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चिदंबरम के ‘लड़के’

 एमजे अकबर

विवाद से निपटने का सबसे अच्छा तरीका है उसे पैदा करना। उमर अब्दुल्ला जब कह रहे थे कि नियंत्रण रेखा के पार चले गए ‘लड़कों’ के लौटने का स्वागत किया जा सकता है, तो वह किसी भीतरी इलहाम या दिव्यज्ञान की वजह से नहीं कह रहे थे।
यह पक्के तौर पर भारत-पाकिस्तान के बीच चल रही सौदेबाजी का एक हिस्सा था। गुलाम नबी आजाद ने इसका जिस तरह जवाब दिया, उसने विपक्ष की भूमिका छीन ली। हो सकता है आजाद की चिंताएं बिल्कुल जायज हों। अलबत्ता जब केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने उमर अब्दुल्ला का समर्थन किया तो साफ हो गया कि दोनों में बातचीत के बाद उमर ने यह नाजुक मामला छेड़ा है।
हम सब जानते हैं चिदंबरम बहुत अच्छे वकील हैं। वकील का हुनर इस बात पर टिका होता है कि तथ्य लचीले होते हैं और तर्क अचूक। यह मानवीय बौद्धिकता को सलामी है क्योंकि इससे दिमाग निर्णायक की भूमिका में आ जाता है। अफसोस, हरेक चतुराई की काट भी तुरंत सामने आ जाती है। चिदंबरम ने एक सीधा-सादा तर्क यह भी दिया कि चूंकि ये ‘लड़के’ (अब उन्हें ‘आतंकवादी’ तो कह नहीं सकते, कह सकते हैं क्या?) उस क्षेत्र में चले गए थे जिसे भारत अपना मानता है, अत: वे भारतीय धरती छोड़कर कभी गए ही नहीं। अब उन्हें केवल नए पते पर बसाया जा रहा है।
विपक्ष के सलाहकार इस तर्क का जवाब एक संभावित चुनौती से दे सकते थे : गृह मंत्री देश के खिलाफ जंग छेड़ने के लिए भाग जाने वालों की वापसी के लिए इतने चिंतित क्यों हैं, जबकि वे कश्मीरी पंडित जैसे लोगों को तो बसा नहीं पा रहे हैं जिन्हें उग्रवादियों ने बाहर निकाल दिया था? चिदंबरम के ‘लड़के’ पाक के कब्जे वाले कश्मीर में यह सोचकर नहीं गए थे कि वे भारतीय धरती के ही दूसरे हिस्से में जा रहे हैं।
वे जंग छेड़ने गए थे, जिससे कि कश्मीर को भारत से छीन सकें। वे या तो स्वतंत्रता का सपना देखते थे या पाकिस्तान में विलय का। शायद हमारे गृह मंत्री मानते हैं कि लड़के तो लड़के ही होते हैं। ज्यादा रहस्यमयी सवाल यह है कि ‘लड़के’ आखिर लौटना क्यों चाहते हैं। क्या इसलिए कि विचारधारा से उनका मोहभंग हो गया है और अब वे भारतीय धर्मनिरपेक्षता के झंडाबरदार बन गए हैं? या वे अपने परिवारों से मिलना और उनके साथ रहना चाहते हैं? सवाल यह भी है कि क्या ‘कश्मीर जिहाद’ में अब भी भरोसा करने वाले पाक स्थित आतंकी गुटों व एजेंसियों ने इन ‘लड़कों’ को त्याग दिया है? या उनमें से कुछ भारतीय कश्मीर में लौटकर फिर विद्रोही गतिविधियां शुरू कर देंगे? अगर ऐसा है तो क्या भारत को यह जोखिम लेना चाहिए? जिन लड़कों की वापसी प्रस्तावित है, उनकी प्रामाणिकता और पहचान का जिम्मा किसने लिया? वे जब जंग की तैयारी के लिए गए थे, तब श्रीनगर में इटेंलिजेंस ब्यूरो के पास अपना नाम और पता छोड़कर नहीं गए थे।
कोई विशेष आनुवांशिक सूत्र भी नहीं है जिससे नियंत्रण रेखा के दोनों तरफ के कश्मीरियों को अलग-अलग पहचाना जा सके। पाक सरकार उन्हें सीधे नियंत्रित नहीं करती। उनकी जिम्मेदारी जमात-ए-इस्लामी और लश्कर-ए-तैयबा के हवाले है। अगर कोई जानता है कि कौन-से लड़ाके सीमा पार से हैं और कौन-से स्थानीय, तो वह जमात या लश्कर है। क्या दिल्ली इन संगठनों के प्रमाणपत्र मानेगी?
फिर भारत-पाक बातचीत की रूपरेखा में लड़कों की वापसी का मुद्दा किसने रखा? दिल्ली ने या इस्लामाबाद ने? अगर यह बातचीत के एजेंडे में नहीं था या रखा जाने वाला है, तो केंद्र सरकार ने इसे बहस के लिए सार्वजनिक क्यों किया? दोनों देशों के बीच बातचीत बेहतर वक्त में भी विस्फोटक सुरंगों का मुहाना होती है। ऐसे में यह समझ पाना मुश्किल है कि बातचीत शुरू होने के ठीक पहले नई सुरंगें क्यों खोदी जा रही हैं।
2010 की बातचीत को लेकर विशेष उत्साह है। डॉ मनमोहन सिंह साफ कह चुके हैं कि पाकिस्तान के साथ शांति उनके दूसरे कार्यकाल का मुख्य लक्ष्य है। कहावत है कि नर्क की राह अच्छे इरादों से बनाई जाती है; स्वर्ग की राह तो खैर बुरे इरादों से नहीं ही बनाई जा सकती। अच्छे इरादे आपको चौराहे तक ले जाते हैं। उसके बाद आप स्वर्ग की राह चुनते हैं या नर्क की, यह पूरी तरह आपके फैसले पर निर्भर करता है। डॉ सिंह के नेक इरादों पर कोई शक नहीं, लेकिन कहीं वह स्वर्ग की जल्दबाजी में गलियों में न मुड़ जाएं। शर्म-अल-शेख ऐसा ही एक भटकाव था, जिससे इस्लामाबाद के भारत-निंदकों के अलावा किसी को मदद नहीं मिली। ‘चिदंबरम के लड़के’ ऐसा ही एक और भटकाव हो सकता है, जिससे दिल्ली के पाकिस्तान-निंदकों के अलावा किसी को मदद नहीं मिलेगी।
 
 
लेखक पाक्षिक पत्रिका ‘कोवर्ट’ के चेयरमैन हैं।
 
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