा साहित्य, संस्कृति और दर्शन के विकास में 'अतिरिक्त उत्पादन को महत्व देती है कि अतिरिक्त उत्पादन के कारण अवकाशभोगी वर्ग बनते हैं, वे संस्कृति और दर्शन का विकास करते हैं लेकिन ऋग्वेद के ऋषि/दार्शनिक/कवि अवकाश भोगी नहीं हैं। वे किसान हैं, श्रमिक हैं। 
ऋग्वेद के ऋषि अतिरिक्त जिज्ञासा से लबालब हैं। वैदिक दर्शन का मूल आधार अतिरिक्त उत्पादन नहीं अतिरिक्त जिज्ञासा है। संसार बड़ा है। आयतन में भी, रूप विविधिता में भी। इसी विविधिता से जन्म लेती है 'जिज्ञासा। जिज्ञासा मानव स्वभाव का विलक्षण कोना है। ऋग्वैदिक ऋषियों की जिज्ञासाएं अद्भुद हैं, पूछते हैं कोददर्श प्रथमंजायमान - प्रथम जन्मे परमतत्व को किसने देखा? जो अशरीरी होकर भी विशालकाय संसार का पोषण करता है? (ऋ० 1.164.4) यहां सृष्टि के आदि तत्व की जिज्ञासा है। सूर्य प्रत्यक्ष हैं। जिज्ञासा है कि सूर्य अपनी किरणें कैसे फैलाते है। (वही, मन्त्र 5) फिर पूछते हैं, इस धरती का अंतिम छोर कौन सा है? - पृच्छामि त्वा परमन्तं पृथिव्या:। सभी भुवनों का केन्द्र कहां है? - पृच्छामि यत्र भुवनस्य नाभि: और वाणी का मूल उद्गम क्या है? -पृच्छामि वाच: परमे व्योम। (वही मन्त्र, 34) फिर पूछते हैं, अजन्मा प्रजापति के रूप में एक तत्त्व कैसा है? फिर उत्तर देते हैं मैं यह बात नहीं जानता, लेकिन जानकार लोगों से जानना चाहता हूँ। (ऋ० 1.164.6) 'जिज्ञासा खूबसूरत प्यार है। यह विस्मय/कौतूहल, की पुत्री है, ज्ञान की माता है और भौतिक विज्ञान का पिता है। सूर्य पूरब से आते हैं, पश्चिम में अस्त होते हैं। क्यों होते है? यह सबकी जिज्ञासा है। ऋग्वेद (1.35.7) में जिज्ञासा है सूर्य रात्रि के समय (इस समय) कहां है? कौन जानता है कि इस समय उसने अपनी किरणें कहां फैलाई हैं? 
ऋग्वेद गहन जिज्ञासा से भरापूरा है। यहां प्रश्न दर प्रश्न हैं, परत दर परत जिज्ञासा ही जिज्ञासा है। मरुद्गण हैं। ऋषि जिज्ञासु हैं कि इनमें वरिष्ठ कौन हैं? (1.37.6) इन्द्र अकेले जाते हैं तो कहां जाते हैं? (1.165.3) इन्द्र कहां रहते हैं? (8.1.7) पृथ्वी और जल के बारे में जिज्ञासा है कि भूमि के प्राण कहां हैं? (1.164.4) जल का प्रथम प्रवाह क्या है? (2.3०.) अदिति सर्वशक्तिमान हैं, देवता ढेर सारे। ऋषि की जिज्ञासा है कि कौन देवता अदिति से मिलवाने में सक्षम है? (1.24.1) हम सब दुखी होते हैं। समाज में शुभ करने वाले परेशान रहते हैं, अच्छे लोग दुखी रहते है। ऋषि अश्विनी देव से पूछते हैं, जो यज्ञ नहीं करते वे क्यों बड़े बन जाते हैं? (1.82.3) यज्ञ सत्कर्म है। सत्कर्मी छोटे हो गये दुष्कर्मी बड़े? जिज्ञासा स्वाभाविक है। विश्वकर्मा सृष्टि के रचनाकार देवता थे। ठीक बात है लेकिन ऋषि की जिज्ञासा है कि विश्वकर्मा का अधिष्ठान क्या था? यानी वह रचना के समय कहां बैठे? धरती आकाश को बनाने के लिए इस्तेमाल लकड़ी आदि के लिए उन्होंने किस वृक्ष का इस्तेमाल किया? (1०.81.2-4) जिज्ञासा किसी को