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हिन्द स्वराज के सौ बरस

 हृदयनारायण दीक्षित

कालजयी कृतियाँ ऐसी ही होती हैं। ‘हिन्दस्वराज’ लिखे सौ बरस हो गये। महात्मा गांधी ने यह छोटी सी किताब इंग्लैण्ड से दक्षिण अफ्रीका लौटते समय जहाज पर लिखी थी। दलाईलामा के प्रमुख सहयोगी और तिब्बत की निवार्सित सरकार के प्रधानमंत्री सामदांेग रिंपोछे ने इस किताब को धम्म पद से बड़ा बताया है। उनका कहना है कि यदि धम्मपद और गांधी के स्वराज में से किसी एक को चुनने का विकल्प दिया जाए तो मैं निःसंकोच स्वराज को चुनूंगा।” ईसा मसीह का पहाड़ पर दिया गया प्रवचन ‘सरमन आन दि माउन्ट’ नाम से विश्वविख्यात है। अमेरिकियों ने ‘हिन्द स्वराज’ को “सरमन आन सी” कहा था। गांधी जी ने 12 बरस बाद सन् 1921 में लिखा “यह किताब ऐसी है कि वह बालक के हाथ में भी दी जा सकती है। वह द्वेषधर्म की जगह प्रेमधर्म सिखाती है, हिंसा की जगह आत्मबलिदान को रखती है, पशुबल से टक्कर लेने के लिए आत्मबल को खड़ा करती है। इसकी अनेक आवृत्तियाँ हो चुकी हैं, और जिन्हें इसे पढ़ने की परवाह है उनसे इसे पढ़ने की मैं जरूर सिफारिश करूँगा। (हिन्द स्वराज, पृष्ठ 6, सर्वसेवा संघ प्रकाशन) यहां “पशुबल से टककर लेने के लिए आत्मबल खड़ा करने” पर ध्यान देना चाहिए। शारीरिक मजबूती या गोला बारूद से ही राष्ट्र की ‘अजय्यां शक्ति’ प्रकट नहीं होती। पौरूष पराक्रम का मूल केन्द्र है आत्मबल। दुनिया के सैकड़ों प्रकाण्ड विद्वानों ने इस किताब की प्रशंसा की, विवेचन हुए लेकिन स्वयं गांधी जी के अनुसार “इस किताब में आधुनिक सभ्यता की सख्त टीका की गयी है।” (वही, पृष्ठ 6) 
महात्मा गांधी सनातन भारतीय संस्कृति के अधुनातन प्रवक्ता थे। यह संस्कृति द्वैष की जगह प्रेम सिखाती है। पशुबल, बाहुबल की टककर में आत्मबल की महत्ता सिद्ध करती है। अंग्रेज यहां व्यापारी होकर आये थे, सत्ताधीश बन बैठे। उन्होंने सनातन भारतीय संस्कृति और परम्पराओं को असभ्य बताया। ईसाई रीति रिवाज व ब्रिटिश रहन सहन को परिपूर्ण सभ्यता कहा। भारत हजारों वर्ष प्राचीन सभ्यता है। विश्व का प्राचीनतम ज्ञानकोष ऋग्वेद इसका साक्ष्य है। भारतीय सभ्यता का विकास अंधआस्था या किसी अदृश्य ईश्वरीय संदेशवाहक की उद्घोषणा से नहीं हुआ। ऋग्वेद में विचार विविधिता है। परिपूर्ण वैचारिक जनतंत्र है। संसार को उत्सवधर्मा, उल्लासधर्मा बनाने की ऋषि अभिलाषाएं है। ऋग्वेद भारत में उगा। विज्ञान, चिकित्सा और सुख समृद्धि के कर्म तप अथर्ववेद में है। उपनिषद् विश्व दर्शन का आकाश है। दुनिया का पहला ‘अर्थशास्त्र’ ग्रंथ कौटिल्य ने लिखा, काम (यौन) व्यवहार पर विश्व का प्रथम ग्रन्थ वात्स्यायन ने यहीं रचा। भाषा अनुशासन पर प्रथम ग्रन्थ पाणिनि ने लिखा। चिकित्सा विज्ञान पर ‘चरक संहिता’ की प्राचीनता सर्वविदित है। अभिनय कला पर भरत मुनि का नाट्यशास्त्र’ के सामने आधुनिक हालीवुड और बालीवुड के अभिनय सूत्र बौने हैं। 
