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भुखमरी की कगार पर किसान

  उमांकात मिश्र 

उन्नाव। लखनऊ औद्योगिक विकास क्षेत्र लीडा की परिधि में आने वाली जिले की लगभग साठ किलो मीटर उपजाऊ कृषि भूमि पर किसान न तो फसलों को ही उगा पा रहे है न ही लीडा उन्हे वाजिब मुआवजा ही दे पा रहा है ओर तो और प्राधिकरण के कब्जे वाले क्षेत्र  में लोगों को अपने घरों की मरम्मत करना भी मुश्किल है जैसे तैसे बरसात बिताने के बाद  ठण्ड की सर्द रातों की लोग याद करके सिहर उठते है लेकिन तंदा में डूबा लीडा प्रशासन किसानों की इस समस्या पर तवज्जों नही दे रहा है।
उल्लेखनीय हो कि तकरीबन पांच साल पहले राज्य सरकार द्वारा कानपुर व लखनऊ महानगर के बीच अमौसी  से लेकर जाजमऊ गंगापुल  तक की लगभग साठ किलोमीटर की बेल्ट  में आने वाले सौ गांवों  की जमीन अधिग्रहीत कर ग्रेटर नोयडा की तर्ज पर इसे विकसित करने का फैसला लिया था चिन्हाकिंत हाइवे के दानों ओर एक किलोमीटर की भूमि पर लखनऊ औद्योगिक विकास प्राधिकरण द्वारा किसानों को अपनी भूमि पर कृषि काय्र तथा घरों की सुरक्षा करने से रोका जा रहा है जिससे उनमें आक्रोश है। 
प्रभावित क्षेत्र के गांवों के किसान ग्राम प्रधानों की अगुवाई में लाभ बंद हो रहे है आन्दोलन  को प्रभावी बनाने के लिए प्रताडित किसानों ने चैधरी  महेन्द्र सिंह टिकैत के भी न्योता भेजा है जिससे सरकार व भूस्वामियों के बीचपश्चिम बंगाल जैसे स्थिति बनने के आसार बढते जा रहे है। हाथ से उपजाऊ भूमि निकलते देख उन्नाव के आसपास के गांवों में रोज इस मुद्दे को लेकर पंचायते लग रही जिससे वातावरण आन्दोलन  का रूप लेता जा रहा है किसानों  का कहना है कि मंदी व मंहगाई  की संयुक्त त्रासदी  से लखनऊ  उन्नाव के बीच पहले से लगे सैकडों कारखाने घाटे में है जिन्हे मद्द करने के बजाय सरकार किसानों के काम में  भी अडंगा डाल रही है। 
बताते चले कि सूबे की राजधानी  लखनऊ औद्योगिक राजधानी  कानपुर के बीच स्थित जनपद  उन्नाव की भूमि व्यवसायिक  दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण  मानी जाती है गंगा व सई नदीं के दोआले में किसान फूलों  व सब्जी की खेती करके अच्छी कमाई करते  है क्षेत्र का उपजाया गया टिण्डा  व कुम्हडा  अन्तराष्ट्रीय बाजार में अपनी पहचान बना चुका हैं। लेकिन सरकार  नयी नीति से प्रगतिशील व महत्वांकाक्षी  किसान  आज अपने को बेरोजगार  महसूस कर रहे है प्रभावित ग्रामीणों  का कहना है कि सरकार  किसानों  को  सहायता देने के बजाय उनके मुंह का निवाला छीनने का काम कर रही है। 
क्षेत्र के गांव बजेरा के प्रधान मनोज मिश्र का कहना है कि लीडा किसानों  के साथ भेदभाव  कर रहा है सई नदी  के पहले स्थित भ्ूामि के मूल्य की अपेक्षा काफी कम है जिसे  समायोजित किये बिना औद्योगिक क्षेत्र को बढावा  देना गलत है। दरोगाखेडा  के प्रधान राकेश सिंह किसानों  की कुल जमीन का पच्चीस फीसदी  भाग सुरक्षित रखने की सलाह  देते है नटकुर व कुरौनी के प्रधान औद्योगिक क्षेत्र की भूमि को बाजारी दर से बेचने पर संकल्पित है अन्यथा की स्थिति में किसान  आत्महत्या करने की बात कर रहे है जबकि लीडा के अधिशाषी  प्रोजेक्ट अधिकारी आर पी सिंह का कहना है कि अधिसूचना  जारी होने के बाद अधिग्रहीत क्षेत्र सरकार के नियंत्रण  में हो जाता है मुआवजा  के मसले पर श्री सिंह  बताते है कि किसानों  को मांगों पर विचार हो रहा है उनका नुकसान नही होने दिया जायेगा। जबकि सूत्र बताते है कि लीडा को विकसित  करने के लिए सरकार द्वारा  अब तक आवष्टित  50 करोड की धनराशि कर्मचारियों  के वेतन आदि  में वितरित  हो चुकी है अब नई व्यवस्था ओं को सृजित  करने के लिए प्राधिकरण   फिर से हाथस पांव मार रहा हैं बताया जाता है लीडा किसानों को मुआवजा धनराशि हुडकों से  कर्ज लेकर देने कीयोजना बना रहा है लेकिन इस काम के लिए अपेक्षित 200करोडकी उधारी  के लिए  लीडा  कोकोई गारष्टर  नही मिला प्राधिकरण  के पास भी कोई स्थायी  समिति नही जिसे वह गिरवी रखकर अपनी जरूरत पूरी कर सके। प्राधिकरण  के अधिकारी अब नयेसिरे से उधारी पाने की सम्भावनंांए  तलाश  रहे है जिसमें उसे कहा तक सफलता मिलती है यह तो साफ नही किया ज सकता लेकिन इस पूरे फसाद  में एक बात तय है कि लगभग पांच सालों से भूमिहीन बने किसानों को यदिइ समय पर भुगतान न किया गयातो टकराव होना निश्चित हैं। 
 
 
 
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