एमजे अकबर
प्रणब मुखर्जी जब विपक्ष की खाली बेंचों के सामने अपना बजट भाषण खत्म कर रहे थे, उस समय लोकसभा में मौजूद सदस्यों की गिनती करने वाले कुछ भूल रहे थे। वे भूल गए कि प्रणब मुखर्जी और डॉ मनमोहन सिंह ने ‘क ख ग’ कहां से सीखा। मुखर्जी की प्रधान अध्यापिका इंदिरा गांधी थीं, जबकि मनमोहन सिंह पीवी नरसिंहराव की कहीं अधिक जटिल पाठशाला में गए थे।
प्रधानमंत्री बेहद अलग किस्म के राजनीतिज्ञ हैं। राव के मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री रहते हुए वे राजनीतिक कम थे और इसीलिए अक्सर विचलित हो जाते थे। उन्होंने कम से कम एक बार अपना इस्तीफा भी सौंप दिया था (जिसे राव ने नामंजूर कर दिया था)। लेकिन अब वे सत्ता के साथ चलना सीख गए हैं। बजट भाषण के आखिरी चरण में सरकार के साथ केवल 274 सांसद थे और यह बहुत ही न्यूनतम बहुमत था। मुखर्जी ने बगैर किसी कंपन के अपना भाषण पूरा किया। सिंह आगे की सीट पर विचलित हुए बगैर बैठे रहे।
उन्होंने ‘प्राइमरी स्कूल’ में ही सीख लिया था कि सरकारें नंबरों से नहीं गिरतीं। वे तब गिरती हैं, जब अनिश्चित या अनिर्णायक हो जाती हैं। जिस समय इंदिरा गांधी ने बगैर बहुमत के दो साल तक सरकार चलाई थी, उस समय मुखर्जी उनकी सरकार में वित्त मंत्री थे। सिंह भी लगातार तीन बजट तक अल्पसंख्यक सरकार में वित्त मंत्री थे। दरअसल, राव सरकार सदन में बहुमत खरीदने के बाद ही लड़खड़ाने लगी थी। यही वह समय रहा होगा जब सिंह का नौकरशाह से राजनेता के रूप में रूपांतरण होना शुरू हुआ होगा।
प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री जानते हैं कि उनकी सरकार सुरक्षित है, क्योंकि विपक्ष एक और चुनाव के लिए तैयार नहीं है। लेकिन इसके बावजूद विपक्षी दलों का बहिर्गमन न तो कम महत्वपूर्ण था और न ही अर्थहीन। यह अचानक नहीं था। यह इस बात का संकेत था कि विपक्षी दलों के बीच मौखिक समझदारी थी, जो कुछ अर्से से पनप रही थी। पिछले चुनावों के परिणाम इस बात का पर्याप्त संकेत थे कि यदि कांग्रेस पर नियंत्रण नहीं लगाया गया तो वह उनकी अधिकांश जगह को हड़प लेगी। इसलिए विचारधारा को रणनीति के लिए राह देनी होगी।
वामपंथी मध्यप्रदेश में कांग्रेस की राह नहीं रोक सकते और न ही भाजपा बंगाल या केरल में कांग्रेस को चुनौती दे सकती है। लेकिन यह दोनों के हित में होगा कि वे कांग्रेस को नियंत्रित रखें। राजनीति में आगे बढ़ने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि धीरे-धीरे सावधानीपूर्वक कदम बढ़ाए जाएं। एक स्पष्ट क्षितिज का अभाव इसमें मदद करता है। सबसे पहला कदम होता है संसद में सदन का प्रबंधन।
यदि विपक्षी पार्टियां किसी ऐसे मुद्दे पर अपने मतभेदों से ऊपर उठ सकें, तब उनकी यह एकता उस मसले को राष्ट्रीय मुद्दे में बदल देती है। यदि महंगाई के मुद्दे पर विपक्षी पार्टियों में कोई एकता नहीं बन पाती है तो एक अवधारणा के रूप में विपक्ष का विध्वंस हो चुका होगा। दूसरा कदम कहीं अधिक कठिन होगा क्योंकि यूपीए में जितने विरोधाभास हैं, उससे कहीं अधिक विरोधाभास विपक्षी दलों में हैं। अगले चरणों के विधानसभा चुनाव स्थिति को साफ करने में मददगार होंगे।
अंतिम खेल की समाप्ति के काफी पहले ही एक मध्य बिंदु भी आता है। जिन संख्याओं का महत्व है, उनकी गिनती सबसे अंत में होती है, न कि शुरू में या मध्य में।
लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक हैं।