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प्रतिरोध की जरूरत-सईद मिर्जा

 एसके सिंह  

गोरखपुर,  फरवरी । समाज में हाशिए के लोगों और उनके जीवन संघर्षों को समोधित गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल का शुभांरभ गुरूवार को यहां ाड़े ही जोशोखरोश के साथ शुरू हो गया । फिल्म समारोह का उद्घाटन  जाने माने फिल्मकार सईद मिर्जा ने किया । इस अवसर पर उनकी दो फिल्मों सलीम लगड़े पे मत रो और अलवर्ट पिन्टो को गुस्सा क्यों आता है प्रदर्शित की गर्इं । सात फरवरी तक चलने वाले इस फिल्मोत्सव के दौरान 5 फ ीचर फिल्में , 6 डाक्यूमेंटरी ओर 3 एनीमेशन फिल्में दिखाई जाएंगी । फिल्मोत्सव के उद्घाटन अवसर पर दास्तानगोई का प्रदर्शन आकर्षण का केन्द्र बना  रहा । 
 उद्घाटन अवसर पर मिर्जा ने कहा पूंजीवादी वैश्वीकरण के इस दौर में चौतरफा प्रतिरोध की बेहद जरूरत है ,प्रतिरोध का शब्द  मुझे बहुत  पसंद है । उनका कहना था जो लोकतंत्र आज हमारे सामने है, वह जनता का तंत्र नहीं है । इस लोकतंत्र का पूंजीवाद, स्टाक मार्केट और नेस्ले-कोकाकोला जैसी बहुराष्ट्रीय  कंपनियों के साथ गहरा रिश्ता है । यह तंत्र आम आदमी की आकांक्षाओं,खुशियों और हक अधिकार की आवाज को कुचलने वाला तंत्र है । ऐसे दौर में जनता के दर्द और उम्मीद को अभिव्यक्ति देना भी प्रतिरोध है । कभी न्यू वो सिनेमा ने भी यह काम किया लेकिन 1990 के बाद उदारीकरण  के दौर में इस तरह के सिनेमा बनने कम हो गए और फिल्म  सोसाइटियां भी खत्म हो गई । इस तरह के सिनेमा के निर्माण में जो मदद मिलती थी, उसे भी सत्ता ने जानबूझ  खत्म किया। ऐसी स्थिति में जनसंस्कृति मंच द्वारा जनता के सहयोग से गंभीर और जनपक्षधर फिल्मों   के दर्शकों को संगठित करने और इस तरह के फिल्मों के निर्माण का माहौल ानाना काफी उम्मीद जगाता है।
अलवर्ट पिंटों को गुस्सा क्यों आता है,मोहन जोशी हाजिर हों, सलीम लगड़े पे मत रो और नसीम जैसी चर्चित फिल्में और नुक्कड़,सरकस,ए ट्रिस्ट विथ द पिपुल आफ इंडिया जैसे वृत्तचित्र और धारावाहिक बनाने  वाले सईद मिर्जा ने कहा इस देश में कारपोरेट की मदद से भी फिल्म फेस्टिवल  होते हैं ,पर वे वहां नहीं जाते।
उदघाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण ने कहा कि 1990 के बाद  वैश्वीकरण के जरिए जो आर्थिक राजनीतिक व्यवस्था   
बनी ,उसने सिर्फ न्यू वो सिनेमा को ही हाशिए पर डाला,बल्कि  ट्रेड यूनियन आंदोलन,किसान आंदोलन,समाज से मूल्यों की दुनिया,नौजवानों के दिलसों में मौजूद आदर्शों की दुनिया को भी हाशिए पर डाला । इतने बड़े  मध्य वर्ग के भीतर गरीबों  के प्रति करूणा होनी चाहिए थी ,वह भी हाशिए पर गई ।  
फिल्मोत्सव क दूसरे दिन की शुरूआत महान फिल्मकार ऋत्विक घटक की क्लासिक फिल्म  मेघे ढाका तारा से हुई । यह फिल्म एक स्त्री के अपने पारिवारिक  संबंधों  के प्रति फर्ज और वेयक्तिक स्ज्ञतर पर प्रेम की स्वाभाविक मानवीय आकांक्षाओं के बीच  तीखे द्वंद्व की एक त्रासद दास्तान है । परंपरागत पारिवारिक मूल्य जिसमें सेवा ,कुर्बानी  को स्त्रियों के लिए श्रेष्ठता का पैमाना बना  दिया जाता है और जहां उनकी ोहद आंतरिक-प्रकृतिक आकांक्षाा को कुचल दिया जाता है, उस रिवाज को यह फिल्म चुनौती देती है। शुक्रवार  को दर्शकों को एट माइ डोर स्टेप और आई वंडर नामक दो डाक्यूमेंटरी दिखाई गई । निष्ठा जैन द्वारा निर्देशित एट माइ डोर स्टेप  महानगरों के मध्यमवर्गीय-उच्चवर्गीय लोगों के दरवाजे पर रोज दस्तक देने वाले मेहनतकशों यानी कूड़ा उठाने वाले ,घरेलू काम करने वाले,कूरियर- गार्ड आदि का काम करने वालों की जिंदगी को दर्शाता है।
 निरूपमा श्री निवासन निर्देशित डाकयूमेंटरी आई वंडर राजस्थान, सिक्किम ,और तमिलनाडु के ग्रामीण बच्चों  की यात्रा और उनके रोजमर्रा के अनुभवों के बीच  से दर्शकों को गुजारते हुए शिक्षा की विसंगतियों पर गंभीरता से सोचने के लिए प्रेरित करती है ।बच्चों के लिए बेहतर  शिक्षा किस तरह की होनी चाहिए ,इसकी इस डाक्यूमेंटरी से एक दिशा मिलती है । दूसरे दिन प्रदर्शित आखिरी फिल्म नसीम थी जिसका निर्देशन सईद मिर्जा ने किया है । यह फिल्म आजादी के पहले और बाद  के मुस्लिम समाज की त्रासदियों का  ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह है ।बाबरी ध्वंस  के जरिए जिस सेकुलर ढांचे को गहरा नुकसान पहुंचाया गया, उसने मुस्लिम मन पर क्या असर डाला उसकी यह दास्तान है।
गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के संयोजक मनोज कुमार सिंह ने ाताया फिल्मोत्सव में इस बार  चित्तो प्रसाद,जैनुल आोदिन,सोमनाथ के चित्रों की प्रदर्शनी भी लगाई गई है ,जिसे अशोक भौमिक और अनुपम ने क्यूरेट किया है । सिंह ने बताया  फिल्म समीक्षक- आलोचक जारी मल्ल पारख के आलेख आम आदमी का सिनेमा बनाम  सिनेमा का आम आदमी का पाठ भी उत्सव का एक आकर्षण था । पाठ संजीव कुमार ने किया ।
 
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