भारतीय संस्कृति और दर्शन की प्रशंसा अंग्रेजों, जर्मनों ने भी की थी। गांधी जी ने विलियम विल्सन हंटर की किताब ‘इण्डियन अम्पाइर’ से तमाम तर्क खोज निकाले थे। एच0एस0 मेन ने बीज गणित अंकगणित की प्राचीन भारतीय क्षमता की प्रशंसा की थी कि दशमलव प्रणाली के आविष्कार का उनका हम पर ऋण है। अरबांे ने ये अंक हिन्दुओं से लिए और यूरोप में फैलाए। अरब चिकित्सा प्रणाली की बुनियाद संस्कृत ग्रंथों के अनुवाद पर रखी गयी। (सम्पूर्ण गांधी वाड्मय, 1.185) जर्मन विद्वान मैक्समुलर वेदों और भारतीय दर्शन पर मोहित थे, एक अन्य जर्मन विद्वान शापेन हावर ने उपनिषदों के बारे में लिखा था “सारे संसार में मूलतत्वों को छोड़कर और किसी वस्तु का अध्ययन इतना लाभदायक नहीं है जितना उपनिषदों का।” गांधी जी ने ऐसे सभी अंश संजो रखे थे। (सम्पूर्ण गांधी वाड्.मय 1.183-84)
प्राचीन भारत की संस्कृति में दर्शन था, विज्ञान था, गणित थी, चिकित्सा विज्ञान था, समाज विज्ञान थे, खगोल था, अंक विद्या थी, नक्षत्र विद्या थी, गहन सौन्दर्य बोध था, काव्य था, समाज जीवन में बहुविधि रस थे, जनगणमन समरस थे। धन था, साधन थे, वैभव था, उल्लास थे, गीत थे, छन्द थे, रिद्धि थी, सिद्धि थी, समृद्धि थी। गांधी जी आहत थे कि ऐसी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति के उत्तराधिकारी पश्चिम की कथित आधुनिक सभ्यता के मोह जाल में हैं। उन्होंने ‘हिन्द स्वराज’ को ‘आधुनिक सभ्यता की टीका’ का उपकरण बनाया और लिखा, “मेरी पक्की राय है कि हिन्दुस्तान अंग्रेजों से नहीं, बल्कि आज कल की सभ्यता से कुचला जा रहा है, उसकी चपेट में वह फंस गया है।” (हिन्द स्वराज, वही, पृष्ठ 44) मैकाले भारत को ईसायत में बदलना चाहता था। मैकाले की निगाह में भारत के लोग कमजोर, आलसी और अर्द्धसभ्य थे। गांधी को यह बात बहुत अखरी। उन्होंने हिन्द स्वराज (पृष्ठ, 46) मेें लिखा, “मैकाले ने हिन्दुस्तानियों को नामर्द माना, वह उसकी अधम अज्ञान दशा को बताता है। हिन्दुस्तानी नामर्द कभी नहीं थे। आप कभी खेतों में गये हैं? मैं आपसे यकीनन् कहता हूं कि खेतों में हमारे किसान आज भी निर्भय होकर सोते हैं, जब कि अंग्रेज और आप वहां सोने के लिए आनाकानी करेंगे। बल तो निर्भयता में है।” गांधी जी अंग्रेजी सत्ता से टकरा रहे थे। यह बात प्रत्यक्ष है लेकिन गांधी जी अंग्रेजी सभ्यता से ही टकरा रहे थे, यह तथ्य हिन्द स्वराज में है। 
गांधी ने अंग्रेजी सभ्यता को मानवता विरोधी कहा और लिखा “यह सभ्यता तो अधर्म है और यह यूरोप में इतने दर्जे तक फैल गयी है कि वहां के लोग आधे पागल जैसे देखने में आते हैं। उनमें सच्ची कूवत नहीं है, वे नशा करके अपनी ताकत कायम रखते हैं। एकान्त में वे बैठ ही नहीं सकते। जो स्त्रियां घर की रानियां होनी चाहिए, उन्हें गलियों में भटकना पड़ता है, या कोई मजदूरी करनी पड़ती है। इंग्लैण्ड में ही चालीस लाख गरीब औरतों को पेट के लिए सख्त मजदूरी करनी पड़ती है। (वही पृष्ठ 40) गांधी यहां निरे राष्ट्रवादी या अहिंसावादी ही नहीं हैं। वे आक्रामक योद्धा हैं। वे अंग्रेजी सभ्यता को भारत के लिए खतरनाक बताते