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पाकिस्तान से बड़े सौदे की तलाश में

 शेखर गुप्ता

वॉशिंगटन में अमेरिका-पाकिस्तान रणनीतिक वार्ता से अफगानिस्तान युद्ध के अंत की औपचारिक शुरुआत मानी जा सकती है। अमेरिकी अलकायदा को नेस्तनाबूद करने और तालिबान से उनके जुड़ाव को हमेशा के लिए खत्म कर देने की खातिर पाकिस्तान से एक बड़े सौदे की तलाश में हैं।
तालिबान को समूल नष्ट करना अब अमेरिकी एजेंडे में शामिल नहीं है। यदि ओबामा प्रशासन सफलता की रिपोर्ट देता है तो अमेरिका जीत का दावा करते हुए अफगानिस्तान से अपनी अधिकांश सेनाएं वापस बुला सकता है। सेनाएं बुलाकर अमेरिका एक किस्म की जीत का दावा कर सकता है। इराक में भी ऐसा ही कुछ हुआ था।
पाकिस्तानी इसे जानते हैं, फिर भी न जाने क्यों उतावले से मालूम होते हैं। जैसे कि यह उनका आखिरी बड़ा मौका हो अन्यथा ब्रांड पाकिस्तान फैशन से बाहर चला जाएगा। आइए, तस्वीर को पाकिस्तान के नजरिये से देखते हैं। तभी हम समझ पाएंगे कि पाकिस्तानी अमेरिकियों के प्रति शिकायत क्यों पाले बैठे हैं। वे किसिंजर-निक्सन के साइड शो के बावजूद 1965 और यहां तक कि 1971 को भी संधिवार्ता द्वारा सुरक्षित मैत्री के प्रति अमेरिकी विश्वासघात मानते हैं।
पचास के दशक में साम्यवाद के खिलाफ लड़ाई के लिए वे अमेरिकियों के साथ सैन्य-रणनीतिक अभियान में शामिल हुए। वे आज भी इसे लेकर परेशान रहते हैं कि अमेरिकियों द्वारा दिए सैन्य संसाधनों का 1965 में भारत के खिलाफ इस्तेमाल किए जाने पर अमेरिका ने कड़ी प्रतिक्रिया क्यों व्यक्त की और दंडस्वरूप पाकिस्तान को नए संसाधन देना बंद क्यों कर दिया? पाकिस्तानियों का मानना है कि इसका खामियाजा उन्हें 1971 में भुगतना पड़ा। 1971 के बाद वॉशिंगटन ने परास्त, विभाजित पाकिस्तान को अकेला छोड़ दिया। इससे भी बुरी बात यह कि ये सब उस भुट्टो की अगुवाई में हुआ, जिनका छद्म वामपंथी अमेरिका विरोध उनकी अभिजात्य जीवन शैली के ही अनुरूप था।
1979 में अफगानिस्तान पर सोवियत चढ़ाई के बाद अमेरिकियों को फिर पाक की याद आई। यह तभी हुआ, जब 1971 के बाद पहली दफे भारत और अमेरिका के संबंधों में भी गरमाहट आनी शुरू हुई थी। इसी दौरान जिमी कार्टर 15 सालों के लंबे अंतराल के बाद भारत की यात्रा करने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बने। यह चरम शीतयुद्ध का दौर था।
अमेरिकी और चीनी दोनों ही अफगानिस्तान में सोवियतों की धरपकड़ करने को आतुर थे और इसीलिए पाकिस्तान उनके लिए एक जरूरी मित्र राष्ट्र बन गया। जिस जिया-उल-हक को अभी तक भुट्टो और संविधान का हत्यारा बताया जाता रहा था, उसे साठ के दशक में अयूब के बाद दूसरा सबसे नजदीकी मित्र बताया जाने लगा। सैन्य और सिविल दोनों ही प्रकार की मदद फिर शुरू हो गई। फिर क्या हुआ? जैसे ही सोवियतों ने 1993 में अफगानिस्तान छोड़ा, अमेरिका ने पाक को लोकतंत्र का पालन करने के लेक्चर देने शुरू कर दिए। इसी दौरान भारत से अमेरिकी संबंध पुन: गरमाने लगे।
कारगिल युद्ध और क्लिंटन की उपमहाद्वीप की यात्रा के बाद पाकिस्तान को यकीन हो गया कि अमेरिकी झुकाव भारत की ओर ज्यादा है। बुश इस दिशा में कुछ आगे ही बढ़े। एक ओर जहां 9/11 के बाद हुए बदलावों ने पाकिस्तानी रणनीति की प्रासंगिकता सिद्ध करने में मुशर्रफ की मदद की, वहीं दूसरी ओर भारत अब तक एक रणनीतिक और राजनीतिक-आर्थिक इकाई के रूप में अलग हो चुका था।
