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गांधी को ‘महात्मा’ मुसलमान ने बनाया

 जफरयाब जिलानी

यह सवाल किया गया था कि मुसलमानों में कोई महात्मा गांधी जसा व्यक्तित्व और स्वतंत्र चिंतन वाला दार्शनिक क्यों नहीं हुआ। इस मामले में जानकारी का अभाव नजर आता है। इस्लाम में सूफी संतों की परंपरा काफी पुरानी है। उनसे बड़ा दार्शनिक कौन होगा? दार्शनिकों की श्रंखला में ही अजमेर शरीफ के हजरत शेख ख्वाज सैय्यद मोहम्मद मोइनुद्दीन चिश्ती से लेकर हजरत ख्वाज निजमुद्दीन चिश्ती को कौन नहीं जनता। आजादी की लड़ाई के समय भी मौलाना मुफ्ती किफायत उल्ला, मौलाना अजीज उल हसन, हजरत नौमानी, मौलाना ओबैदुल्ला सिंधी, खान अब्दुल गफ्फार खान और मौलाना अबुल कलाम आजद जसे कई नाम हैं जो दार्शनिक होने के साथ-साथ जंगे आजदी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे। नाम गिनाने का कोई अर्थ नहीं। जहां तक महात्मा गांधी की बात है तो यह जानना चाहिए कि उनके पीछे जो लोग खड़े रहे हैं, वे कौन थे। अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले दारूल उलूम देवबंद के स्तंभ रहे मौलाना शेख उल हिंद महमूद उल हसन जंगे आजदी के चलते जेल गए। माल्टा जेल से जब वे लौटे तो मुंबई के बंदरगाह पर दक्षिण अफ्रीका से पानी के जहाज से लौट रहे उस नौजवान को उन्होंने देखा जिसे तब लोग मोहनदास करमचंद गांधी कहते थे। उस समय मौलाना ने मुसलिम समुदाय के लोगों से कहा कि जंगे आजदी की कमान किसी हिन्दू को थमानी चाहिए। बिना इसके यह लड़ाई जीती नहीं ज सकती। यह वह दौर था जब मुसलिम समुदाय किसी हिन्दू को अपना नेता मानने को तैयार नहीं था। उस समय अंग्रेजों से मोर्चा लेने की वजह से मौलाना शेख महमूद उल हसन मदनी मशहूर हो चुके थे और गांधी की पहचान नहीं बनी थी। मौलाना ने गांधी को बुलवाया और कहा कि अंग्रेजों के खिलाफ जंगे आजदी की कमान उन्हें संभालनी होगी। इस सिलसिले में उन्होंने हर तरह की मदद करने को कहा और किया भी।
लखनऊ में मौलाना अब्दुल बारी फरंगीमहली के फरंगीमहल में ही मोहनदास करमचंद गांधी रूकते थे। मौलाना अब्दुल बारी फरंगीमहली ने ही गांधी को महात्मा की पदवी दी थी। हालांकि इतिहासकार गुरूदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर को इसका श्रय देते हैं।
नोट-फोन्ट कनवर्टर की वजह से कई शब्द बिगड़ जते हैं जिसके चलते नामों का उच्चरण भी गलत नजर आने लगता है। इसके लिए हमें खेद है।
जफरयाब जिलानी, आल इंडिया मुसलिम पर्सनल ला बोर्ड के सदस्य हैं।
 