हैं, स्वयं इंग्लैड के लिए भी खतरनाक बताते हैं। वे भारत के कुछ हिस्सों में इस सभ्यता के न पहुंचने के सुखद परिणाम भी बताते हैं “और जहां यह चांडाल सभ्यता नहीं पहुंची है वहां हिन्दुस्तान आज भी वैसा ही है। उसके सामने आप अपने नये ढोंगों की बात करेंगे, तो वह आपकी हंसी उड़ायेगा। (वही पृष्ठ 63) गांधी जी ने अंग्रेजी सभ्यता के लिए चाण्डाल सभ्यता का आक्रामक प्रयोग किया है। गांधी विचारधारा को “मजबूरी का नाम महात्मा गांधी” बताने वाले आधुनिकतावादियों को ‘हिन्द स्वराज’ जरूर पढ़ना चाहिए।
प्राचीन रोम और यूनान ही यूरोप के प्रेरणा स्रोत हैं। अंग्रेजों की अपनी कोई दार्शनिक परम्परा नहीं है। भारत की संस्कृति प्राचीन है। भारत में हजारों वर्ष की तप साधना के जीवन्त अनुभव हैं। गांधी जी ने लिखा “जो रोम और ग्रीस गिर चुके हैं, उनकी किताबों से यूरोप के लोग सीखते हैं। उनकी गलतियां वे नहीं करेंगे ऐसा गुमान रखते हैं। ऐसी उनकी कंगाल हालत है, जबकि हिन्दुस्तान अचल है, अडिग है। यही उसका भूषण है। हिन्दुस्तान पर आरोप लगाया जाता है कि वह ऐसा जंगली, ऐसा अज्ञान है कि उसे जीवन में कुछ फेरबदल कराये ही नहीं जा सकते। यह आरोप हमारा गुण है, दोष नहीं।” (वही, पृष्ठ 61-62) भारत में योग विज्ञान की प्राचीन परम्परा है। आत्मतत्व और समत्व दृष्टि पाना ही यहां सभ्यता है। गांधी जी ने लिखा “सभ्यता वह आचरण है, जिससे आदमी अपना फर्ज अदा करता है। फर्ज अदा करने के मानी हैं नीति का पालन करना। नीति के पालन का मतलब है अपने मन और इन्द्रियों को बस में रखना। यही सभ्यता है।” (वही पृष्ठ 62) भारतीय राष्ट्रीय जीवन में सभ्यता के मानक हैं। समत्व योग प्रथम मानक है। ऋग्वेद में सभा-समितियां हैं। जो स-मिति (बुद्धि सहित) है, वह समिति के योग्य है और जो सभ्य है, वह सभेय है, वही सभ्य है। लेकिन अंग्रेजी सभ्यता उल्टा पाठ पढ़ा रही थी। 
अंग्रेजी सभ्यता के असर तमाम कांग्रेजनों पर थे। गांधी जी के अंतरंग पं0 जवाहर लाल नेहरू उनमें से एक थे। गांधी जी ने 2 मई 1933 का यरवदा जेल से पं0 नेहरू को पत्र लिखा, “मैं धर्म नहीं छोड़ सकता, इसलिए हिन्दुत्व छोड़ असंभव है। हिन्दुत्व के कारण ही मैं ईसाइयत इस्लाम और अन्य धर्मो से प्रेम करता हूँ इसे मुझसे दूर कर दो तो मेरे पास कुछ भी नहीं बचेगा।” गांधी जी 100 बरस पहले अंग्रेजी सभ्यता पर हमलावर थे। अंग्रेजी ने यहां 1947 तक राज किया। धर्मांतरण कराए। सभ्यता का सर्वनाश भी किया। अंग्रेज चले गये लेकिन भारत ने ब्रिटिश संसदीय परम्परा का ही अनुकरण किया। भारत आज भी अंग्रेजों द्वारा अधिनियमित पुलिस कानून 1861 पर निर्भर है। आई0पी0सी0, सी0आर0पी0सी0 अंग्रेजी निशानी है। भारत अंग्रेज हो रहा है। पहले ईस्ट इण्डिया कम्पनी थी अब ढेर सारी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां हैं। भारत का शरीर, मन और बुद्धि आहत है। राष्ट्रीय आत्मा बेचैन है। ‘हिन्दस्वराज’ का बीज मन्त्र इस बेचैनी का निदान है। 
 
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