राजकुमार सोनी
भजिया-जलेबी बेचने वाली दुकानों से लेकर गमलों में कैक्टस उगाने वाले घरों तक में किसी न किसी नेता की तस्वीर जरूर लगी रहती है। यदि नेता न भी हुआ तो अभिताभ या धर्मेंद के साथ प्रसन्नचित मुद्रा में वह शख्स जरूर खड़ा हुआ मिल जाएगा जिसने लोगों से ज्यादा खुद के मनोरंजन के लिए जयस्तंभ चौक या टाउन हाल में कार्यक्रम करवाया था। झूठी उपलब्धियों के चमकदार इश्तहार के मार्फत खुद की बोली लगा देने के लिए तैयार खड़े बाजार के खतरनाक दौर में एक शख्स ऐसा भी है जो पुरस्कारों को आलमारी में बंद करके रखता है। देश के अनेक लब्ध प्रतिष्ठित पुरस्कारों को तहखाने में छिपाने का अर्थ यह नहीं है वे सारे के सारे सोने और चांदी से निर्मित है और उनके चोरी चले जाने से दुनिया बरबाद हो जाएंगी। दरअसल पुरस्कार को हासिल करने वाले शख्स का यह मानना है कि पुरस्कार से कभी कोई बड़ा नहीं होता। पुरस्कार न जवाबदेही करते हैं और न ही उसके मिल जाने से समाज के एक बड़े वर्ग को फायदा पहुंचता है। बात साहित्य की दुनिया के सबसे चमकते नक्षत्र विनोद कुमार शुक्ल की हो रही है। नौकर की कमीज, खिलेगा तो देखेंगे, दीवार में खिड़की रहती थी, लगभग जयहिन्द, सब कुछ होना बचा रहेगा, अतिरिक्त नहीं, आकाश धरती को खटखटाता रहता है, सब कुछ होना बचा रहेगा, महाविद्यालय, पेड़ पर कमरा, कविता से लंबी कविता और वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहनकर चला गया विचार की तरह जैसी श्रेष्ठ कृतियों के रचयिता श्री शुक्ल पर आज दुनिया भर के साहित्य के विद्यार्थी पीएचडी कर रहे हैं। कोई पीएचडी नहीं भी कर रहा है तो भारतीय प्रशासनिक सेवा का अफसर बनने के लिए उनके साथ वक्त व्यतीत करता है।
सबकी जिज्ञासा का एक ही विषय होता है कि श्री शुक्ल सरल होते हुए भी एक रचना को कालजयी कैसे बना देते हैं? न वे प्रलेस(प्रगतिशील लेखक संघ) में है और न जलेस में,न उन्हें जसम वालों ने सदस्य बनाया है फिर बगैर किसी गिरोह के उनकी रचनाएं पढ़ी क्यों जा रही है? कांग्रेस की तरह ही साहित्य के कई धड़ों में विभक्त छत्तीसगढ़ के प्रेमचंदों, तोपचंदों और धर्मवीरों के लिए भी यह शोध का विषय हो सकता है कि शैलेंद्र नगर के एक छोटे से घर में मोहल्ले के बच्चों और चंपा के पेड़ से बतियाते हुए एक लेखक किस तरह से महान रचनाएं लिख लेता है। शिखर सम्मान, मैथलीशरण गुप्त सम्मान, पंड़ित सुंदरलाल शर्मा सम्मान और साहित्य अकादमी के सबसे बड़े पुरस्कार से नवाजे जाने वाले श्री शुक्ल की हर रचना किसी न किसी भाषा में अनुवादित हो चुकी है लेकिन उनके दो उपन्यास नौकर की कमीज और दीवार में खिड़की रहती थी का विश्व की हर भाषा में अनुवाद हो चुका है। उनके उपन्यास नौकर की कमीज और कहानी बोझ पर देश के प्रसिद्ध निर्देशक मणिकौल ने फिल्म बनाई है। यह बात बहुत कम लोगों को मालूम है कि 1 जनवरी 1937 को राजनांदगांव में जन्मे श्री शुक्ल को गजानन माधव मुक्तिबोध से बहुत कुछ सीखने को मिला। श्री शुक्ल ने वैसे तो कृषि विज्ञान में एमएससी की है उन्होंने मीडिया के काम को अच्छा मानते हुए पत्रकारिता में भी अपनी पढ़ाई पूरी की। शासकीय सेवा में रहने के दौरान भी श्री शुक्ल सुबह चार बजे उठकर प्राणायाम कर लिया करते थे। यह काम अब भी जारी है लेकिन उनका वे अपना व्यायाम बगैर टीवी देखे करते हैं। कुछ देर टहलने के बाद उनकी रचना प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
श्री शुक्ल उन लेखकों में से नहीं है जो जमीन पर लिखने का ढोंग करते हुए हवा में उड़ते हैं। उन्हें खुद को पवित्र बताने के लिए कभी पाखंड करने की जरूरत शायद नहीं हुई है। श्री शुक्ल ने अब जाकर एक कार खरीदी है वह भी इसलिए क्योंकि उन्हें बहुत बाद में जाकर यह लगा कि वे कभी इक्कठे अपने परिवार के साथ नहीं घूम पाएं हैं। अन्यथा 65 साल की आयु तक श्री शुक्ल सायकिल चलाते हुए अपने पुत्र शाश्वत के साथ गांवों की सैर के लिए निकल जाया करते थे। खेतों के पास ही खड़े होकर ही पिता ने पुत्र को कई बार समझाया-चिड़ियों के संगीत का मतलब क्या होता है और उसमें कितना दम होता है। इस कालम का लेखक भी एक बार उनसे साक्षात्कार के लिए उनके घर जा पहुंचा था। घर के पास लगे चंपा के पेड़ और पेड़ों से फूलों के टूट जाने का कारण बताते हुए श्री शुक्ल ने बताया था कि उनके घर के ठीक बगल में युवाओं के कसरत करने का ठिकाना खुल गया है। सुबह-शाम कानफोंडू संगीत बजता है और फूल कष्ट में दुनिया को छोड़ देते हैं। श्री शुक्ल को सुनना सबको अच्छा लगता है। याद पड़ता है कि एक कार्यक्रम में उन्होंने जादूगर ओपी शर्मा की मौजूदगी के बावजूद सिर्फ इतना कहा था कि कितना अच्छा होता यदि जादूगर उन्हें गायब कर देता। कुमार गंधर्व, भीमसेन जोशी, मल्लिका अर्जुन मंसूर का संगीत और भोजन गरम चावल-दाल चने की सब्जी पंसद करने वाले श्री शुक्ल जब लिखने बैठते हैं तो मोहल्ले का कोई न कोई बच्चा उनकी पीठ पर लदा जरूर रहता है। जरा सी चिल्ल-पौ पर बच्चों की क्लास लगाने वाले अभिभावकों को यह जानकार आश्चर्य होगा कि श्री शुक्ल ने तमाम बड़ी रचनाएं बच्चों के साथ हंसते-खेलते हुए लिखी है। श्री शुक्ल की रचना के सबसे पहले पाठक उनके परिजन ही है। जब नौकर की कमीज लिखी जा रही थी तब शाश्वत(पुत्र) का जन्म नहीं हुआ था लेकिन उनकी इस रचना को उनकी पुत्री विचारदर्शिनी ने जरूर सुना था। अपने पिता को श्री शाश्वत दादा कहते हैं। वे कहते हैं कि मेरे दादा बेहद अनुशासित है। हम सब बड़े हो चुके हैं लेकिन वे अब भी हमारे काम को आधा कैसे कर दें इस जुगत में लगे रहते हैं।