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शिवनाथ के इतिहास का राज

 गोविंद ठाकरे

रायपुर. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) शिवनाथ नदी घाटी क्षेत्र में प्राचीन नगरों के अवशेष और औजारों की खोजबीन करेगा। महानदी की सहायक नदी के इर्दगिर्द ऐतिहासिक व प्रागैतिहासिककाल की समृद्ध सभ्यता के मिलने की उम्मीद है। पुराविदों के मुताबिक प्रदेश में केवल मल्हार से ईसा पूर्व के मौर्यकालीन अवशेष प्राप्त हुए हैं। शिवनाथ नदी घाटी सर्वे से यह तिथि और पीछे खिसक सकती है।
राज्य में पुरातत्व सर्वेक्षण का कार्य पहली बार किसी केंद्रीय संस्थान को मिला है। राज्य पुरातत्व विभाग को सिरपुर, सिली पचराही, महेशपुर, मदकूद्वीप और खारून तट पर स्थित तरीघाट के सर्वे-उत्खनन का लाइसेंस पहले ही मिल चुका है। दुर्ग से सिमगा तक शिवनाथ के दोनों ओर डेढ़ से दो किलोमीटर हिस्से की गहन छानबीन का प्लान तैयार कर एएसआई के दिल्ली कार्यालय से सर्वेक्षण की अनुमति मांगी गई थी।
विशेषज्ञों ने महत्वपूर्ण पुरातात्विक अवशेष मिलने की संभावना के आधार पर रायपुर मंडल के प्रमुख सीएलएन शास्त्री के नाम से लाइसेंस दिया है। शंकरनगर में एएसआई के रायपुर मंडल का दफ्तर जून 2003 में खुला था। अब तक यह प्राचीन मंदिरों और स्थलों का संरक्षण करता रहा। विभाग की मुख्य जिम्मेदारी राज्य में चल रही पुरातात्विक गतिविधियों पर रखना और संरक्षण है। पूरे प्रदेश में इसकी संरक्षित 48 साइट हैं।
पहले मिले थे टूल्स : व्यवस्थित सर्वे के अभाव में अब तक शिवनाथ के तटवर्ती इलाके में दफन इतिहास का रहस्य बरकरार है। छोटे-मोटे शोध कार्य होते रहे हैं। काफी समय पहले ग्वालियर के प्रोफेसर आरबी पांडे ने इस इलाके में रिसर्च की थी। उन्हें नांदघाट वैली से प्राचीन सभ्यता के टूल्स मिले थे। कुछ जगह टीले होने के संकेत भी मिले थे। इससे प्राचीन नगर के अवशेष मिलने की संभावना भी प्रबल हुई थी। इसके बाद से कोई व्यवस्थित सर्वे नहीं कराया गया। यही वजह है कि पुराविदों के पास बहुत अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।
 
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