ताजा खबर
साफ़ हवा के लिए बने कानून नेहरू से कौन डरता है? चालीस साल पुराना मुकदमा ,और गवाह स्वर्गवासी चार दशक बाद समाजवादी चंचल फिर जेल में
धरम के कुँए में स्वतंत्र चिंतन !

 हिमांशु वाजपेयी  

धर्म और स्वतंत्र चिंतन के सिलसिले की इस बहस में मेरा तर्क था की जब हम स्वतंत्र चिंतन की बात धर्म के परिप्रेक्ष्य में करें तो इसके केंद्र में यही बात रहनी चाहिए की आपका चिंतन धर्म के अवांछित पेचोखम में न उलझे, वरना आपका चिंतन भी उस मुसलसल ज़ंजीर की एक कड़ी भर होगा जिसने बरसों से व्यक्ति को अन्य विश्वासों के करीब आने से रोक रखा है. जिलानी साहब के लेख में सूफीवाद का उल्लेख है. सूफियों का उल्लेख उन्होंने इस्लाम में लिबरल नज़रिए को ज़ाहिर करने के लिए किया था.हलाँकि इस्लाम में इसको लेकर अन्तर्निहित विरोधाभास को भट्ट जी ने सामने रखा तो मुझे अपनी धारणा और प्रबल होती दिखी. धर्म को लेकर हमें तीन मोटे-मोटे विचार मिलते हैं एक जिसमें धरम को उसके पारंपरिक स्वरुप में स्वीकार करने की बात कही जाती है जिसमें हदीस और वैदिक परंपरा दोनों ही मानी जा सकती हैं.एक जो धर्म को बिलकुल ही खारिज करने की वकालत करती है जिसके अनुयायिओं को आजकल अनायास ही कम्युनिस्ट बना दिया जाता है.और इन दोनों के बीच एक सुधारवादी विचारधारा जो धर्म के कट्टर स्वरुप को हटा कर उसे अपेक्षाकृत सुग्राही और नवोन्मेषपूर्ण करने पर विचार रखती है. इस लिहाज से जब संत माने जाने वाले सूफी भी मज़हब की नयी रिवायत शुरू करते हैं तो एक खास किस्म के अल्लाह के बन्दों के निशाने पर रहते हैं.क्यूंकि धरम की पुरानी मान्यताएं टूटती हैं. शैतान की आवाज़ माना जाने वाला संगीत एक तबके को हराम होता है तो दूसरा उसपर झूमता है.यहाँ सूफी भले ही धर्म से पूरी तरह बाहर निकलकर भले ही न सोच पाए हों लेकिन जिलानी साहब ने जिस परिप्रेक्ष्य में उनका उल्लेख किया है उसमें वो बहुत हद तक सही हैं क्यूंकि सूफी धर्म से पूरी तरह बाहर नहीं निकले लेकिन उन्होंने धरम की पूरी तरह से नयी धारणा विकसित की जो भी एक तरह का स्वतंत्र चिंतन तो है ही. अगर सूफी धरम से बाहर निकल जाते तो उनपर भी कम्युनिस्ट होने का ठप्पा लगने का खतरा था.लेकिन कम से कम सूफी इस दृष्टि से निर्विवाद रूप से अहम् हैं की उन्होंने धर्म की संकीर्णताओं से ऊपर उठकर सोचा.भले ही उन्होंने धर्म के ढाँचे को बने रहने दिया हो.इस लिहाज से ये नहीं कहा जा सकता की इस्लाम में स्वतंत्र चिंतन नहीं हुआ. लेकिन एक बात बिलकुल निश्चित है की इसकी कमी और उससे भी ज्यादा इसकी व्यापक स्वीकार्यता इस्लाम में हमें कम दिखती है जिसकी बात भट्ट जी ने की. यहाँ एक नयी बहस जन्म ले सकती है की प्रगतिशीलता या प्रोग्रेस्सिव स्ट्रीम का संचरण इस्लाम में क्यूँ मुश्किल होता है. क्यूंकि रचना ने पानी पोस्ट में कुछ बिलकुल वाजिब प्रश्न उठाये थे की धरम को लेकर परंपरागत मुस्लिम समाज जितना आग्रही और आक्रामक है उतना शायद ही कोई और मज़हब हो.भले ही ऐसा ग़लतफहमी और गलतबयानी को लेकर उपजा हो.यहाँ एक और बात कहने लायक है की हिन्दू समाज भी अपने जिस सहिष्णु होने का दंभ भरता है वो इसीलिये है क्यूंकि उसके पास कुछ सिरफिरे फतवों का हवाला है वरना बाबा पार्टी की कमी यहाँ भी नहीं है.ह्रदय नारायण दीक्षित ने अपने लेख में ऋग्वेद को जिस तरह पेश किया है उससे इतर भी सोचे जाने के ज़रूरत है क्यूंकि मनुवाद अपने आदिम स्वरुप में इसीके पुरुष सूक्त में मिलता है और इसी की वेदवाणी शूद्रों के कान में पड़ने पर सीसा पिघलाकर डाला जाता था.असल में समस्या यह है की हम धर्म को लेकर सोचने बैठते हैं तो बहुत इंटेंस थिंकिंग करते हैं लेकिन धर्म के उसी घेरे के अन्दर सोचते रह जाते हैं.दीक्षित जी का वेदों पर गहन अध्ययन है क्या कभी उन्होंने इसबात का भी संकलन किया है की वेदों की कितनी ऋचाएं अन्यायमूलक हैं.धर्म का आनुयायिक चिंतन खूब होता है.अगर इस चिंतन को पैमाना बनाया जाय तो निश्चित रूप से इस्लाम में भी अभाव नहीं है. अल्लामा इकबाल के उदारवादी नज़रिए को भी इस विचार से हारना पड़ता है तो ज़ाहिर तौर पर ये बहुत प्रबल है.इसीलिए तसलीमा, साइमन जैसी नारीवादी भी धर्म को औरत पर अत्याचार के यन्त्र के रूप में देखती हैं.अपने धर्म की अच्छाइयों को लेकर व्यापक बहस होती है लेकिन इसकी कमियों को उजागर करने सम्बन्धी बहस क्यूँ नहीं होती.कुछ ही रोज़ पहले कल्बे सादिक साहब ने मुस्लिम महिला आन्दोलन के अधिवेशन में इस्लाम में महिलाओं की असहजता पर कुछ बात करते हुए उनकी हिस्सेदारी को लेकर जो सवाल उठाया वो भी कईयों को नागवार गुज़ारा. याद रहे की सादिक साहब ने इसमें ये भी कहा था की पैगम्बरों के ज़माने की हरबात जैसे की तैसी नहीं उतारी जा सकती इससे महिलाओं को खासकर बड़ी तकलीफ होती है.क्यूंकि इनमें से कई बेसिरपैर की हैं. ये एक बड़े दिल वाली स्वीकृति थी जिसकी आलोचना भी कम नहीं हुई उसी तरह जिस तरह सूफियों को भी नकार का सामना करना पड़ा. ये अलग बात है की उदारवादी गैरमुस्लिम सम्प्रदाय दोनों के प्रति सबसे ज्यादा श्रद्धावान रहता है. कल्बे सादिक आज भी सभी मंचों पर सम्मानित हैं. चाहें वह क्रांतिकारी नमाज़ का फैसला हो या कुम्भ में डुबकी लगाने का. सभी कुछ साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए संजीवनी का काम करता है.. जब सादिक साहब ने महिलाओं के तकलीफ में होने की बात कही तो मुझे वाल्मीकि रामायण का एक प्रसंग याद आया.मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् राम सीता की तुलना कुत्ते के जूठे घी से करते हुए कहते हैं की "अब तुम सच्चरित्र या दुश्चरित्र जो भी हो मैथिलि. मैं तुम्हारा उपभोग नहीं कर सकता.अब तुम कुत्ते के चाटे घी के सामान हो जिसका उपभोग नहीं किया जा सकता.(वाल्मीकि रामायण ३.२५७.१३).धरम को खारिजं करना मुश्किल काम है लेकिन उदारवादी नजरिया तो रखा ही जा सकता है. और कमसे कम अन्यायमूलक बातों की आलोचना तो होनी ही चाहिए. इसके लिए किसी भी स्वतंत्र चिंतन की बहुत ज्यादा आवश्यकता नहीं है. धरम के नोस्तेल्जिक महिमामंडन और इसके विरोधाभास पर अष्टभुजा शुक्ल की पंक्तियाँ याद आती है...
 
