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विदा हो कर भी वे विदा नहीं

 सुप्रिया रॉय 

 लाल कृष्ण आडवाणी के महत्व का संघ परिवार को पता है इसलिए भाजपा की राजनीति से विदा हो कर भी वे विदा नहीं होंगे । संघ परिवार इस बात पर सहमत हो गया है कि आडवाणी को सोनिया गांधी की तरह भाजपा संसदीय दल का मुखिया बना दिया जाए। ऐसा होने पर  आडवाणी सुषमा स्वराज और अरुण जेटली दोनों के मुखिया हो जाएंगे। यह पार्टी का पद होगा और इसे कोई संसदीय मान्यता नहीं होंगी। प्रतिपक्ष के नेता के तौर पर आडवाणी को मंत्री का दर्जा मिला हुआ हैं और पार्टी के फैसलों पर उनकी मुहर लगना अनिवार्य है। इसमें दिक्कत सिर्फ यह है कि एनडीए के संयोजक के तौर पर काम कर रहे शरद यादव और उनके साथी बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार जरूर दिक्कत में पड़ जाने वाले हैं। भाजपा अकेले सरकार बनाने की हालत में है नहीं और एनडीए में सबसे बड़े दल के संसदीय मुखिया के तौर पर आडवाणी की स्थिति लगभग वही होगी जो संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की होती है। लाल कृष्ण आडवाणी का राजनैतिक सूर्यास्त रोकने के लिए पार्टी के संविधान में संसोधन कर के यह नया पद रचा जा रहा है। नए संसदीय बोर्ड में अरुण जेटली और सुषमा स्वराज उपाध्यक्ष रहेंगे और आडवाणी के प्रति अपने संसदीय कर्तव्यों के मामले में जवाबदेह होंगे। पार्टी में नितिन गडकरी अपनी कितनी चला पाते हैं यह इस बात पर निर्भर करता है कि आडवाणी मंडली उन्हें कितनी आसानी से काम करने देती है। संघ परिवार ने लोकसभा में प्रतिपक्ष के उप नेता के तौर पर महाराष्ट्र के ही गोपीनाथ मुंडे का नाम प्रस्तावित कर दिया है और इससे भी जाहिर है कि मुंडे किसी भी हाल में सुषमा स्वराज को एक छत्र राज नहीं करने देंगे। संसदीय बोर्ड की पहली बैठक शनिवार को होने की उम्मीद है जिसमें नितिन गडकरी को भी बुलाया गया है। जाहिर है कि राजनाथ सिंह अब कुछ घंटो के पार्टी अध्यक्ष रह गए हैं और प्रतिपक्ष का नेता बनने का जो एक सपना उनके मन में जागा था वह सपना ही रह गया है। संघ ने आडवाणी की विदाई के रोडमैप पर पहले ही मुहर लगा दी थी। 19 दिसंबर को बीजेपी के संसदीय बोर्ड की भी बैठक होनी है, और कहा था नितिन गडकरी को पार्टी का अगला अध्यक्ष घोषित किया जा सकता है। डेटलाइन इंडिया ने ही सबसे पहले बीजेपी में होने वाले इस बदलाव की जानकारी दी थी।इससे पहले लोकसभा का सत्र खत्म होने के साथ बीजेपी में इस बदलाव के होने की संभावना जताई जा रही थी। मगर जिस अंदाज में शुक्रवार को बीजेपी संसदीय दल की बैठक बुलाई गई है, उससे इस बात के पक्के संकेत मिल रहे हैं कि आडवाणी अपनी पारी को सम्मानजनक तरीके से विदाई की राह पर ले जा सकते हैं।आडवाणी की विदाई की स्थिति में सुषमा स्वराज का नेता विपक्ष बनना तय है। उधर 19 दिसंबर को बीजेपी के संसदीय बोर्ड की भी बैठक होनी है। सूत्रों के मुताबिक इसमें संगठन स्तर पर पार्टी में होने जा रहे सबसे बड़े बदलाव को मंजूरी दे दी जाएगी। महाराष्ट्र बीजेपी के अध्यक्ष और संघ की खास पसंद नितिन गडकरी राजनाथ के बाद बीजेपी अध्यक्ष की कुर्सी संभालेंगे।