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पवार का राजनीतिक कद

 शेखर गुप्ता

मिसाल के लिए, 1992 में बाबरी-ध्वंस के फलस्वरूप हुए दंगों के बाद वे अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा को त्यागकर मुख्यमंत्री के रूप में महाराष्ट्र लौट गए थे। हमारे वक्त के लिहाज से यह देशभक्ति और राजनीतिक विशाल हृदयता का बड़ा उदाहरण था। 1993 के सीरियल बम धमाकों के बाद उन्होंने बंबई को बदले की भावना से मुक्त और एकजुट रखा, यह उनकी कामयाबी की बेहतरीन निशानी थी। यही कारण है कि उन्हें जानने वाले उनकी आज की स्थिति देखकर निराशा महसूस करेंगे।
शरद पवार का राजनीतिक कद या प्रतिभा देखनी हो, तो पुणो एयरपोर्ट से कुछ घंटों का मनोरम रास्ता पार करके बारामती आइए। जो पहले बंजर और सूखा पठार हुआ करता था, अब हरित क्रांति का प्रदेश बन गया है। इसे विकसित करने के पीछे मेधावी राजनीतिक दिमाग सक्रिय रहा है, चरण सिंह जैसा महज कुलक नेता नहीं। यहां बहुतायत में कृषि-उद्योग, टेक्निकल कॉलेज, स्कूल हैं। बसों में भी कंप्यूटर लगे हैं और वे मोबाइल क्लासरूम का काम करती हैं। यह देश का सच्च फील-गुड इलाका है। समझने में देर नहीं लगती कि इस सबके पीछे कौन है। सड़क किनारे किसी से भी पूछिए कि बारामती का चेहरा 
किसने बदला, तो कट्टर भाजपा या शिवसेना समर्थक भी कहेगा कि शरद पवार ने।
वह अपनी पीढ़ी के बहुत से अन्य क्षत्रपों की तरह केवल क्षेत्रीय नेता नहीं हैं। उनके पास हमेशा व्यापक विजन और सच्ची राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा रही है। चार दशक लंबे राजनीतिक जीवन में ऐसे मौके आए, जब उन्हें लगा कि वह प्रधानमंत्री बनने के करीब हैं। 1991 में नरसिंह राव को दी गई दुर्भाग्यपूर्ण चुनौती को कई लोग छलावा भी मान सकते हैं। सच्चई यह है कि 1991 के बाद केंद्र के किसी भी सत्ता समीकरण में वह अहम किरदार रहे हैं।
एक साल के भीतर आखिर क्या गड़बड़ी हो गई? प्रतिद्वंद्वी तक जिस शख्स का रौब और प्रतिष्ठा मानते थे, गठबंधन के साझीदार ही आज उसका मजाक क्यों उड़ा रहे हैं? उन्हें मू्ल्य वृद्धि के लिए दोषी ठहराया गया, चीजों के दाम को लेकर उनके बयानों का उपहास किया गया, अब ठाकरे से मुलाकात के लिए उन्हें कोसा जा रहा है। बेशक पवार के अपने कारण रहे होंगे, पर इस दलील की काट नहीं कि यह गलत समय पर गलत मुलाकात थी और इससे गठबंधन में उनकी लगातार घटती हैसियत बहाल करने में मदद नहीं मिलेगी। उस गठबंधन में, जिसमें एक समय उन्हें केंद्रीय स्तंभ माना जाता था, पर अब कृषि मंत्रालय में जूनियर मंत्री तक उनके प्रभाव का अतिक्रमण करने में संकोच नहीं करते।
2004 की गर्मियों में जब उन्होंने कृषि मंत्रालय का काम संभाला, तब कितनी अपेक्षाएं उनसे की गई थीं। वह किसान हैं और आधुनिक हैं। वह राजनीतिक पुल निर्माता हैं, जो कृषि क्षेत्र के सुधारों पर अलग-अलग विचार समूहों को राजी करके सर्वानुमति ला सकते थे। छह साल बाद उनका रिपोर्ट कार्ड क्या कहता है? आलोचक कहेंगे कि उनका काम इसलिए खराब रहा क्योंकि उनका सारा ध्यान क्रिकेट पर लगा रहा। जिस शख्स से हम उम्मीद कर रहे थे कि वह किसानों के लिए सुधार का संदेश लेकर प्रत्येक राज्य में जाएगा, इसके बजाय वह क्रिकेट की सुर्खियों में दिखाई दे रहा था।
