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दस पर भारी दो महीने

 खुशवंत सिंह

उत्तर भारत में फरवरी और अक्टूबर ये दो सबसे सुहावने माह होते हैं। हालांकि दोनों की प्रकृति एक-दूसरे से बिल्कुल अलहदा होती है, लेकिन दोनों में कई बातें समान भी रहती हैं। फरवरी आते-आते ठंड का असर कम होता जाता है, कोहरा भी छंटने लगता है। 
हवा के हाड़ कंपाते ठंडे झोंके अतीत की बात बन जाते हैं, इसकी जगह तन को राहत देती शीतल बयार बहने लगती है। सिर के ऊपर आसमान में नीलिमा छा जाती है और सूरज की चमक भी बढ़ जाती है, अब वह कांपने के बजाय तमतमाने लगता है। इसके ठीक विपरीत अक्टूबर में होता है। मानसून बाद की तपन का एहसास धीरे-धीरे कम होता जाता है। मानसूनी बादलों के छंटने के बाद आसमान साफ हो जाता है, सूरज की गर्मी कम होती जाती है और चारों तरफ शरद ऋतु के आगमन के चिह्न् नजर आने लगते हैं। 
इन दो महीनों में और भी कई प्राकृतिक नजारे घटित होते हैं। आप किसी लॉन में लेट जाइए और आसमान की ओर नजरें टिका दीजिए। फरवरी माह में आपको हंसों या बतखों के झुंड उड़ते हुए दिख जाएंगे। वे एक साथ उड़ते हुए तीर के नोक का आकार बनाते हैं। ये पक्षी गर्मियों के अपने ठिकाने की तलाश में भारत से मध्य एशिया की ओर पलायन कर रहे होते हैं। 
अक्टूबर में भी आपको आसमान में ऐसे ही पक्षी अंग्रेजी के अक्षर ‘वी’ के आकार में झुंड में उड़ते हुए दिखाई देंगे। ये मध्य एशिया से भारत आते हैं और पूरी सर्दियां यहां की झीलों, नदियों और दलदली इलाकों में बिताते हैं। यदि आप भाग्यशाली हैं तो फरवरी माह में आपको अकेली कोयल कुहू कुहू की मीठी तान छेड़े आपके सिर के ऊपर आसमान में दिखाई दे जाएगी। 
वह मैदानों से पहाड़ी इलाकों में जा रही होती है। इसी प्रकार अक्टूबर में वह पहाड़ी इलाकों से मैदानों में चली आती है, ताकि वहां अपनी सर्दियां गुजार सके। अब तक कोई भी पक्के तौर पर यह नहीं जान पाया है कि आखिर इन पक्षियों को कैसे अपना रास्ता पता चल जाता है और हर साल कैसे ये अपने उन्हीं स्थलों को ढूंढ़ लेते हैं, जहां पिछले साल उन्होंने अपनी सर्दियां या गर्मियां बिताई थीं। यह सिलसिला साल दो साल नहीं, बल्कि सालों-साल तक निरंतर चलता है। मैं जब भी इस बारे में सोचता हूं तो आश्चर्य से भर जाता हूं। मैं अन्य दस महीनों की बनिस्बत फरवरी और अक्टूबर में जिंदगी को कहीं अधिक सार्थक और जीने के योग्य महसूस करता हूं।
चटवाल विवाद
संतसिंह चटवाल को पद्मभूषण देने के सरकार के फैसले पर इससे पहले मैंने टिप्पणी करने से परहेज किया था, क्योंकि मैं इस शख्स के संदिग्ध अतीत के बारे में बहुत ज्यादा नहीं जानता था। इसके अलावा मैं उनके खिलाफ पहले से ही पूर्वाग्रह से ग्रस्त था, क्योंकि मुझे ऐसे लोग बिल्कुल भी पसंद नहीं हैं जो आत्म-प्रचार और बात-बात में बड़े लोगों का नाम लेकर अपने महत्व को दर्शाने में लगे रहते हैं। 
अखबारों में हुए हंगामे को देखकर मैं सोच रहा था कि पुरस्कार विजेताओं के नामों की सूची से वे स्वयं ही अपना नाम वापस ले लेंगे। कुछ साल पहले ऐसा ही एक मामला रेनबैक्सी के संस्थापक भाई मोहनसिंह का उठा था। उन्होंने कंपनी के एक सह-संस्थापक को हटा देने के मुद्दे पर मीडिया में उपजे विवाद के बाद पद्म पुरस्कारों की सूची से स्वयं को बाहर कर लिया था। लेकिन चटवाल में शर्म का ऐसा कोई भाव नजर नहीं आया। 
