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चुनार किला संकट में

 कुमार अरुण 

मीरजापुर.अक्टूबर । मीरजापुर देश के अति महत्व की पुरातत्व धरोहरों में से एक मीरजापुर जनपद में स्थित ‘चुनार दूर्ग‘ सरकारी उपेक्षा का शिकार होकर ध्वस्त होने के कगार पर है। बाबू देवकी नंदन खत्री के प्रसिद्ध उपन्यास ‘चन्द्रकान्ता संतति‘ और भूतनाथ में इस चुनार दूर्ग का विस्तृत वर्णन मिलता है। इस दूर्ग के संदर्भ में कहा जाता है कि उज्जैनी के शासक राजा विक्रमादित्य ने इसका निर्माण कराया था। किले के अन्दर राजा विक्रमादित्य के भाई राजाभतृहरि की समाधि है जो नवनाथों में एक माने जाते हैं।
मीरजापुर मुख्यालय से 35 किलो मीटर दूर पर बसे इस किले का महत्व इसलिए अधिक था क्योंकि गंगा तट पर होने से जल मार्ग की सुगमता थी। इससे राजा-महराजाओं के लिए एक उपयोगी ऐतिहासिक स्थलीय बना रहा। स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में यह दूर्ग प्रमुख रूप से चिन्हित हुआ है। जहां गाधीवादी स्वाधीनता संग्राम सेनानी बाबू विश्राम सिंह ने इस दूर्ग के मुख्य द्वार पर स्वतंत्रता प्राप्ति के 10 वर्ष पूर्व ही तिरंगा ध्वज फहराकर इस दूर्ग को स्वतंत्रता इतिहास का साक्षी बना लिया था। इतिहासकार यह दूर्ग कब और किसने बनवाया इस पर एक मत नहीं है किन्तु स्थानीय लोग इसे द्वापर युग का बसा मानते हैं तथा कहतें है कि चुनार पाषाण कालीन बस्तियों में से एक रहा है। पत्थरगढ़, नैनागढ़, चरणाद्रिगढ़ आदि विभिन्न नामों से विख्यात यह गढ़ मुस्लिमकाल में पृथ्वीराज चैहान के अधिकार में भी रहा।
दूर्ग के मुख्य द्वार पर लगे शिलालेख से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस दूर्ग पर 56 ई0पू0 में विक्रमादित्य, वर्ष 1141 से 1191 तक पृथ्वीराज चैहान, वर्ष 1194 से मोहम्मद गौरी, वर्ष 1512 में सिकन्दर लोदी (द्वितीय), वर्ष 1529 में बाबर, वर्ष 1530 में शेरशाह, वर्ष 1531 में हुंमायु, वर्ष 1538 में शेरशाह, वर्ष 1545 में जौनपुर के मोहम्मद शाह, वर्ष 1545 से 1562 तक इस्लाम शाह, वर्ष 1575 में मिर्जामुकिम, वर्ष 1750 में मंसूर अली खाँन, वर्ष 1765 में ब्रिटिश, वर्ष 1781 में हेस्टिंगस के आधिपत्य का उल्लेख मिलता है। इस शिलालेख में काल खण्डों के निरन्तरता का अभाव है। इस प्राचीनतम दूर्ग का इतिहास अभी तक तलाशा नहीं जा सका है। भिन्न-भिन्न काल खण्डों में भिन्न नामों से जाना जाने वाले यह दूर्ग लोक कथाओं के अनुसार भतृहरि के भाई और उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने अपने भाई को जंगली जानवरों से सुरक्षा के लिए बनवाया था।
प्रमाणिक आधार पर यह चुनार दूर्ग पृथ्वीराज चैहान के अधिकार में भी रहा। प्रसिद्ध साहित्यकार पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र‘ के अनुसार महाभारत काल का मगध सम्राट जरासंघ इस दूर्ग का उपयोग अपने शत्रुओं को बन्दी बनाकर रखने के लिए करता रहा। यदि इसे प्रमाणिक माना जावे तो चुनार के दूर्ग को प्राचीनतम दूर्गांे में से एक माना जा सकता है। मीरजापुर गजेटियर के अनुसार चुनार का सम्बन्ध संदेवा नामक राजा से भी होने की पुष्टि होती है। चुनार दूर्ग में आज भी सोनवा मण्डप मौजूद है जो राजा संदेवा की पुत्री सोनवा के विवाह रचाने के लिए बनाया गया था व आज भी सोनवा के विवाह सम्पन्न होने की बाट जोह रहा है। जिसका उल्लेख स्थानीय लोक गायक आल्हा उदल की वीरता की प्रशंसा में गाये जाने वाले आल्हा गीतों में करते हैं।