नहीं छोड़ती। न इन्द्र को, न अग्नि को न मरूद्गणों को और न विश्वकर्मा को। ऋग्वेद में इसी तरह की ढेर सारी जिज्ञासाएं है। ऋग्वेद दार्शनिक अनुभूतियों और वैज्ञानिक निष्पत्तियों से भरा पूरा है। लेकिन इस्लाम या ईसाइत में जिज्ञासा, प्रश्न और प्रति प्रश्न की परम्परा नहीं। सृष्टि रहस्य आदिम काल से मनुष्य की जिज्ञासा हैं। दर्शन और विज्ञान इन्हीं रहस्यों को जानने की विधाएं है। आस्थांए इस संसार को ईश्वर या देवों की रचना मानती है कि समूची सृष्टि एक साथ किसी देवशक्ति द्बारा बनाई गयी है। 
ऋग्वेद का नासदीय सूक्त (1०.129) सृष्टि दर्शन का शिखर है। इस सूक्त में 7 मन्त्र हैं। पहले सातवां और फिर छठवां पढèने के बाद पहले से पांचवा तक पढèने में क्रम अच्छा बनता है, इस सृष्टि का जन्म कैसे हुआ? किसने रचना की, किसने नहीं की? यह तथ्य परम व्योम निवासी इसका अध्यक्ष (अस्याक्ष्यक्ष:) ही जानता होगा, हो सकता है वह भी यह बात न जानता हो। कौन जानता है कि यह सृष्टि कहां से और किस प्रकार आई? क्योंकि देवता भी इस सृष्टि के बाद ही आये? (मन्त्र 7 व 6) यहां तर्क और जिज्ञासा का चरम है। देवताओं के भी बाद में आने जैसी क्रान्तिकारी उद्घोषणा दुनिया के किसी पंथ में नहीं मिलती है। ऋग्वेद (1०.72.2) में इसी संदर्भ में देवानां पूर्वेयुगे असत: सदजायत-देवताओं के पहले के युग में असत् से सत् की उत्पत्ति हुई बताई गयी है। इसके पहले के मन्त्र (1०.72.1) में देवानां नु वयं जाना प्र वोचाम विपन्यया - हम देवों के प्रार्दुभाव का वर्णन करते है आया है। 
दुनिया की सारी आस्थाएं और कई यूनानी दार्शनिक भी सृष्टि के पूर्व देव अस्तित्व मानते हैं। लेकिन ऋग्वेद का दर्शन वैज्ञानिक है। ऋषि सृष्टि के पूर्व का वर्णन करते हैं, तब न सत् था न असत्। ना व्योमा परोयत् - आकाश से परे भी कोई लोक नहीं था। अगाध और गहन् जल भी नहीं था। तब किसका स्थान कहां था? न मृत्यु थी न अमरत्व। न दिवस न रात्रि। वह अवातं - वायुहीन, स्वधया-अपने आप प्राण स्पंदित था। (1०.129.1 व 2) आगे (मन्त्र 3) कहते हैं गहन अंधकार था। अव्यक्त जल (अप्रकेत सलिलं) था। 'वही एक तपशक्ति प्रकट हुई। यहां तप का अर्थ अव्यक्त ऊर्जा है। फिर (मन्त्र 4) कहते हैं काम स्तग्रे समवर्ताताधिã मनसोरेत: प्रथम यदासीत - सर्वप्रथम कामना आई। कामना मन से सृष्टि उत्पत्ति का कारण बना। मनीषी कवि विद्बानों - 'कवयों मनीषा ने गहन विचार विश्लेषण से असत् से सत् के उद्भव का विवेचन किया है। फिर पांचवे मन्त्र में कहते हैं फिर दिव्य प्रकाश की किरणें फैल गयीं। जल प्रकट हुआ। फिर सृष्टि विकास हुआ। ऋग्वेद के ऋषि इतना बताने के बाद भी ईमानदार वक्तव्य देते हैं कोअद्घा वेद क इह प्रवोचत कुतअजाता कुत इयं विसृष्टि - कौन जानता है, कहां से और कैसे सृष्टि आई। यहां किसी मतवाद पंथवाद की स्थापना नहीं है। पूरी विनम्रता के साथ अपना अभिमत है साथ में ईमानदार टिप्पणी कि कौन जानता है सृष्टि रहस्य? 
