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सुरक्षित ठिकानो की ओर

 श्रीपति त्रिवेदी

दंतेवाड़ा,  दिसंबर- माओवादियों के खिलाफ ऑपरेशन ग्रीन हंट बहुत खामोशी से लेकिन बहुत निर्णायक जिद के साथ शुरू हो चुका है। लाशों की गिनती अभी नहीं हो रही मगर बस्तर के धुर दक्षिणी कोने पर बसे इस छोटे से शहर में साफ नजर आ जाता है कि यह युद्व भूमि बन चुकी है। 
किसी भी इलाके के युद्व भूमि बनने का पहला संकेत आम लोगों का पलायन होता है। दंतेवाड़ा से ले कर कांकेर तक और पड़ोस में आंध्र प्रदेश के खम्मम और उड़ीसा के रायगड़ा जिलों में लोग पैदल ही सुरक्षित ठिकानो की ओर बढ़ रहे हैं और इस राजमार्ग पर जाम लगा हुआ है। पलायन कर रहे इन आदिवासियों की कहानी बहुत विचित्र है। वे कहते हैं कि इधर से माओवादी मारते हैं तो उधर से सीआरपीएफ की गोलियां चल रही है। उनके जानवर मारे गए और वे नहीं जानते कि कितने पड़ोसी गोली के शिकार हुए हैं। दिल्ली में गृह मंत्री पी चिदंबरम ने दोहराया है कि किसी भी हाल में आम नागरिक की कीमत पर हमला नहीं बोला जाएगा। आम आदमी की सुरक्षा पहला सवाल है। यहीं आ कर सीआरपीएफ के हाथ बंध जाते है। आम आदमियों की इस भीड़ में पुलिस और सीआरपीएफ की सुरक्षा में पलायन कर रहे लोगों में बहुत सारे माओवादी भी हैं इसलिए सरकारी बलों को खोज खोज कर कदम रखने पड़ रहे है। दंतेवाड़ा जिले के बोथीकोया और गोंड आदिवासियों में से तीन सौ से ज्यादा परिवार रोज भद्राचिलम पहुंच रहे हैं। वहां काम नहीं हैं इसलिए अब वे मजदूरी करने के लिए हैदराबाद की तरफ बढ़ रहे हैं। सुरक्षा बलों ने आंध्र और उड़ीसा से जुड़ी छत्तीसगढ़ की सीमाए माओवादियों के आवागमन को रोकने के लिए सील कर रखी है और इसीलिए खम्मम के जंगलों से होते हुए हजारों आदिवासी रोज भद्राचिलम पहुंच रहे हैं। इनकी शिकायत यह भी है कि मुठभेड़ में एक भी माओवादी मारा जाता है तो माओवादी गिरोह लौट कर आते हैं और मुखबिरी करने के इल्जाम में सीधे गांव वालों को मौत की सजा दे देते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार ने इन लोगों के लिए सुरक्षित शिविर बनाए हैं लेकिन उस तरफ आदिवासी नहीं जा रहे। उन्हें समझाने के लिए सल्वा जुडूम के कार्यकर्ताओ की मदद ली जा रही है।
 
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