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पर्यावरण पर अमेरिकी खतरा

मनोज मिश्र

इस समय वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन की बहस गम्भीर दौर में पहुँच चुकी है। धरती का तापमान प्रति दशक बढ़ता ही जा रहा है और इसी बढ़ते तापमान के साथ - 2 हमारी चुनौतियाँ और चिन्तायें भी बढ़ रही है। तापमान में इस वृद्धि के कारण जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों का पिघलना, फसलों की बरबादी, समुद्री जल स्तर में वृद्धि सहित तमाम जानी - अनजानी समस्याओं से पूरे विश्व को जूझना पड़ेगा। देशों की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि अवश्यभांवी हैं। अधिक ऊर्जा की खपत की धरती के तापमान में वृद्धि का प्रमुख कारण माना जा रहा है। पूरी दुनियाँ मे जीवाश्म (पेट्रो ईधन) ईधन द्वारा ऊर्जा का सर्वाधिक उत्पादन किया जा रहा है, यह ईधंन ही कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार माना जाता है। अतः इस समय इस ईधंन के विकल्प के तौर पर कार्बन मुक्त ऊर्जा की संभावनाओं की तलाश पूूरी दुनियाँ में जोर-शोर से की जा रही है। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के कारण तापमान में वृद्धि इस समय हमारे देश के साथ - साथ पूरे विश्व के लिए चिन्ता का कारण है। स्वच्छ ऊर्जा तकनीकोें का इस्तेमाल कर कार्बन मुक्त ऊर्जा का उत्पादन, वायुमण्डल में कार्बन की अधिकता को नियन्त्रित कर कम करने की तकनीक तथा उपर्युक्त इन दोनो तरह की तकनीकों के लिए विपुल धनराशि की उपलब्धता समय की मांग है। जलवायु परिवर्तन की संस्था आईपीसीसी की 2007 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार पिछली सदी में तापमान में लगभग 0.60ब् की वृद्धि हुई थी तथा वर्तमान सदी के अन्त तक इसके लगभग 60ब् तक बढ़ जाने की आशंका व्यक्त की गई है। वर्तमान मे वायुमण्डल में कार्बन डाई आक्साइड का सान्द्रता स्तर 379 पी0पी0एम0 है जबकि भविष्य में इसके 550 पी0पी0एम0 तक पहुँच जाने की उम्मीद है। बीसवीं सदी में समुद्री जल स्तर में 1.7 मि0मी0 की वृद्धि हुई तथा भविष्य में समुद्री जल स्तर मंें वृद्धि 18 से 59 से0मी0 होने की संभावना है। हम प्रतिदिन 72 मिलियन टन प्रदूषित पदार्थ धरती के वाुयमण्डल में फेंक रहे है। समुद्री जल स्तर बढ़ते रहने के कारण आगामी 50 वर्षाेें में लगभग 150 मिलियन पर्यावरणीय विस्थापितों की समस्या से पूरी दुनिया को जूझना पड़ेगा। हिमालय के ग्लेशियर प्रति वर्ष 18 मी0 की दर से सिकुड़ रहे है, इन ग्लैशियरोें से एशिया की प्रमुख 9 नदियों के सूख जाने का खतरा है। यदि धरती के तापमान में मात्र 0.50ब् से 1.50ब् तक की वृद्धि हो तो गेहूँ, मक्का के उत्पादन में 2.5 प्रतिदिन गिरावट होने के संभावना है। इसी रिपोर्ट के अनुसार यदि तापमान में 2.30ब् तक की वृद्धि हुई तो पूरी दुुनियाँ के उत्पादन में लगभग में लगभग 3 प्रतिशत की गिरावट की आंशका है। इन सारी संभावनाओं एवं आशंकाओं के कारण धरती के तापमान की वृद्धि दर रोकनी अति आवश्यक है। कार्बन मुक्त ऊर्जा का उत्पादन तथ वायुमण्उल में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा को नियन्त्रित कर कम करने की तकनीक ही इस समस्या का समाधान है। इस समय एनेक्स-1 देशों (विकसित या औद्योगिक) बनाम विकासशील देशों का कार्बन उत्सर्जन सम्बन्धी विवाद चर्चा का विषय है। मालूम हो कि अमेरिका प्रति वर्ष प्रति व्यक्ति लगभग 20.6 टन कार्बन, कनाडा 20 टन, इग्लैण्ड 9.8 टन, चीन 3.8 टन तथा भारत 1.2 टन प्रतिवर्ष प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जित कर वायुमण्डल को प्रदूषित कर रहे है। कुल आबादी की दृष्टि से देखें तो चीन का कुल कार्बन