गुलामवंश के शासक इल्तुतमिश के समय चुनार गुलाम शासकों के कब्जे में था। 1458 से 1505 के काल खण्ड में चुनार दूर्ग के सुल्तान हुसैनशाह शर्की के अधीन होने के प्रमाण मिलते हैं। इस काल खण्ड में लोदी विरोधी गतिविधियों के केन्द्र बिन्दु चुनार में विद्रोहियों को खदेड़ने का कार्य मुबारक खाँ को सौंप दिया गया था। बाबर ने अफगानों को बंगाल तक खदेड़ कर चुनार दूर्ग पर अपना अधिपत्य जमा लिया था। बाबर ने चुनार का हाकिम किसी सुल्तान जुैनद बरला को नियुक्त किया था तब यह दूर्ग बिहार व बंगाल की कुंजी माना जाता रहा।
चुनार के इस ऐतिहासिक दूर्ग को पूरातत्व विभाग, पर्यटन विभाग तथा लोक निर्माण विभाग सहित पी0ए0सी0 के रिक्रूट प्रशिक्षण केन्द्र के जिम्में सौंप देख रेख किया जा रहा है। इस संदर्भ में पी0डब्लू0डी0 विभाग के चीफ इन्जीनियर सुधीर कुमार ने बताया कि मेरे विभाग के जिम्में मरम्मत की कोई जिम्मेदारी नहीं है। केवल पोताई का कार्य किया जा सकता है। इस किले का इतिहास मुझे पता नही है।
पुरातत्व विभाग के क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी लवकुश द्विवेदी ने बताया कि पुरा किला विभाग के नियंत्रण में न होने से पूरी तरह से कार्य नहीं हो पा रहा है।  इस संवादाता ने देखा कि किले के अन्दर नव निर्माण चल रहा है इस पर पूछे जाने पर क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी ने बताया कि नव निर्माण की मुझे कोई जानकारी नहीं है। 
क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी दिनेश कुमार ने बताया कि मेरे विभाग के जिम्में केवल लाईट, पानी व पंहुच मार्ग की ही देख रेख की जिम्मेदारी है उनका भी मानना है कि इस दूर्ग को आम पर्यटकों के लिए पूरी तरह खोल दिया जाना चाहिए। 
इस दूर्ग में पी0एस0सी0 रिक्रूट प्रशिक्षण केन्द्र चलाया जा रहा है तथा नवनिर्माण भी किया जा रहा है दूर्ग के देख रेख की घोर उपेक्षा की जा रही है। दूर्ग की बाहरी दिवारें टूट कर गिर चुकी हैं। पी0डब्लू0डी0 गेस्ट हाउस के आठ कमरे बिल्कुल की गिरहर एवं जर्जर हालत में है जो कभी भी क्षतिग्रस्त होकर गिर सकती है। रख रखाव के अभाव में दूर्ग क्षतिग्रस्त होता जा रहा है। सम्बन्धित विभाग के अधिकारियों द्वारा एक दूसरे पर दोषारोपण कर अपने कर्Ÿाव्यों से मुह मोड़ा जा रहा है। सरकार द्वारा दूर्ग संरक्षण एवं रख रखाव के नाम पर भारी धनराशि उपलब्ध कराने के बावजूद यह प्रागैतिहासिक दूर्ग अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है। पी0एस0सी0 पुलिस द्वारा अपनी सुविधा के लिए दूर्ग के अन्दर नव निर्माण कर दूर्ग के वास्तविक सौन्दर्य को वर्दी के रोब में खुले आम ध्वस्त किया जा रहा है। 
यदि समय रहते इस दूर्ग को सम्बन्धित विभागों से मुक्त कराकर पूर्ण रूप से पुरातत्व विभाग को नहीं सौंपा गया तथा इसकी समुचित व्यवस्था नहीं की गयी तो शीघ्र ही धाराशायी हो गंगा की लहरों में समा जावेगा जो सिर्फ इतिहास के पन्नों में पढ़ा जा सकेगा देखा नही जा सकेगा। 
 
 
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