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मीडिया पर हावी बाजार

 मोहित मिश्र,भोपाल 

पिछले कुछ दिनों में मीडिया के क्षेत्र में आई क्रांति ने युवाओं के लिए इस क्षेत्र में भी करियर बनाने के अवसर खोले हैं. जिसके चलते पत्रकारिता जैसे अपारंपरिक विषय की भी पढाई के लिए तमाम शिक्षण संस्थाएं खुल गयीं हैं जो की प्रबंधन,इंजिनीयरिंग आदि की भांति ही इस विषय के भी प्रोफेशनल्स तैयार कर रहीं हैं.सरकारी विश्वविद्यालयों में भी जनसंचार और पत्रकारिता संकाय की स्थापना की जा रही है क्यूंकि ऐसा माना जा रहा है की जितनी तेजी से मीडिया तकनीक और इसकी ज़रूरतों में बदलाव आया है अब बिना ट्रेंड हुए इस क्षेत्र में गुणात्मक योगदान नहीं दिया जा सकता.देश में मीडिया एजुकेशन के समकालीन परिद्रश्य, स्कोप और इसके विविध आयामों पर हमने बात की देश के एकमात्र पत्रकारिता विश्विद्यालय माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल के दृश्य श्रृव्य अध्ययन केंद्र के संकाय सदस्य डॉ. महावीर सिंह से. डॉ. सिंह देश के विभिन्न आकाशवाणी केन्द्रों के केंद्र निदेशक रह चुके हैं और इलेक्ट्रोनिक मीडिया के ख्यातिलब्ध विशेषज्ञ हैं...
पत्रकारिता की पढाई के लिए आजकल तमाम संस्थान खुल रहे हैं, क्या आपको लगता है की क्लासरूम में लेक्चर अटैंड करने से अच्छा पत्रकार बना जा सकता है जबकि हमारे तमाम बड़े पत्रकारों ने इसकी कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली.?
पत्रकारिता के लिए सबसे पहली और अहम् अर्हता पत्रकारीय अंतर्दृष्टि की है..पत्रकारिता शिक्षण संस्थान अपनी प्रवेश परीक्षा में इसी के आधार पर प्रवेश देते हैं.  ये अंतर्दृष्टि अगर किसी विद्यार्थी में है तो हम शिक्षण के ज़रिये इसे निखार और सम्यक बना सकते हैं लेकिन ये बात बिलकुल सही है की पढाई के ज़रिये इसे उत्पन्न नहीं किया जा सकता.यह स्वतः स्फूर्त होती है. इसीलिए शिक्षण संस्थाओं को चाहिए की वह अपनी एंट्रेंस प्रक्रिया सुधारें.ताकि लोग अनजाने में इस दिशा में आने से बचें.शिक्षण से व्यक्ति को इस क्षेत्र की सुव्यवस्थित जानकारी प्राप्त हो जाती है.वह अपने साधन को पत्रज्कारिता कर्म के लिए उपयोगी बना सकता है.लेकिन मूल अर्हता अर्जन के लिए व्यक्ति की समझ और विश्लेषण क्षमता या किसी घटना के सम्बन्ध में निर्णायक दृष्टिकोण बनाने के लिए विकसित अन्वेषण क्षमता आवश्यक है जिसे शिक्षण के ज़रिये तीक्ष्ण तो किया जा सकता है उत्पन्न नहीं किया जा सकता.
पत्रकारिता के ज्यादातर शिक्षण संस्थान सिद्धांतों और पत्रकारिता की परंपरा को पढाते हैं जबकि आज के दौर में इसके ट्रेंड लगातार बदल रहे हैं ऐसे में क्या आपको लगता है की शिक्षण संस्थानों के पाठ्यक्रम आज के मीडिया उपक्रमों के साथ कदम मिला पा रहे हैं.?