उत्सर्जन विश्व में पहले स्थान पर तथा भारत का चैथे स्थार पर है। अतः विवाद प्रतिवर्ष प्रति व्यक्ति बनाम कुल कार्बन उत्सर्जन प्रति वर्ष हैं विकास शील देशों में चीन और भारत के कुल कार्बन उत्सर्जन पर विकसित देश कड़ा रवैया अपनाये हुये है। क्योटो प्रोटोकाल के बाद दिसम्बर मे होनें वाले कोपेन हेगन सम्मेलन में यह विवाद मुख्य सुर्खियों में रहने वाला है। अभी तक धरती के तापमान में वृद्धि के लिए विकसित देश ही जिम्मेदार है। हाँ जैसे - 2 विकास का पहिया गति पकड़ेगा वैसे - 2 ऊर्जा की खपत बढ़ने के साथ - 2 कार्बन उत्सर्जन की दर भी बढ़ती जायेगी। भारत में अभी कुल ऊर्जा उत्पादन में कोयले के द्वारा उत्पादित ऊर्जा का हिस्सा लगभग 65ः है, जबकि हाइड्रो ऊर्जा का हिस्सा 2.6ः, नाभिकीय ऊर्जा लगभग 3ः और स्वच्छ ऊर्जा का हिस्सा लगभग 5ः है। हमें भविष्य के विकास की संभावना को देखते हुए पर्यावरण के अनुकूल नाभिकीय ऊर्जा, हाइड्रोजन ऊर्जा, जैविक ऊर्जा, सौर ऊर्जा तथा पवन ऊर्जा सहित तमाम विकल्पों की तलाश करनी होगी। इन माध्यमों से उत्सर्जित ऊर्जा पर्यावरण के काफी अनुकूल है तथा इन्हे स्वच्छ ऊर्जा कहा जाता है। अभी इन ऊर्जा स्त्रोतांें का दोहन तुलनात्मक दृष्टि से उचित टेक्नोलाजी के अभाव में बड़े पैमाने पर नहीं किया जा सका है। इन ऊर्जा विकल्पों में सर्वाधिक उपयुक्त सौर ऊर्जा का उत्पादन है क्योंकि भारत में साल भर में लगभग 300 दिनों तक तेज धूप खिली रहती है। सौर ऊर्जा के लिए कार्बन नैनो ट्यूब आधारित फोटो वोल्टाइक सोलर सेल पर शोध आवश्यक है। अभी उपलब्ध सोलर सेल की क्षमता अधिकतम 40 प्रतिशत हे जिसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत किया जाना है। भारत ने सौर उत्पादन के लिए आगामी 20 वर्षाें में 20000 मेगा वाट ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा है जिसे पूरी दुनियाँ में सराहा गया है। दूसरी वैकल्पिक ऊर्जा पवन ऊर्जा है, इस ऊर्जा के उत्पादन के लिए सस्ती और क्षमतावान पवन चक्कियों का विकास हमारें ऐजण्डें में होना चाहिये। अभी तक देश के कुल ऊर्जा उत्पादन मंें पवन ऊर्जा का हिस्सा मात्र 1.6ः है जबकि जर्मनी, ब्रिटेन, स्पेन, फ्रान्स, इटली जैसे पवन ऊर्जा के अग्रणी देशों से सबक लेकर इस संभावना का भरपूर दोहन करना चाहिए। भारत का पवन ऊर्जा के लिए लगभग 7800 कि0मी0 का समुद्री किनारा प्रकृति प्रदत्त नैसर्गिक वरदान है। समुद्री तरंगों से उत्पन्न ऊर्जा के लिए शोध की आवश्यकता है जबकि हाइड्रोजन से उत्पन्न ऊर्जा के लिए सस्ते और अच्छी क्षमता के हाइड्रोजन सेल के विकास पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। वैकल्पिक ऊर्जा स्त्रोंतो में जैविक ऊर्जा का क्षेत्र भी अति महत्वपूर्ण है। हमारे देश में लगभग 60 मिलियन हेक्टेअर भूमि बेकार पड़ी है जिसमें लगभग आधी (30 मिलियन हेक्टेयर) भूमि जेट्रोफा के उत्पादन के लिए उपलब्ध है। जेट्रोफा की खेती में अच्छी बात यह है इसके एक बार बोने के उपरान्त लगभग 50 वर्षाें तथा पुनः बोने की आवश्यकता नहीं है। देश के पूर्व राष्ट्रपति महामहिम डाॅ0 कलाम के अनुसार जेट्रोफा से उत्पन्न बायो डीजल की कीमत लगभग 20 रू0 प्रति लीटर आंकी गई। सरकार ने कारों में इस्तेमाल होने वाले डीजल में बायो डीजल की अधिकत्म मात्रा 10 प्रतिशत तय की है। जेट्रोफा से उत्पन्न बायो डीजल कार्बन मुक्त है तथा इसका उत्पाद एग्रो इन्डस्ट्री के लिए बेहद उपयोगी है। नाभिकीय ऊर्जा के उत्पादन क्षेत्र में हमारा फोकस यूरेनियम के बजाय थोरियम पर होना चाहिए। हमारे देश में लगभग 2,25000 टन थोरियम की उपलब्ध आंकी गई है जो पूरी दुनियाँ में उपलब्ध थोरियम का लगभग एक चैथाई हिस्सा है। अतः हमें नाभिकीय ऊर्जा के क्षेत्र