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माल्या, मोदी और भूख

 आलोक तोमर 

हजारों करोड़ की बातें हो रही है। लाखों करोड़ के सौंदे हो रहे हैं। करोड़ों रुपए के एडवांस इनकम टेक्स भरे जा रहे है। चियरगर्ल्स नाच रही है। देर रात तक पार्टियां हो रही है। प्राइवेट जहाज उड़ रहे है। टीवी चैनलों पर पैसे की बारिश हो रही है। मल्टीप्लेक्स सिनेमा की जगह बड़े पर्दे पर डिनर के साथ क्रिकेट के मैच दिखा रहे हैं। 
मगर यह सब मध्य प्रदेश में ओरछा के पास के गांवों या टीकमगढ़ जिले में नहीं हो रहा। यहां भूख पांव पसार रही है और पारा पचास को छू रहा है। धरती पत्थर हो रही है और किसी मोदी, किसी थरूर, किसी माल्या, किसी पवार, किसी पटेल को परवाह नहीं है कि इस जगमगाते हुए इंडिया में एक भारत भी बसता है जिसमें सरकारी आंकड़ों के हिसाब से ही बत्तीस करोड़ से ज्यादा ऐसे लोग हैं जो गरीबी की रेखा के नीचे रहने पर अभिशप्त है। 
यह रेखा भी भारत के लिए इंडिया ने खींची है। असली आंकड़े क्या हैं यह कोई नहीं जानता। गरीब जब आंकड़ा बन जाते हैं और उनकी भूख को कंप्यूटर में फीड कर दिया जाता है तो वहां से जो प्रिंट आउट निकलता है उसमें झूठ के कई धब्बे होते हैं। टि्वटर पर चटर पटर करने वाले इस प्रिंट आउट को खोल कर भी नहीं देखते कियोकि साहब को गम बहुत हैं मगर आराम के साथ। या अदम गोंडवी के शब्दों में कहे तो - काजू भुने प्लेट में, व्हिस्की गिलास तले / उतरा है रामराज विधायक निवास में। यह जो गरीबी की सीमा रेखा है उसके बारे में दावा किया जा रहा हे कि देश की दस प्रतिशत आबादी पिछले दस साल में लटक कर इसके ऊपर आ गई है। इसका मतलब क्या है? 
भारत सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रिन्यावयन मंत्रालय के आंकड़े और तथाकथित सर्वेक्षण इस रेखा को निर्धारित करते हैं। आप गलत नहीं होंगे अगर आपने इस मंत्रालय का नाम नहीं सुना हो। ये आपको आंकड़ों में बदल देने वाला मंत्रालय है। आपका नाम देखते देखते यहां संख्या बन जाता है और आपका समाज प्रतिशतों में बदल जाता है। फिलहाल बदलने की बात हो रही है लेकिन गरीबी की रेखा की परिभाषा कुछ इस तरह है।
ग्रामीण इलाकों में जिन्हें 2400 कैलोरी और शहरी इलाकों में 2100 कैलोरी का भोजन या जो भी खाद्य-अखाद्य पदार्थ मिल जाते हैं वे गरीब नहीं रहते। एक दिन में 2400 कैलोरी का मतलब है छह रोटी, सब्जी और एक कटोरी दाल, दो वक्त में। आप कल्पना कीजिए कि अगर आप भद्र लोग दिखने के लिए डाइटिंग नहीं कर रहे हैं तो आप कितनी कैलोरी खाते हैं। एक आम आदमी को स्वस्थ्य और कर्मठ रहने के लिए रोज कम से कम चार हजार कैलोरी की जरूरत है। मगर सन 1970 में यानी आज से चालीस साल पहले बनाया गया परिभाषा का यह आंकड़ा आज भी चल रहा है और इसी के हिसाब से 32 करोड़ लोग भारत में गरीब हैं। 
गरीबी की इस परिभाषा में दवाई, शिक्षा, यातायात, आपदा, संकट, यात्रा और यहां तक कि अंत्येष्टि तक का खर्चा शामिल नहीं है। परिभाषा कहती है कि अगर आप खाने पर 2400 कैलोरी का भोजन खरीदने का खर्चा कर सकते हैं तो इससे ज्यादा कमाने के अभियुक्त है। आप चाहे जो कर ले, बाबुओं द्वारा बनाई गई यह परिभाषा भारत के बाबू बदलने नहीं देंगे क्योंकि इससे सरकार और देश छवि पर आंच आएगी। 