पत्रकारिता के सिद्धांत और रिवायत अप्रत्यक्ष रूप से मार्गदर्शक का काम तो हमेशा ही करती है. पत्रकारिता का इतिहास पढाये जाने की वजह भी यही है की शिक्षार्थी जिस क्षेत्र में आ रहे हैं उन्हें उस क्षेत्र की व्यापक समझ हो और ये भी मालूम हो की वो किस गौरवशाली परंपरा का हिस्सा हैं.मनुष्य भविष्य की कोई भी योजना तैयार करे उसमें भूत से कुछ न कुछ ज़रूर आधारित होता है.इसीलिए इन पाठ्यक्रमों में विद्यार्थियों को संभावित घटना के आधार पर विश्लेषण करने तैयार किया जाता है.कोई भी पाठ्यक्रम व्यवहारिक कर्म को पूर्णरूपें ब्याख्यायित कभी नहीं कर सकता क्यूंकि ये एक स्थितिजन्य कर्म है जिसका  पहले से अनुमान तो लगाया जा सकता है लेकिन भविष्यवाणी नहीं की जा सकती. लेकिन इसके साथ एक और बात भी है पाठ्यक्रमो का सिर्फ एक हिस्सा परंपरा सिद्धांत और इतिहास का होता है. इसमें ज्यादातर बातें समकालीन मीडिया परिद्रश्य के आधार पर ही होती है इसलिए मीडिया पाठ्यक्रमों में बहुत तेजी से अपग्रेडेशन ज़रूरी होता है. पढ़ लिख कर फील्ड में उतरने से आपके पास एक आत्मविश्वास की तो अधिकता होगी ही आपमें एक पेशेवर या विशेषज्ञता वाला रवैय्या भी होगा.
आपने पेशेवर रवैय्ये की बात की, आपको नहीं लगता की मीडिया के क्षेत्र में पिछले कुछ दिनों में संभावनाएं बढ़ी हैं बेतहाशा बढ़ते पत्रकारिता संस्थाओं में विद्यार्थी सिर्फ ये सोचकर आते  जा रहे हैं की यहाँ कुछ वक़्त बिताने के बाद नौकरी पा जायेगे. शिक्षण संस्थान भी कारखाने की तरह  हैं,इसके बीच इस क्षेत्र की चुनौतियों को समझ पाने का मौका कम होता जा रहा है क्या इससे पत्रकारिता का स्वरुप बदलने का खतरा नहीं है ?
शायद आपका इशारा उस व्यावसायिक स्वरुप की तरफ है जो अभी भारत के मीडिया संस्थाओं में आदिम रूप में ही है.देखिये मीडिया हो या दुनिया का कोई भी क्षेत्र काम चलाऊ हो जाना बहुत आसान होता है आज अखबारों या चैनल में जिस तरह से काम हो रहा है हो सकता है की पढाई करने के बाद आप उसको करने के काबिल हो जाएँ या इसमें तो पढाई की ज़रूरत भी न हो लेकिन किसी भी जगह आपको ऊंचाई छूने के लिए और एक्सेल करने के लिए मेहनत और समझ की आवश्यकता है जो की गंभीर रवैये से आती है.मीडिया संस्थाओं में नौकरी करना तो बहुत आसान है. ये एक तरह की बौद्धिक मजदूरी भी हो सकती है लेकिन इस क्षेत्र में वाकई अच्छा करने के लिए ज़रूरी है की आप इसे समझते हो. इसके लिए वही बात मैं फिर कहूँगा जो मैंने पहले सवाल के जवाब में कही थी. शिक्षण संशानों को चाहिए की अपनी प्रवेश प्रक्रिया सुधारें और विद्यार्थियों को चाहिए की वे अपनी क्षमता को परख  कर और इस क्षेत्र की चुनौतियों को जानकार ही इसमें आयें.
मीडिया संस्थानों में बढ़ रहे बाज़ार के हस्तक्षेप की बड़ी चर्चा हो रही है क्या मीडिया शिक्षण संस्थान भी इस हताक्षेप से प्रभावित हुए हैं.?
जिस तरह का हस्तक्षेप बाज़ार ने अखबारों या चैनलों पर डाला है शिक्षा संस्थानों पर वैसा सीधा प्रभाव तो बाज़ार का नहीं है लेकिन चुकी अखबार या चैनल इनसे प्रभावित हैं तो इनका असर शिक्षण संस्थानों पर भी किसी न किसी रूप में तो पड़ेगा ही. क्यूंकि आज जितने भी शिक्षण संस्थान हैं वो अपने विद्यार्थियों को अखबारों या चैनलों के हिसाब से तैयार करते हैं और ये बाज़ार से संचालित होते हैं ऐसे में जब भी बाज़ार मीडिया संस्थानों में कोई बदलाव लाता है तो हमें पाठ्यक्रमों में भी नयी चीजें शामिल करनी पड़ती है.मसलन टीवी कार्यक्रमों  के लगातार नए फोर्मेट्स आ रहे हैं. इसके अलावा संस्थानों में निश्चित दायित्व वाले खास पदों का सृजन हो रहा है जिसके आधार पर हम बच्चों  को तैयार करते हैं. जब कैम्पस प्लेसमेंट आता है तो हम उपक्रम की मांग के आधार पर विद्यार्थियों को ढालते हैं.जो तकनीक बाज़ार में पुरानी पड़ जाती है हमें भी उसे हटाना पड़ता है चाहे वह एडिटिंग सूट हो या कैमरा या फिर कोई सिद्धांत. बाज़ार एक और रूप से शिक्षण संस्थानों पर हावी दीखता है जिसमें मीडिया समूहों ने अपने शिक्षण संस्थान खोल दिए हैं.