सूफीवाद से देवबंदियों का क्या लेना-देना
 
वीरेन्द्र नाथ भट्ट
जिलानी केवल वकील ही नहीं, कूटनीतिज्ञ भी हैं। तथ्यों को मखमली चादर में लपेट कर छुपाना उन्हें खूब आता है। पहले वह यह बताएं कि वे खुद देवबंदी, बरेलवी या अहले हदीश किस समुदाय से ताल्लुक रखते हैं? हमारी जनकारी है कि वे देवबंदी हैं। देवबंदी किस आधार पर सूफी संतों की बात कर रहे हैं। देवबंदी अपने अलावा किसी को मुसलिम नहीं मानते। सूफीवाद को देवबंदी सिरे से नकारते रहे हैं। उनकी निगाह में सूफीवाद फितना बिद्दत है। बरेलवी मुसलिम देवबंदियों की निगाह में कब्रपुजवें हैं क्योंकि वे दरगाहों, मजरों में जकर मन्नत मांगते हैं। लखनऊ के नजीराबाद स्थित एक दुकान में आल इंडिया मुसलिम पर्सनल ला बोर्ड के मेंबर मौलाना सज्जाद नोमानी द्वारा लिखित पुस्तक उलेमा का मुत्तफिक फैसला आज भी उपलब्ध है। जिलानी साहब से निवेदन है कि उस पुस्तक को एक बार अवश्य पढ़ लें। उनके ज्ञान में वृद्धि होगी।
हर वर्ष १२ इमामों की शहादत की याद में शिया मुसलमानों द्वारा मुहर्रम मनाया जता है। हर वर्ष मोहर्ररम के महीने में देवबंदियों तबलीगी जमात की ओर से उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र के जिलों में प्रचार किया जता है, पर्चे बांटे जते हैं कि अजदारी यानी मातम मनाना हराम है, ताजिया रखना हराम है। यहां यह बताना आवश्यक है कि अवध क्षेत्र में शिया मुसलमानों के अतिरिक्त बड़ी संख्या में हिन्दू भी मुहर्ररम के महीने में ताजिया रखते हैं। यहां तक कि अवध क्षेत्र के नगण्य मुसलिम आबादी वाले गांवों में जिस चौक पर ताजिया रखा जता है, उसको मुड़कटवा बाबा यानी इमाम हुसैन का चौक कहा जता है। कर्बला की लड़ाई में इमाम हुसैन शहीद हुए थे जिसका मातम शिया हर वर्ष मोहर्ररम के महीने में मनाते हैं। देवबंद के लोग जब राजनैतिक प्लेटफार्म पर आते हैं तो गंगा-जमुनी तहजीब और हिन्दू-मुसलिम एकता और अवध की तहजीब और तमद्दुन की बात करते हैं।
वीरेन्द्र नाथ भट्ट, 
द इंडियन एक्सप्रेस के वरिष्ठ पत्रकार हैं और मुसलिम मामलों के जानकार माने जते हैं।   
 
धर्म के दायरे से बाहर निकाल कर देखे 
 
हिमांशु बाजपेयी
असल में इस बहस को धर्म के दायरे से बाहर निकाल कर देखे जाने की ज़रूरत है.तभी इससे कुछ सार्थक बाहर निकल कर आएगा.दीक्षित जी ने अपने लेख में जिस दर्शन का उल्लेख किया वह भी धर्म के दायरों के अन्दर था और अब जिलानी साहब भी धार्मिक विचारकों का ही उल्लेख कर रहे हैं.मेरे हिसाब से इस मुद्दे पर विमर्श होना चाहिए की हिन्दू या इस्लाम दोनों समुदायों में चिंतन कब धर्म की सीमा के भी आगे चला गया. क्यूंकि दीक्षित जी खुद स्वतंत्र विचारक की बात उठा रहे थे और वैदिक परंपरा और आस्तिक दर्शन में बंधे नज़र आ रहे थे.इस लेख में संपूर्ण भारतीय दर्शन का सिर्फ एक हिस्सा भर नज़र आ रहा था.मेरा आग्रह सिर्फ इतना है की उस चिंतन को केंद्र में लाना चाहिए की कब चिंतन में खुद के समुदाय के परे होकर बात हुई.मतलब किसी भी तरह की छाया से मुक्त होकर चिंतन कब किया गया. नहीं तो धर्म को केंद्र में रखकर "स्वतंत्र" चिंतन की कमी कहीं नहीं है....लेकिन क्या वाकई ये स्वतंत्र चिंतन है....
 
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