सन 1970 के आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में ये एक महीने के लिए 2400 कैलोरी 62 रुपए में और शहरी इलाकों में 71 रुपयों में खरीदी जा सकती है। मुद्रास्फीति के साथ 2000 तक यह आंकड़ा ग्रामीण इलाकों में 328 रुपए और शहरी इलाकों में 454 रुपए पहुंच गया थे। सन 2004 तक 5.5 प्रतिशत मुद्रास्फीति हो चुकी थी और यह आंकड़ा 454 और 540 रुपए मासिक तक पहुंच गया था। हम क्या बात कर रहे हैं।
हम यानी हमारी सरकार यह कह रही है कि अगर आपकी मासिक आमदनी 540 रुपए है और आप शहर में रहते हैं तो आपको गरीब नहीं माना जाएगा। मान लीजिए आप 600 रुपए कमाते हैं और 540 रुपए खाने पर खर्च कर देते हैं तो आप गरीब कैसे हुए? गरीब तो बेचारा ललित मोदी है जिसे 11 करोड़ एडवांस इनकम टेक्स भरने के बावजूद भ्रष्टाचार के मामलों में घसीटा जा रहा है। सोचने की बात यह है कि घर का किराया, बिजली का एक बल्ब, बस का एक टिकट इस खर्चे में शामिल नहीं हैं। रेडियो और केबल टीवी को तो भूल ही जाइए। गरीब जितने अज्ञानी रहे उतना ही भला है। 
मनरेगा योजना का बहुत डंका पीटा जाता है। लाखों करोड़ रुपए का बजट है। इस बजट का बहुत बड़ा हिस्सा पहले अधिकारी खाते थे और अब अधिकारियों की कायरता की वजह से माओवादी खा जाते हैं। लेकिन इस परम कल्याण्ाकारी योजना में गरीबी की सीमा रेखा के नीचे रहने वाले लोगों के लिए साल में सौ दिन का अनिवार्य रोजगार लगभग सत्तर रुपए रोज के हिसाब से सुनिश्चित किया गया है। अगर ईमानदारी से यह रोजगार और मजदूरी मजदूरों तक पहुंचे- और हम काल्पनिक स्थिति की बात कर रहे हैं- तो भी एक व्यक्ति को पूरे साल में सात हजार रुपए की आमदनी पूरा दिन मजदूरी करने के बाद मिलेगी। 
वातानुकूलित भवनों में जो गरीबी विशेषज्ञ बैठे हैं, उन्हें मेरी चुनौती है कि सात हजार रुपए में एक सप्ताह का अपना खर्चा चला कर बता दे। इतना तो उनके ड्राइवर का वेतन होता है। इससे कई गुना ज्यादा बिजली का बिल होता है। इससे कई सौ गुना गरीबी के नाम पर उनके हवाई सर्वेक्षणों पर खर्च किया जाता है। कालाहांडी या छतरपुर के गांवों में जा कर देखिए जहां एक उबले हुए आलू के सहारे पूरा परिवार आधा पेट चावल खाता है और हम कैलोरी की गिनती कर के उन्हें गरीब मानने से इंकार कर देते हैं। यह पाखंड हैं, आपराधिक और नारकीय पाखंड हैं और आईपीएल हो या मैच फिक्ंसिग, उससे भी बड़ा पाखंड हैं। 
फिर भी हमारे देश में शानदार फाइव स्टार होटल हैं, हवाई जहाज से उड़ने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है, शहरों में जगमगाती सड़के चमकदार बसों से लैस हो रही हैं, हवाई अड्डो का विस्तार किया जा रहा है और वहां इंटरनेट वाई फाई की सुविधा दी जा रही हैं। कॉमनवेल्थ खेल हो रहे हैं और गरीब अपनी फकीरी की दुनिया में बने हुए हैं और जब तक आंकड़े बनाने वाले खुद पसीने का स्वाद नहीं जानेंगे तब तक गरीबी की सीमा रेखा भारत और पाकिस्तान के बीच की नियंत्रण रेखा की तरह बनी रहेगी जो है भी और नहीं भी। 
 
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