" किसी धर्मस्थल के विवाद में
पांच हज़ार गोली से
तीन हज़ार गोले से
एक हज़ार चाकू से
और पांच सौ जलाकर मार दिए जाते हैं 
तीन सौ महिलाओं को नाली
और दो सौ बच्चों को बकरा समझा जाता है
धर्म में सहिष्णुता का प्रतिशत ज्ञात कीजिये। "
 
लेखक भास्कर डॉट कॉम से जुड़े है .
email ईमेल करें Print प्रिंट संस्करण
  • चंचल का चैनल
  • जहां पत्रकारिता एक आदर्श है
  • जहां आये कामयाब आये
  • नामवर की नियति
  • चिड़िया ते बाज तुड़वाऊं?
  • प्रभाष जोशी और इंडियन एक्सप्रेस परिवार
  • एक ऋषि की यात्रा का अंत
  • असली मैदान तो यूपी बनेगा
  • राजकाज
  • भगतों की चांदी है
  • मेरठ के बांके!
  • बाबरी विध्वंस की आयी याद
  • इतिहास में उपेक्षित तिलका मांझी
  • आखिरी पड़ाव गोमोह जंक्शन
  • संगम के अखाड़े में लेफ्ट-राइट
  • एक थे लोकबंधु राजनारायण
  • अपनी जमीन ही नसीब हुई
  • रवीश के सामाजिक सरोकार
  • गिरोह क्यों कहते हैं
  • ई राजेंद्र चौधरी कौन है ?
  • Post your comments
    Copyright @ 2016 All Right Reserved By Janadesh
    Designed and Maintened by eMag Technologies Pvt. Ltd.