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अमन की उम्मीद में जुटा मीडिया

 श्रवण गर्ग

कराची. भारत और पाकिस्तान के प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के वरिष्ठ संपादक और एंकर मंगलवार को एक साथ दिखे। अवसर था भारतीय और पाकिस्तानी समूहों टाइम्स ऑफ इंडिया और जंग के मिले जुले प्रयास ‘अमन की आशा’ के बैनर तले आयोजित ‘टॉकिंग पीस’ कार्यक्रम का। यह दोनों मुल्कों के बीच शांति बहाली में एक प्रशंसनीय कदम था।
कराची में हुई इस बैठक में रखे गए विचार खुले और स्पष्ट थे। सभी इस पर सहमत थे कि दोनों देशों के बीच समभाव का माहौल पैदा किया जाए और आपस में सूचनाएं साझा की जाएं। इस दौरान मीडिया हस्तियों ने कई सुझाव दिए, जिनसे दोनों मुल्कों के बीच आपसी समझ पैदा हो सके। इसके तहत मीडिया कवरेज बढ़ाने पर विशेष ध्यान देने की जरूरत जताई गई।
दोनों पक्षों ने माना कि दोनों देशों में वीजा नियमों में सख्ती ने उन्हें अपने संवाददाताओं को वापस बुलाने पर मजबूर किया है। मीडिया प्रतिनिधियों ने वीजा नियमों में ढील देने, दोनों देशों के चैनलों के प्रसारण पर से प्रतिबंध हटाने, पत्रकारों को आवाजाही की अनुमति देने और भारत-पाकिस्तान के बीच फोन सेवा से रोमिंग की पाबंदी को हटाने जैसे सकारात्मक उपायों की जरूरत भी जताई।
यह सुझाव भी दिया गया कि भारत-पाकिस्तान के मुद्दों को दिखाने का दायरा और बढ़ाया जाए। सिर्फ राजनीति और सीमा विवाद को छोड़ मीडिया को एक-दूसरे की आर्थिक, मूलभूत संरचनाओं और सांस्कृतिक मुद्दों को भी जगह देनी चाहिए। दोनों देशों के बीच के विभिन्न मुद्दों जैसे कश्मीर, जल, आतंकवाद आदि पर रिपोर्टरों को प्रशिक्षित करके खबरों केस्तर को बेहतर बनाया जा सकता है।
साथ मिलकर दोनों देशों के बीच पत्रकारिता के ‘कोड ऑफ एथिक्स’ तय करने का भी सुझाव रखा गया। एक ऐसी वेबसाइट विकसित करने पर भी चर्चा हुई, जिसके जरिए दोनों देशों के पत्रकार एक-दूसरे के संपर्क में रह सकें।
आक्रामक रुख वाले भी वार्ता में हों शामिल
मीडिया हस्तियों की यह भी राय थी कि दोनों मुल्कों में आपसी संबंधों पर आक्रामक रुख रखने वालों को भी बातचीत में शामिल किया जाना चाहिए। यह उम्मीद जताई गई कि इससे संकट के समय में दोनों मुल्कों के संबंधों में तनाव का स्तर कम होगा। चर्चा की शुरुआत पनोस दक्षिण एशिया के विशेष प्रस्तुतीकरण से हुई। इसमें भारत और पाकिस्तान के संपादकों के बीच नौ सालों में हुए संवाद के नतीजों के बारे में बताया गया। इसे पनोस साउथ एशिया के कार्यकारी निदेशक एस. पनीरसेल्वन ने पेश किया।
 
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  • एक और प्रभाष जोशी की जरुरत है
  • एक ऋषितुल्य संपादक
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