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अस्तित्व को ले कर कई सवाल

 आलोक तोमर 

न्यूयार्क में रहने वाले इरफान अक्सर फोन करते रहते हैं। वे हिंदी पढ़ते हैं और आज सुबह उन्होंने पिछली बार लिखे गए उस लेख पर लंबी बहस की जिसमें मैंने अपनी सीमित बुद्वि से धर्म निरपेक्षता को नए सिरे से समझने की बात कही थी। इरफान की तरह और भी लोग मेरे लेख के सार और शैली से असहमत नजर आए और खास तौर पर धारा 370 और राम मंदिर वाले मुद्दे पर उनके अपने तर्क थे। मुस्लिम पर्सनल लॉ के बारे में भी उन्होंने सफाईयां दी और कहा कि यह एक कबीलाई कानून हैं मगर इसमें भी चार शादियां करने की अनुमति के पीछे शर्ते लगी हुई है। फिर भी मुद्दे की बात यह है कि इस्लाम ने चार शादियां करने पर चाहे जितने नैतिक प्रतिबंध लगे हो, उनका इस्तेमाल करने के लिए लोग रास्ते खोज ही लेते हैं। सबसे पहले धारा 370 पर आइए। कहा जाता है कि यह एक विशेष परिस्थिति में लागू की गई धारा थी जिसमें कश्मीर को स्वायत्तता दी गई थी। लेकिन क्या ये विशेष परिस्थितिया अनंत काल तक लागू रहने वाली है? क्या कश्मीर तकनीकी रूप से भारत का एक ऐसा राज्य बना रहेगा जो अपने अस्तित्व की अवधारणा में भारत की एक राष्ट्र- राज्य की हैसियत से सार्वभौमिकता को चुनौती देता है? यह सही है कि हिमाचल प्रदेश में भी स्थानीय कानून है जिसके तहत बाहर के लोगों को जमीन खरीदने के लिए विशेष अनुमति लेनी पड़ती है। अभी मैने उत्तराखंड में थोड़ी सी जमीन खरीदी है और उसमें शर्त यह है कि कम से कम चार साल तक उस जमीन का मालिक बने रहने के बाद ही मुझे उत्तराखंडवासी माना जाएगा। नागालैंड में आदिवासियों की जमीन को सिर्फ आदिवासी खरीद सकते हैं। यह कानून छत्तीसगढ़ और झारखंड में भी है। गुवाहाटी से आगे जाए तो भारत के नागरिकों को भी एक इनर लाइन परमिट लेना पड़ता है। इस सब पर आपत्ति की जानी चाहिए। आपत्ति इस बात पर भी की जानी चाहिए कि दक्षिण भारत के ज्यादातर राज्य हिंदी को राष्ट्रभाषा मानने से इंकार करते हैं। उनके स्कूलों में भी हिंदी नहीं पढ़ाई जाती। और तो और अब अच्छी खासी हिंदी जानने वाले दक्षिण भारतीय सांसद संसद में तमिल, तेलगू, कन्नड़ और मलयालम बोलते हैें। शर्म के अनेक विषय है। मगर यह भारतीय होने की नहीं, भारत में विकसित एक छद्म राजनैतिक तंत्र से जुड़ी शर्त है। हम अपनी अंग्रेजों द्वारा दी गई डेढ़ सौ साल पुरानी आचार संहिता नहीं बदल सकते। रुचिका जैसे मामले होते हैं तो कुछ धाराएं बदलने की बात शुरू हो जाती हैं। हमें अपने संविधान और विधान में परिवर्तन करने के लिए भी किसी न किसी हादसे की जरूरत होती है। बाबरी मस्जिद- राम मंदिर वाले मुद्दे पर दोस्तों का कहना है कि छह साल पुरानी किसी घटना को फिर से जिंदा करना धर्म निरपेक्ष और लोकतांत्रिक देश की छवि पर आघात करना है। सही है कि बाबरी मस्जिद गिरी तो बहुत सारे दंगे हुए और मानवाधिकारों से ले कर धर्म निरपेक्षता के सवाल हम नंगे हुए। लेकिन अगर इसी आधार पर कहा जाए तो तीन सौ साल पुरानी ईस्ट इंडिया कंपनी को वापस बुला कर दिल्ली के कनॉट प्लेस में उसका ऑफिस खुलवा