संक्षेप में पाकिस्तान के नजरिये से कहानी कुछ यूं है
जब अमेरिकियों का अपना कोई रणनीतिक हित होता है, तब वे हमें गले लगा लेते हैं। जैसे ही हित खत्म होता है, वे फिर हिंदुस्तान की ओर लौट जाते हैं, जिससे उनका दिल-दिमाग और उनके लंबे हित जुड़े हैं। जब उन्हें हमारी जरूरत होती है, तब वे हमें कुछ संसाधन दे देते हैं और फिर वे हमें हिदायत देते हैं कि हम हिंदुस्तान के खिलाफ उनका इस्तेमाल न करें।
अमेरिकी इतने भ्रमित नहीं हो सकते कि वे यह सोचते हों कि हमें कम्युनिस्टों, अलकायदा, तालिबान इत्यादि के खिलाफ उनकी लड़ाइयां लड़ने के लिए उन्हीं के हथियारों की जरूरत है। हमारी रणनीतिक चिंताएं वह नहीं हो सकतीं, जो उनकी हैं। और जब तक वे इसे स्वीकार नहीं कर लेते कि भारत ही हमारी रणनीतियों का केंद्रीय और एकमात्र फोकस है, तब तक वे बेईमान मित्र ही साबित होंगे।
पाकिस्तान की चिंताएं इन्हीं बातों को लेकर हैं और वे उम्मीद करते हैं कि अब इसमें बदलाव होगा। ओबामा के लिए अफगानिस्तान की बाजी रीगन या बुश सीनियर की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान पर अमेरिकी निर्भरता भी इस बार पूरी है। यदि अभी तक की वार्ताओं की खबरें सही हैं तो पाकिस्तानियों ने अमेरिकियों को उनके विगत ‘विश्वासघातों’ को स्वीकारने और उनके लिए क्षमायाचना करने के लिए तकरीबन तैयार कर लिया है।
भारत के सामने अब यही प्रश्न है कि पाकिस्तान के साथ अतीत में किए गए बरतावों की क्षतिपूर्ति अमेरिकी कैसे करेंगे और भविष्य के लिए वे कौन-सी गारंटी दे सकते हैं? यही वजह है कि पाकिस्तानी इस मौके को पूरी तरह भुना लेना चाहते हैं। इस वार्ता से पहले पाकिस्तानियों द्वारा अमेरिका को दी गई ५६ पृष्ठों की मांग सूची का ठीक यही मतलब है। इसका यह भी मतलब है कि अफगान-पाक प्रोजेक्ट का सैन्य भाग खत्म होते ही ब्रांड पाकिस्तान और उसकी रणनीतिक मुद्रा चलन से बाहर हो जाएगी।
क्या भारत को चिंतित होना चाहिए? अभी तक हमारी प्रतिक्रियाएं सामान्यत: नपी-तुली ही रही हैं। पाकिस्तानियों के लिए यह स्वाभाविक ही है कि वे हर उस चीज की मांग करें, जो हमारे पास है। जैसे परमाणविक सौदा। लेकिन पाकिस्तान की सबसे गहरी इच्छा यह है कि उपमहाद्वीप में अमेरिकी नीति का नए सिरे से निर्धारण हो। पाकिस्तान से अमेरिका की बढ़ती नजदीकी, जिसमें परमाणविक सौदा भी मुमकिन है, संभवत: हमारे लिए लाभदायक ही हो, क्योंकि इससे पाकिस्तान की परमाणु नीति में पारदर्शिता आएगी और उसका सैन्यवादी दृष्टिकोण संतुलित होगा।
और निश्चित ही हमें स्वयं के नए रणनीतिक स्पेस का उपयोग शुरू करना होगा, खासतौर पर अमेरिकी नीति के इस ‘पुनर्निर्धारण’ के बाद। इसी तरह भारत को इस विस्तारित रणनीतिक स्पेस का उपयोग अमेरिका और आतंकवाद के इतर दुनिया को अधिक सावधानीपूर्वक देखने के लिए करना चाहिए। आईएईए में ईरान के विरुद्ध भारत का वोट सैद्धांतिक रूप से सही था और यह जारी रहना चाहिए। लेकिन हमें ईरान से ऊर्जा सौदे करने, उसके विद्यार्थियों को वीजा देने और यहां तक कि उसके सिविल सैटेलाइट स्थापित करने में थोड़ा कम संकोची होना चाहिए। वॉशिंगटन में अफगान-पाक गेम का अंत भारत के लिए भी एक अवसर है कि वह अपनी अमेरिका नीति को नए सिरे से निर्धारित करे।
 
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