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मीडिया के खिलाफ खोला मोर्चा

 अंबरीश कुमार  

लखनऊ, दिसंबर। मायावती सरकार के अफसरों ने अब मीडिया के खिलाफ मोर्चा खोल दिया हैं।इन अफसरों के चलते प्रदेश के सैकड़ों संवादाताओं की मान्यता ख़ारिज होने जा रही है।कई जिलौं  के सौ से ज्यादा संवादाताओं की मान्यता ख़ारिज की जा चुकी है ।यह उस नियम के चलते हुआ है जिसमे जिलों के संवादाताओं से सात हजार रुपये प्रति माह की सेलरी स्लिप मांगी गई । इनमें पीटीआई, यूएनआई,जनसत्ता ,अमर उजाला से लेकर देश -प्रदेश के अखबारों के जिला संवाददाता शामिल है   । मान्यता ख़त्म  होने के बाद इन्हें जिला स्तर की हर सुविधा बंद कर दी जा रही है जिसके जरिये संवाददाता ख़बरों का संकलन करते थे । इन्हें बस यात्रा की मुफ्त सुविधा भी बंद कर दी गई है । जाहिर है अब ख़बरों को या तो वे जबरन गढ़ेंगे या फिर खबरे लिखना बंद कर देंगे। यह प्रदेश की पत्रकारिता के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा हमला है जो सूचना निदेशक ने किया है  । इससे जिले जिले में मायावती सरकार के खिलाफ पत्रकार न सिर्फ मुखर हो रहा है बल्कि माहौल भी बनाने लगा है  । हर सरकार मिडिया प्रबंधन करती है पर इस सरकार के दो अफसर अपने कुप्रबंधन से मायावती की राजनीति में पलीता लगाने में जुट गए है ।   जबकि ज्यादातर जिलों में अखबार और एजंसी अंशकालिक  संवाददाता रखते है जिन्हें ख़बरों के हिसाब से मानदेय दिया जाता है और यह परिपाटी दशकों पुरानी है । पर सत्तारूढ़ दल के उत्साही अफसर पत्रकारिता का नया संविधान बनाने में जुट गए है  । आईफडब्लूजे के अध्यक्ष विक्रम राव ने कहा -यह अभिव्यक्ति की  आजादी पर अप्रत्यक्ष हमला है और गलत है  ।मान्यता समिति के सदस्य सुरेश बहादुर सिंह ने कहा -
यह  सारे नायाब फैसले सरकार के दो अफसर ले रहे है हमे तो पता भी नहीं है  । कुल मिलकर सरकार की छवि बिगाड़ने का ठेका सूचना निदेशक अजय  उपाध्यया ने ले रखा है जिसे एक और अफसर शह दिए हुए है और पत्रकारों के नेता किसी पत्रकार की आवाज उठाने वाले नहीं है है जिसके चलते पत्रकारिता पर और पत्रकारों पर हमला हो रहा है  ।
पत्रकारों की मान्यता समिति के दुसरे सदस्य शीतला बख्स सिंह ने कहा -समिति की बैठक में हम चाय समोसा खाकर उपाध्याय जी की हाँ में हाँ मिलाने के आलावा करे भी क्या ,जो वे कहेंगे वही नियम कानून बन जायेगा  ।दरअसल सरकार के उत्साही अफसरों ने मकान और मान्यता के जरिये पत्रकारों को दबा रखा है । एक पत्रकार ने कहा -आप अपना सरकारी घर बचाना चाहते है ,मान्यता बचाना चाहते है या नई मान्यता चाहते है तो दरबारी बने रहिये वर्ना यह सुविधा ख़तम हो जाएगी    । अब तो एक साल के लिए मकान आवंटित हो रहा है और दस महीने बाद इन मकान में रहने वाले पत्रकार की ख़बरों की भाषा जनसंपर्क अधिकारी वाली हो जाती है क्योंकि उसका रिनुअल होना  होता है । हलाकि मान्यताप्राप्त  पत्रकारों की समिति के अध्यक्ष प्रमोद गोस्वामी ने कहा -मान्यता के नए नियम का हमने विरोध किया है ,जहा तक मकान एक साल के लिए देने की बात है तो यह परिपाटी मुलायम सिंह ने शुरू की थी  । पर मान्यता समिति के दुसरे  सदस्य योगेश मिश्र ने कहा -मकान तो सरकार जिसे पसंद करे दे पर जिले के पत्रकारों की मान्यता ख़ारिज करना गंभीर मामला है । हैरानी की बात तो यह है की हम लोगो को बताया तक नहीं गया । 
पर आने वाले खतरे की तरफ इशारा आईफडब्लूजे के सिद्धार्थ कलहंस ने किया और कहा -करीब ४० जिलों से पत्रकारों के फोन आये है सभी परेसान है । अब तो कलेक्टर पत्रकारों पर अंकुश लगा कर रखेगा  । मान्यता उसी को मिलेगी जो सरकार की छवि बनायागा  । दूसरे साप्ताहिक और पंद्रह दिन वाली पत्रिकाए तो सात हजार वेतन का फर्जी प्रमाण पत्र भी बना देंगी अखबार वाले क्यों यह करेगे । एजंसी वाले तो हर महीने ७५० रुपये देते है उन्हें कैसे मान्यता मिलेगी । बसपा के एक महासचिव के अखबार में कई जिलों में हजार डेढ़ हार रुपये मिलता है क्या सूचना निदेशक उनकी भी मान्यता ख़ारिज कर देंगे । 
इस मसाले को लेकर माहौल गर्माने वाला है क्योकि इससे हजार से ज्यादा पत्रकारों की मान्यता पर संकट मंडरा रहा है । कुछ पत्रकार इस मामले में मुख्यमंत्री मायावती को पूरा ब्यौरा देने की तैयारी कर रहे है ताकि मकान और मान्यता की राजनीति कर रहे अफसरों का पर्दाफाश  किया जा सके ।  जनसत्ता से साभार 
 
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