देना चाहिए। इस्लाम इतना छोटा नहीं हैं कि फैजाबाद जिले में एक खंडहर के तौर पर बाबरी मस्जिद के गिरने से उसकी महानता में कोई दरार आ जाए। पहले भी कहा था और फिर कह रहा हूं कि राम का मंदिर अगर अयोध्या में नहीं बनेगा तो कहां बनेगा? राम के होने के कोई ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं होने का हलफनामा सरकार दे भी चुकी है और वापस ले भी चुकी है। इस हिसाब से देखा जाए तो ईसा मसीह का भी प्रमाणिक जीवन वृतांत मौजूद नहीं हैं और अब इस बात के बहुत सारे साक्ष्य मिल रहे हैं कि ईसा कई वर्षों तक भारत में रह कर वेदों का अध्ययन करते रहे थे। अगर सलीब पर ईसा की मौत हुई थी तो उनकी कब्र का पता कोई मुझे बाता दे। ऐसे तर्कों और कुतर्कों का कोई अंत नहीं है। अमृत्यसेन कहते हैं कि धर्म और के निजी मामला होने और उसके राजनैतिक घटना होने के बीच जमीन आसमान का अंतर हैं। आखिर मोहम्मद अली जिन्ना बाकयदा धर्म निरपेक्ष थे, पांच वक्त नमाज नहीं पढ़ते थे, शराब और सिगरेट पीते थे लेकिन इस्लामी गणतंत्र पाकिस्तान के कायदे आजम वही है। दूसरी तरफ महात्मा गांधी राजनैतिक और समाजिक कर्मों में धर्म निरपेक्ष थे और वे प्रार्थना सभाओं में भजन गाते थे और उनके अंतिम शब्द भी हे राम ही थे। दिक्कत वहां पैदा होती है जहां धर्म निरपेक्षता और सांप्रदायिकता की परिभाषा गढ़ते समय इसे मूल रूप से हिंदू-मुस्लिम का सवाल बना दिया जाता है। एक तो यह कि भारत में इस्लामी गणतंत्र पाकिस्तान से ज्यादा मुसलमान रहते हैं और जब हम यह कहते हैं कि भारत के तीन राष्ट्रपति मुसलमान रह चुके हैं तो यह कोई एहसान करने की बात नहीं है। फखरुदीन अली अहमद, डॉक्टर जाकिर हुसैन और एपीजे अब्दुल कलाम के अपने निजी गुण भी कम नहीं है। इस्लाम को लोकतांत्रिक मान्यता तो असल में उस दिन मानी जाएगी जिस दिन देश के प्रधानमंत्री पद पर कोई मुस्लिम बैठेगा। मनमोहन सिंह को अल्पसंख्यक कहने वाले भूल करते हैं। सिख संप्रदाय और धर्म असल में हिंदू धर्म से ही निकला हुआ है और उनकी गुरुबानी में हिंदू देवी देवताओं की आराधना की जाती है। सिख सबसे बहादूर भारतीय समाजों में से एक है मगर मनमोहन सिंह सिख धर्म का प्रतिनिधित्व नहीं करते। वे एक बंधक प्रधानमंत्री थे, हैं और रहेंगे। धर्म निरपेक्षता के शाब्दिक अर्थ को भी बदलना पड़ेगा। हमें धर्म सापेक्ष होना पड़ेगा क्योंकि धर्म ही है जो हमे और हमारे समाज को समाजिक संज्ञाओं में, भौगोलिक सीमाओं के विपरीत बांध कर रखता है। अगर समाज को बदलना है तो भी उसका सबसे बड़ा अस्त्र धर्म ही हो सकता है और इस बात को महात्मा गांधी ने अच्छी तरह पहचान लिया था। धर्म सापेक्षता का अर्थ यह कतई नहीं हैं कि हम दूसरे धर्मों को और उनकी निरंतरता को किनारे लगा दे और अपनी मान्यताएं उन पर थोपे। तलवार के जरिए धर्म के प्रचार का और विस्तार का जमाना कब का खत्म हो गया। जो लोग धर्म के नाम पर जेहाद की बाते करते हैं उनका भविष्य भी  किसी न किसी कब्र में छिपा हुआ है। यह कब्र इतिहास की होगी या उनकी देह की, यह कोई नहीं जानता
 
 
 
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