राजेन्द्र जोशी
देहरादून। उतराखण्ड अपनी जलवायु विविधता एवं सूक्ष्म वातावरणीय परिस्थितियों के कारण आदिकाल से जड़ी बूटियों के भण्डार के रूप में विश्व विख्यात है। हिमालय क्षेत्रों में उपलब्ध इन जड़ी बूटियों की आयुर्वेद सहित अनेक चिकित्सा पद्धतियों में बड़ी मांग है। इस समय देश में बहुत कम औषधीय फसलों की खेती की जा रही है। खेती की आवश्यक जानकारी व तकनीकि के अभाव में अधिकांश वनौषधियों का दोहन अभी भी वनों से किया जा रहा है। जिस कारण अनेक महत्वपूर्ण औषधीय पौधे विलुप्त होने के कगार पर आ गये हैं। यदि अभी से इनके सम्वर्धन एवं संरक्षण हेतु उचित कदम नहीं उठाए गये तो ये वनस्पतियां सदैव के लिए विलुप्त हो जायेगी।
उपासक के सहायक प्रबंधक डा. संजय कहते हैं कि उत्तराखण्ड के चमोली, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़, बागेश्वर तथा धारचूला तहसील के कुछ कसानों ने विलुप्त हो रही इन औषधीय प्रजातियों जैसे कुटकी, जम्बू, गद्रायण, अतीस, सालमपंजा, सालम मिश्री, डोलू, कालाजीरा, विदेशी जीरा, कुट, जटामासी आदि की खेती कर यह सिद्व किया है कि अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में इन बहुमूल्य जड़ी-बूटियों की सफल खेती कर आर्थिक क्रान्ति लाई जा सकती है। जो कि आजीविका का सक्षम साधन हो सकती है। यह विदेशी मुद्रा भी अर्जित किये जाने का अच्छा स्रोत हो सकता है।।
पौड़ी व नैनीताल में आर्टिमिशिया एनुआ, अल्मोड़ा, पिथौरागढ, बागेश्वर में जिरेनियम, गुलाब, लेवेन्डर एवं बड़ी इलायची की खेती में भी काश्तकारों ने सफलता प्राप्त की है। इन सभी में वैज्ञानिक कृषि तकनीकि विकसित करने की आवश्यकता है। क्योंकि उत्तराखण्ड के जड़ी बूटियों की मांग में वृद्धि राष्ट्रीय एवं अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर तेजी से ही रही है। उत्तराखण्ड में स्थापित पंतजलि योगपीठ में भी इन जड़ी बूटियों की इतनी अधिक मांग है कि उनकी मांग का 5 प्रतिशत ही उपलब्ध है। 95 प्रतिशत कच्चा माल बाहर से पंतजलि योगपीठ में आ रहा है।
समुद्र तल से ऊंचाई (फीट में) वनौषधियां
800 हरड़, पीपरमिंट, गूलर, बहेडा़, मुलेठी, कालिहारी, कचनार, आंवला, कालमेघ, विजयसार, पीपली, ब्रहमी। 800-4000 कचनार, आंवला, तिमूर, ब्रहमी, पीपल, प्यूरा, सर्पगन्धा, अश्वगन्धा, तुलसी, रीठा, मजीठ, मस्कदाना, पाती आदि।4000-9000 वनपशा, गुलाब वनपसा, सतावर, दारूल हल्दी, मंजीठ, तुलसी, बज्रदन्ती, वच, तिमुर, अकरकरा, तगर, अतीस, आर्टीमीशिया, भंगजीरा, कलिहारी, आदि। 9000-14000 सालमपंजा, सालममिश्री, कुटकी, डोलू, रतनजोत, अतीस, दारामादि, गंद्रायण, थुनेर, मैदा, महामैदा, वनककड़ी, फरड़, गुग्गल, चिरायता आदि।