पिछले साल उन्हें आईपीएल को दक्षिण अफ्रीका ले जाए जाने का बचाव करते देखा गया, जिसकी वजह से देश और खुद उनकी सरकार की तौहीन हुई। उनके समर्थक कहेंगे कि ठाकरे से उनकी मुलाकात का आईपीएल से कुछ लेना-देना नहीं था और वह उन नेताओं में से नहीं हैं, जो राजनीतिक छुआछूत में विश्वास करते हैं। लेकिन इस मुलाकात का वक्त और फैसला इस कदर गलत था कि इसकी तुलना केवल उस बल्लेबाज से की जा सकती है जिससे मैच को बचाने के लिए कुछ ओवर पिच पर टिकने की उम्मीद थी, लेकिन जो अंधाधुंध रिवर्स स्वीप लगाकर आउट हो गया।
पवार के लिए खेल फिलहाल खत्म हो गया लगता है। उनकी सरकार की सबसे बड़ी चुनौती कीमतों में बढ़ोतरी है। कृषि और खाद्य व नागरिक आपूर्ति मंत्री वह हैं, पर कीमत वृद्धि के खिलाफ लड़ाई प्रधानमंत्री को सीधे अपने हाथ में लेनी पड़ी। यह वैसा ही है जैसे शिवराज पाटील ने यूपीए के पहले कार्यकाल में आंतरिक सुरक्षा पर नियंत्रण खो दिया था। पर्यावरण मंत्री ने, जो कैबिनेट में दर्जे और राजनीतिक वरिष्ठता के लिहाज से उनसे बहुत नीचे हैं, उनकी विज्ञान समर्थक नीति को दरकिनार कर दिया। राष्ट्रीय राजनीति में अब उनकी आवाज का वैसा वजन नहीं रहा, जो हुआ करता था। इस तथ्य से पवार जैसा यथार्थवादी इनकार नहीं कर सकता। पिछले साल जब कैबिनेट ने मेघालय में खुद उनकी पार्टी की सरकार को बर्खास्त कर दिया था, तब वह खामोश बैठे रहने के सिवा कुछ नहीं कर सके। ये वो पवार नहीं हैं जिन्हें हम जानते हैं। ये वो पवार भी नहीं हैं जिन्हें बारामती और महाराष्ट्र ने इतनी उम्मीदों से दिल्ली भेजा था।
राष्ट्रीय राजनीति में पवार का रिकॉर्ड बताता है कि बड़े राजनीतिक मंच पर वह हमेशा गलतियां करते हैं और राज्य की राजनीति में प्रदर्शित अपने हुनर और रुतबे का लाभ नहीं उठा पाते। यह मंच का भय है, जैसे रणजी ट्रॉफी में रनों का अंबार लगाने वाला बल्लेबाज अंतरराष्ट्रीय मैचों में नाकाम हो जाता है। राजनीतिक तौर पर उन्होंने वक्त चुनने में गलतियां कीं, जैसा कि राजीव, राव और फिर सोनिया के खिलाफ विद्रोह के मामले में हुआ। आधे-अधूरे मन से प्रलोभन का शिकार हुए, जैसा कि 2009 के चुनाव अभियान के दौरान हुआ। महाराष्ट्र में सोनिया के साथ रैली को संबोधित करने के कुछ ही दिनों बाद वह उड़ीसा में लेफ्ट की अगुआई में तीसरे मोर्चे की रैली में शामिल होने का लोभ संवरण नहीं कर सके। उन्होंने चुनाव अभियान की हवा समझने में भूल की और तीसरे मोर्चे का दांव यह सोचकर खेला कि त्रिशंकु लोकसभा में वह व्यापक सहमति के उम्मीदवार बनकर उभर सकते हैं।
फरवरी 2008 में महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के बेटे अमित की शादी के भोज में पवार ने मुझे राज्य मंत्रिमंडल में अपनी पार्टी के कुछ मंत्रियों से मिलवाया। उनमें से कुछ बहुत युवा (तीस-चालीस के बीच) थे। उन्होंने बहुत गर्व से बताया कि उनकी पार्टी में काफी युवा नेता हैं। वह क्षण उनके नेतृत्व के गुण, उदारता और सफलता का गवाह था। उनकी मौजूदा राजनीतिक हालत देखकर इसलिए और भी हैरानी होती है। हो सकता है अपने राजनीतिक जीवन के बाद के कॅरियर विकल्प के तौर पर वह क्रिकेट को देख रहे हों, लेकिन वह जानते ही होंगे कि राजनीति के पराभव के साथ ही क्रिकेट पर भी पकड़ समाप्त हो जाएगी। क्रिकेट महत्वाकांक्षाओं से लबरेज बहुत सारे कांग्रेसी पहले ही लंबे समय से चाकुओं की धार तेज कर रहे हैं। 
शेखर गुप्ता लेखक द इंडियन एक्सप्रेस के एडिटर-इन-चीफ हैं।
 
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