इस्लामी विचार आस्था प्रधान है। पवित्र कुरान सम्पूर्ण है। इसके परे किसी तर्क या दर्शन की कोई गुंजाइश नही है। यहां पैगम्बर सलल्लाहो अलैह वसल्लम ने ईश्वर की तरफ से सन्देश दिये हैं। ईश्वरीय सन्देश पर तर्क नहीं हो सकते। कुरान में इंकार करने वाले सजा के योग्य बताए गये हैं। वेदों को भी ईश्वरीय रचना बताया गया है लेकिन वेदों पर तर्क हो सकते हैं। वेदों की व्याख्या और भाष्य की दृष्टि से यास्क रचित 'निरूक्त ही सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रन्थ है। ऋग्वेद सहित सभी वेदों में ढेर सारे देवता हैं लेकिन 'निरूक्त ने 'तर्क को सबसे बड़ा देवता बताया है। आस्थावादी समाज को समझाने के लिए एक कथा है। कथा के अनुसार देवता स्वर्ग जा रहे थे। मनुष्यों ने स्तुति की, पूछा कि अब हमारा मार्गदर्शन कौन करेगा? देवों ने कहा तर्क सबसे बड़ा देवता है, वही मार्गदर्शक होगा। आधुनिक काल का सबसे बड़ा देवता तर्क है। विज्ञान और दर्शन प्रत्यक्ष प्रमाण, अनुमान और तर्क प्रणाली से चलते हैं। भारत में सोच विचार की यही प्रणाली प्राचीन काल से ही है। इसीलिए यहां दार्शनिकों की सुदीर्घ परम्परा है। हिन्दू धर्म और आस्था के मसलों पर भी यहां तर्क होते हैं। समूचा उपनिषद् सहित तर्क दर्शन है। आस्था का सवाल नहीं। गीता के श्रीकृष्ण कई बार वैदिक परम्परा को प्रश्नगत करते हैं। डॉ० अम्बेडकर जैसे विद्बानों ने हिन्दू आस्थाओं पर हमले किये, उन्हें सुना गया, कोई विवाद नहीं हुआ। लेकिन सैटानिक वर्सेज जैसे फिक्शन पर सलमान रूश्दी के सिर पर करोड़ों के इनाम घोषित हो गये। तस्लीमा नसरीन फिक्सन और सत्य लिखने की अपनी बेबाक शैली के चलते दर-दर भटक रही हैं। इस्लाम प्रीतिकर आस्था है। दार्शनिक हिन्दू  कुरान का आदर करते हैं। यही सुविधा मुसलमान के पास नहीं है। यहां बात बेबात फतवे हैं। तर्क, प्रतितर्क और दर्शन दिग्दर्शन के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन होते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि इसी वजह से इस्लाम अनुयायियों में कोई स्वतंत्र दार्शनिक चिन्तक नहीं दिखाई पड़ता। 
 
लेखक  उत्तर प्रदेश सरकार में पूर्व मंत्री रहे है और भाजपा के प्रवक्ता हैं।
 
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