उनकी जो सबसे खराब आदत मुझे नजर आई, वह पैसों का भद्दा प्रदर्शन और आडंबर है। कुछ साल पहले मुंबई में उनके पुत्र की शादी हुई थी। उसमें पैसे का जमकर दिखावा किया गया था। कई अतिथियों को उन्होंने अपने पैसे से हवाई जहाज से बुलवाया था। उनके ठहराने के लिए भव्य राजसी इंतजाम किए गए थे। 
उनके लिए पांच सितारा होटलों के कई कमरे बुक किए गए थे। हजारों अतिथियों के लिए भारी-भरकम रिसेप्शन दिया गया था। उनकी कोशिश ऐसा शादी समारोह आयोजित करने की थी, जो इससे पहले किसी ने नहीं देखा हो। आडंबर के प्रदर्शन का जिम्मा चटवाल के बाद उनके बेटे ने संभाल लिया। वह साधारण चेहरे-मोहरे वाला सरदार है, लेकिन फिल्मी हीरो बनने के सपने देखता था। किंतु उसे जल्दी ही इस बात का एहसास हो गया कि बॉलीवुड में भी रिश्वत के बल पर स्टार नहीं बना जा सकता। उसकी शादी भी ज्यादा दिन तक नहीं चल पाई। उसकी पत्नी अपने पिता के पास दिल्ली लौट आई।
इससे पहले चटवाल महाराष्ट्र के नांदेड़ स्थित हजूर साहिब गुरुद्वारे में आए थे। वे अपने चार्टर्ड विमान से वहां पहुंचे थे। गर्थिंयों ने उनके सम्मान में सिरोपा भेंट किया था। यह ऐसे शख्स की दुखद कथा है जिसके कोई सिद्धांत नहीं हैं, लेकिन महत्वाकांक्षाएं अपार हैं। 
अंग्रेजी का पाठ
कुछ माह पहले की बात है। जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरी अमेरिका की यात्रा करने वाले थे। वहां उन्हें राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिलना था। अमेरिका जाने से पूर्व उन्हें अंग्रेजी का कुछ आधारभूत ज्ञान दिया गया। उनके प्रशिक्षक ने उन्हंे समझाया- जब आप राष्ट्रपति ओबामा से हाथ मिलाएं तो उनसे पूछिएगा, ‘हाऊ आर यू?’ (आप कैसे हैं?)। ओबामा कहेंगे, ‘आई एम फाइन, एंड यू?’ (मैं अच्छा हूं, आप कैसे हैं?)। तब आप कहिएगा, ‘मी टू’ (मैं भी अच्छा हूं)। इसके बाद हम अनुवादक मामला संभाल लेंगे। 
लेकिन जब मोरी राष्ट्रपति ओबामा से मिले तो उन्होंने गलती से पूछ लिया, ‘हू आर यू?’(आप कौन हैं?)। राष्ट्रपति ओबामा इस सवाल से चकरा गए, लेकिन तत्काल स्थिति को संभालते हुए मजाक में कहा, ‘वेल, आई एम मिशेल्स हसबैंड, हा हा हा’(मैं मिशेल का पति हूं।)। मोरी ने जवाब दिया, ‘मी टू, हा हा हा’ (मैं भी)। (सौजन्य : जीएस सेन, नई दिल्ली)
सड़क पर साइन बोर्ड 
पाकिस्तान के बलूचिस्तान में सड़क पर जीप चली जा रही थी। तभी जीप ड्राइवर ने सड़क पर साइन बोर्ड देखकर गाड़ी अचानक रोक दी। जीप में उसके साथ सेना का कोई छोटा अफसर बैठा हुआ था। उसने पूछा, ‘क्यों, क्या हुआ?’‘मेजर साहब आगे जा रहे हैं।’‘मेजर साहब! कैसे मालूम हुआ?’‘ये साइन बोर्ड पढ़ा।’ और उसने सड़क पर लगे एक साइन बोर्ड की ओर इशारा कर दिया। उस पर लिखा था, ‘मेजर रोड अहेड’ (आगे बड़ा रास्ता है)। (सौजन्य : गौरवजीत सिंह, नई दिल्ली)
खुशवंत सिंह लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।
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