एमबीए अथवा इन्जीनीरिंग की पढाई करने के बाद विद्यार्थियों को जिस तरह का पॅकेज और आरामतलब नौकरी मिलती है मीडिया फ्रेशर्स उससे जूझते क्यूँ दिखाई देते हैं ?
आपने एक बहुत वाजिब समस्या उठाई है अन्य कोर्स करने के बाद जहाँ बच्चे तुंरत अच्छी नौकरी पाते हैं वहीँ मीडिया की पढाई करने के बाद हर साल कई बच्चे दिल्ली में बिना किसी भुगतान के काम करते रहते हैं इस आशा  में की कभी वो परमानेंट हो जायेंगे. अगर उनकी शुरुआत होती भी है तो बहुत कम पैसों से. ये एक दुखद पहलु है लेकिन मीडिया में आने वालों को इस चुनौती को भी ध्यान में रख कर आना चाहिए.इस समस्या के लिए शिक्षण संस्थान नहीं बल्कि मीडिया संस्थान ज्यादा दोषी हैं. उन्होंने बड़े पद पर तो भारीभरकम पॅकेज देकर लोग बैठाले  हैं और नीचे वाले बिलकुल वंचित  हैं.उन्हें ये समझना होगा की जबतक इस क्षेत्र में ज्यादा वेतन और सुविधाएं नहीं होंगी अच्छे लोग इधर नहीं आना चाहेंगे. टीवी में तो आज लोग ग्लैमर के चलते आना चाहते हैं लेकिन अखबार समूह में उतना वेतन और ग्लैमर दोनों ही नहीं है इसलिए यहाँ अच्छे लोगों की और कमी पड़ने वाली है. हर साल हम खुद पढाई पूरी होते-होते इस क्षेत्र से कई मोहभंग देखते हैं. भारत में चूंकि मीडिया का व्यावसायिक रूप कुछ ही पुराना है इसलिए ये समस्या ज्यादा विकराल है वक़्त के साथ साथ इसमें सुधार होने की संभावना है.
देश की वर्तमान मीडिया एजुकेशन को आप किस तरह से देखते हैं ?
चूंकि पत्रकारिता एक लम्बे वक़्त तक एक गैर रिवायती विषय माना जाता रहा ई और देश में मीडिया एजुकेशन अभी अभी उभरी है इसलिए इसमें बहुत से सुधारों की गुंजाइश है. लेकिन सबसे ज़रूरी बात तो इसे गंभीरता से लेने की है. क्यूंकि अब हमें ये समझना पड़ेगा की आज के दौर में पत्रकारिता के लिए आपको सिर्फ पढ़ा-लिखा नहीं बल्कि ट्रेंड होने की ज़रूरत है. लगातार नए मीडिया विकसित हो रहे है. इस लिहाज से हमें ये बात तो दिमाग से एकदम निकालनी पड़ेगी की पत्रकार बनने के लिए पढाई की ज़रूरत नहीं होने पत्रकारीय अंतर्दृष्टि या जर्नलिस्टिक इंस्टिंक्ट के लिए पढाई भले ही ज़रूरी न हो लेकिन पत्रकारीय कर्म के लिए आज के दौर में इसका विधिवत प्रशिक्षण बहुत आवश्यक है क्यूंकि जर्नलिस्टिक इंस्टिंक्ट तो ग्रामीण अंचल के लोगों में भी ज़बरदस्त होती है लेकिन आज पत्रकारिता के लिए व्यापक प्रशिक्षण की ज़रूरत है.तकनीकी ज्ञान ज़रूरी है.पत्रकारिता ही एक ऐसा माध्यम है जिसके ज़रिये प्रजातंत्र की सक्षमता का सही आकलन हो सकता है.पत्रकारीय माध्यम ही किसी देश या समाज की शक्ति का प्रतिबिम्ब दिखाते हैं अगर ये आइना धुंधला हो गया तो राष्ट्र की तस्वीर भी धुंधला जायेगी. इस लिहाज से देश को क्वालिटी मीडिया एजुकेशन की ज़रूरत है. 
 
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