आरएसएस का रोडमैप पूरा होने को है। बीजेपी में आरएसएस के दिखाए रास्ते के मुताबिक बड़े बदलाव की तैयारी पूरी हो चुकी है। ये माना जा रहा है कि बीजेपी में नेतृत्व की नई सुबह अब चौखट पर खड़ी है। संगठन सर्वोपरि है लेकिन संगठन संगठित नहीं है। बीजेपी का ये दर्द उसके मुखपत्र कमल संदेश में साफ झलक आया है। अध्यक्ष की तलाश में लगी बीजेपी के इस मुखपत्र में सवाल उठाया गया है कि क्या पार्टी नेतृत्व को मालूम नहीं कि आज हमारी ये दशा क्यूं है?संघ प्रमुख पिछले दो दिनों से दिल्ली में थे। हाल फिलहाल में उनकी दिल्ली यात्रा कुछ ज्यादा ही हो रही है। संघ वजह चाहे जो भी गिनाए इतना साफ है कि मोहन भागवत बीजेपी का नया अध्यक्ष तलाशने में जुटे हैं। इसी वक्त बीजेपी के मुखपत्र में आए संपादकीय ने भी ये साफ कर दिया है कि समय आ गया है अब एक निर्णायक कदम उठाया जाए क्योंकि संगठन सर्वोपरि है।कमल संदेश में दो टूक कहा गया है कि आखिर पार्टी कार्यकर्ताओं को क्या जवाब देगी कि क्या चल रहा है पार्टी में? मुखपत्र में लिखा है कि बिना अनुशासन और एकता के हम कहां रहेंगे? आखिर क्या बीजेपी नेतृत्व हार के कारणों को नहीं जानता। क्या कर्नाटक में जो कुछ हुआ वो अनुशासित पार्टी का हिस्सा है? कदापि नहीं। आगे लिखा है कि दोषारोपण से काम नहीं चलेगा। नेतृत्व ये समझे कि आखिर हमारी ये दशा क्यूं है।इन सब सवालों का एक ही जवाब है। पार्टी को एक सक्षम नेतृत्व की जरूरत है। मोहन भागवत पहले ही कह चुके हैं कि प्रक्रिया चल रही है नतीजे जल्द सामने होंगे। उन्होंने दो टूक कह दिया है कि दिल्ली में बैठे चार नेता अरुण जेटली, वेंकैया नायडु, सुषमा स्वराज और अनंत कुमार में से कोई अध्यक्ष नहीं होगा।संघ प्रमुख का ये बयान यूं ही नहीं है। इससे पहले किसी संघ प्रमुख ने ऐसा नहीं कहा तो फिर ये बयान क्यूं। इसलिए क्योंकि बीजेपी संकट के दौर से गुजर रही है और संघ अपने संगठन को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है। तो आखिरकार कौन होगा अगला नेता? सूत्रों की मानें तो ये सहमति बनाई जा रही है कि संगठन को बचाने की खातिर किसी मजबूत नेता की जरूरत है। क्या वो नरेंद्र मोदी होंगे?पक्के स्वयंसेवक और पार्टी के हिंदू हृदय सम्राट मोदी सरकार चलाने में तारीफ बटोर चुके हैं। संगठन में काम कर चुके हैं। माना जाता है कि उनके अध्यक्ष बनने से गुटबाजी खत्म हो जाएगी। रही बात गोधरा की तो संघ के लिए वो पहले भी मुद्दा नहीं रहा है। इस बीच महाराष्ट्र बीजेपी के अध्यक्ष नितिन गडकरी ने आज संगठन महामंत्री रामलाल से मुलाकात की। उनका नाम भी चर्चा में है।मगर गडकरी ब्राह्मण हैं। राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली भी ब्राह्मण हैं। नेता विपक्ष पद की उत्तराधिकारी मानी जा रही सुषमा स्वराज भी ब्राह्मण हैं। नितिन गडकरी का नाम तो चल रहा है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर कभी उन्होंने काम नहीं किया। सरकार में काम करने का अनुभव नहीं है। महाराष्ट्र का चुनाव अभी-अभी हारे हैं। फिर भी पार्टी को संघ के कहने पर और उनके राजनैतिक अतीत के आधार पर उनसे काफी उम्मीद है
 
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