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धोखा हैं गंगा कार्य योजना

 राजकुमार शर्मा

देहरादून. देवभूमि हिमालय में गंगा अपने उदगम् स्थल गंगोत्री सहित उत्तरकाशी,पौडी टिहरी आदि शहरों से निकलने वाली गंदगी से प्रदूषित होती जा रही हैं.भारत सरकार द्वारा गंगा को पवित्र बनाने के लिए शुरू की गयी गंगा कार्य योजना अब तक इन हिमालयी शहरों में पुरी तरह धोखा सिद्ध हुयी हैं.गंगा कार्ययोजना में खर्च किये गये अरबों रूपये का धेला भर लाभ इन शहरों एंव गंगा को नही मिला जिससे गंगा के नाम पर की गयी लूट का खुलासा  होता हैं.शिवांगी कही जाने वाली गंगा के साथ अब तक जिस तरह का धोखा उसके अपनों ने किया उससे गंगा के प्रति मानवीय गंदी सोच का भी खुलासा होता हैं.गंगा के नाम पर मुक्ति का नारा लगा कर हजारों सरकारी गैर सरकारी लोगों ने अपने को तो सम्पन्न के साथ अपनी मुक्ति का मार्ग तो प्रशस्त कर लिया किन्तु गंगा के मुक्ति के बारे में केवल छल ही किया.
गंगा और यमुना के उद्गम प्रदेश प्रदेश के पहाड़ी जिलों के अधिकांश मुख्य नगरों को अब भी सीवर लाइन व सीवरेज प्लांट का इतंजार हैं.हिमालय के बैकुण्ठ धाम के रूप में विख्यात हिन्दूओं के प्रमुख आस्था के केन्द्र बदरीनाथ धाम में सीवर लाइने सीधें गंगा की सहायक नदी अलकनंदा में गिराई जाती है जिससे देश के कोने-कोने से आने वाले हजारों तीर्थ यात्रियों की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचता हैं.सूबे की सरकार से लेकर भारत सरकार तक की मंसा गंगा के प्रति क्या है?इस बात का खुलासा इन हिमालयी शहरों के गड़बड़ नियोजन की प्रक्रिया को एंव विगड़ती गंगा के सेहद को देखकर पता लगाया जा सकता हैं.पुरे गढ़वाल में सीवरेज निस्तारण की ब्यवस्था नही हैं.इनके शहरों की मानव मल को सीधे अलकनन्दा,मंदाकिनी एंव भागीरथी में सीधे निस्तारित किया जा रहा हैं.जिससे सहयोगी नदीयों के मल युक्त जल से गंगा के अविरल पावन जल को गम्भीर संकट उत्पन्न हो गया हैं.पौड़ी एंव रूद्रप्रयाग में जनता के तमाम आवाज उठाने के बावजूद सीवर लाइन तक नही डाली जा सकी.उत्तरकाशी में सीवर लाइन का काम अधुरा एंव ट्रीटमेन्ट प्लान्ट का काम अधर में ही लटका हुआ हैं,यहां के एक सूबे की पूर्व सरकार के मंत्री एंव परियोजना के एक अधिकारी ने गलबहिया करके गंगा के लिए आये धन को इस बदनियति से निपटाया कि दोनों की दो शहर में आलीशान कोठी तो बन गयी किन्तु गंगा की भलाई का काम आज भी जनता को मुंह चिढ़ा रहा हैं.टिहरी में प्लांट का तो निर्माण किया गया हैं किन्तु इस प्लांट के चोक होने से इसका लाभ गंगा को नही मिल पा रहा हैं.गोपेश्वर में ढ़ाई करोड़ की लागत से बनने वाला सीवेर लाइन का काम पुरी तरह से कछुआ गति से चलाया जा रहा हैं.चमोली में अंग्रेजों के शासन काल में सीवेज डाली गयी थी जो अब बहुत ही जर्जर हालत में प्रदूषण फैलाने का काम कर रही हैं.हिमालयी शहर बदरीनाथधाम जोशीमठ,नंदप्रयाग,कर्णप्रयाग व गोचर में भी सीवरेज की व्यवस्था तक नही हैं. इन सभी जगह गंदगी सीधे अलकनंदा में डाली जाती हैं.
गंगा के साथ यही भद्दा मजाक ऋषिकेश एंव हरिद्वार में भी किया जा रहा हैं जिसमें सवेरेज के त्रिबेणी घाट पर ओबर होकर बहने से गंगा में गोता लगाने वालों का बुरा हाल हो जाता हैं.गंगा को कानपुर काशी एंव प्रयाग में कैसे बचाया जायेगा जब उसका अपने ही उद्गम स्थल में बुरा हाल हो रहा हैं.गंगा को बचाने के लिए कई दर्जन स्वंय सेवी संस्थाओं ने गंगा को बचाने का नारा लगा कर अपना स्वास्थ्य तो ठीक कर लिया किन्तु गंगा की हालत दिनों दिन बद से बदतर होती जा रही हैं.उत्तराखण्ड की सरकार भी गंगा जल को बेचने से लेकर गंगा के तट पर अपने पर्यटन की दशा सुधारने के लिए अनेक मार्ग अपना रखा हैं किन्तु गंगा के प्रति सूबे की सरकार की भी बेइमानी अब जग जाहिर हो चुकी हैं.गंगा के अस्तित्व पर आये संकट से अवगत होकर भी लोग अपने भैातिक विकास की अंधी दैड़ में इस कदर अंधे हो चुके है कि उन्हें अब भी मुक्ति प्रदायिनी गंगा को खो कर भी चंद रोशनी की ललक  तंग कर रही हैं सूबे की सरकार हिन्दूओं की आस्था को भूना कर जरूर बनी किन्तु हिन्दूओं की अस्मत गंगा के प्रति उसकी बेइमानी से देश भर के गंगा भक्त तंग आ चुके हैं.गंगा के नाम पर भगवा धारण कर बाबाओं की फौज भी अगर गंगा के प्रति ईमानदार हो जाय तो भी गंगा को बचाया जा सकता हैं किन्तु इनकी भी ईमानदारी पर उठ रही उंगली गंगा के प्रति इनकि नियती पर इसारा कर रही हैं.
 
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