में यूरेनियम के साथ - 2 थोरियम आधारित रियक्टर विकसित करने की आवश्यकता है तथा दूसरी टेक्नोलाजी ए0डी0एस0 (एस्सीलेटर ड्रविन सिस्टम) द्वारा थोरियम का उपयोग ऊर्जा उत्पादन किया जाना देश हित में हे। देश की उत्पादित ऊर्जा के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से कोयला के शुद्धिकरण की तकनीक के विकास पर भी ध्यान दिया जाना जरूरी है, क्योंकि भारत में कोयले की क्वालिटी खराब है जिसमंे सल्फर की मात्रा अधिक है अतः यह कोयला सल्फर की उपस्थिति के कारण पर्यावरण के लिए अति नुकसान दायक है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि जो पर्यावरण खराब हो चुका है उसको नियन्त्रित कर कम किये जाने की आवश्यकता भी है। पर्यावरणीय प्रौद्योगिकी का विकास इस दिशा में महत्वपूर्ण है। दुनियाँ खासकर अमेरिका में इन तकनीकों पर शोध की संभावनायें में ढूढ़ी जा रही है। इन तकनीको में कार्बनडाई आक्साइड को वायुमण्डल में सोख लेना, वायुमण्डल के सतह पर पहुँचने से पहले सूर्य के प्रकाश को परावर्तित कर देना, सूर्य के प्रकाश को धरती पर पहुँचने से पहले परावर्तित कर देना, तथा कार्बनडाई आक्साइड को वायुमण्डल में पकड़कर धरती के नीचे दबा देना प्रमुख है। इन तकनीकों में कुछ सस्ती तथा कुछ महंगी है। आगामी भविष्य में ये तकनीके पर्यावरण स्वच्छ करने के साथ - 2 धनोपार्जन का साधन भी बनेंगी। आने वाले समय में बौद्धिक सम्पदा के दुरूपयोग की संभावना को नकारा नही जा सकता है। यह तथ्य विदित है कि क्लीन टेक्नोलाजी के क्षेत्र में अधिकतम शोध एवं विकास निजी कम्पनियों द्वारा ही किया गया है। अतः वे इन तकनीकों के बदले ऊँचे दामों की मांग करेगें। स्वच्छ ऊर्जा के उत्पादन तथा अबतक के प्रदूषित पर्यावरण के लिए अथाह धनराशि की आवश्यकता है। औद्योगिक/विकसित देश पर्यावरण बिगाड़ने के लिए जिम्मेदार हैं अतः इस धनराशि का इन्तजाम भी इन्हे की करना होगा। क्लीन टेक्नोलाॅजी के लिए प्रतिवर्ष विकासशील देशों को 100-150 बिलियन डालर की जरूरत पड़ेगी। एक अनुमान के मुताबिक विश्व की कुल अर्थव्यवस्था का यदि मात्र 1 प्रतिशत क्लीन टेक्नोलाॅजी पर खर्च कर दिया जायें तो सभी संभव समाधान निकाले जा सकते हैं। विकसित देशों को चाहिए कि वे उच्च स्तरीय एवं सस्ती टेक्नोलाॅजी विकासील देशों को हस्तानान्तरित करें। विकासशील देशो की सहायता के लिए यू0एन0ओ0 के द्वारा गठित तीनों कमीशनों क्रमशः पियर्सन कमीशन (1968), बिली ब्रान्ट कमीशन (1977) तथा ब्राट लैण्ड कमीशन (1983) में एक बात कही गई है कि विकसित देशों को अपनी कुल जी0एन0पी0 का लगभग 1 प्रतिशत हिस्सा विकासशील देशों को सहायता राशि के रूप में देना चाहिए। अमेरिका ने तो वर्ष 2003 में अपनी सहायता राशि 0.5 प्रतिशत से घटाकर 0.22 प्रतिशत कर दी। विश्व बैंक ने भी लगभग 5 विलियन डालर की राशि ग्रीन टेक्नोलाजी के लिए आवण्टित की है जबकि वैश्विक आवश्यकताओं को देखते हुए इस धन राशि को 20 गुना किये जाने की आवश्यकता है। कार्बन का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार भी लगभग 150 विलियन डालर का है। अतः स्वच्छ ऊर्जा तथा स्वच्छ टेक्नोलाजी के लिए कार्बन बाजार से, विश्व बैंक से तथा विकसित देशों से उपयुक्त धनराशि की व्यवस्था कर एक तरफ शोध विकास पर तथा दूसरी विकास शील देशों को सहायता प्रदान की जानी चाहिए। भारत भाग्यशाली है कि सौर ऊर्जा के लिए खिलीधूप जेट्रोफा के लिये उपलब्ध भूमि, थोरियम का अथाह भण्डार तथा पवन ऊर्जा के लिए लम्बा समुद्री किनारा उसके पास नैसर्गिक संसाधन के तौर पर उपलब्ध हैं। जरूरत है तो बस उचित टेक्नोलाजी का विकास तथा संसाधनों का दोहन।

 

 

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