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 हरे राम मिश्र

पन्द्रह मार्च का दिन भारतीय शि़क्षा के  इतिहास मे एक यादगार दिन बन गया जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता वाली कैबिनेट ने भारतीय सरजमी पर विदेशी शैक्षिक संस्थानो को कैम्पस खोलने की अनुमति संबंधी  बिधेयक विदेशी शैक्षिक संस्थान प्रवेश नियमन एवं संचालन विधेयक 2010को हरी झंडी दिखा दी। कैबिनेट से पास होने के बाद अब इस अधिनियम के कानूनी बैध होने का रास्ता साफ हो गया है। इस अधिनियम के मुताबिक अब विदेशी शैक्षणिक संस्थान भारत के भीतर कैम्पस खोलकर अपना शैक्षिक ब्यवसाय कर सकेगें।इस अधिनियम के मुताबिक अगर कोई विदेशी शैक्षणिक संस्थान भारत के भीतर कैम्पस खोलना चाहता है तो उसे आठ महीने की समयबद्व पंजीकरण प्रक्रिया के विभिन्न स्तरों से गुजरना होगा। इसके बाद नियामक संस्था सरकार को यह रिपोर्ट देगी कि इसे अनुमति दी जाय या नही। अनुमति के बाद यूजीसी से पंजीकरण मिल जाएगा।
इस  अधिनियम के पास हो जाने को मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल उच्चशिक्षा के सुधार के क्षेत्र मे एक बडा कदम मानते है। बकौल कपिल सिब्बल यह विधेयक हमारे लिए मील का पत्थर है जो विकल्प प्रतिस्पर्धा  और गुणवत्ता का विकास करता है। सरकार का तर्क है कि इस विधेयक के पास हो जाने के बाद जो छात्र विदेशों मे  शिक्षा  प्राप्ति के लिए जाते थे अब उन्हे वहां नही जाना पडेगा। गौरतलब है कि  इस समय आष्टेलिया मे भारतीय छात्रो की एक बडी संख्या है जो वहां पर  इजीनियरिंग और मैनेजमेन्ट की पढाई कर रहे है और इस अधिनियम से उन्हे जरूर लाभ होगा।
स्मरणीय है कि यह शिक्षा विधेयक लगभग 6 वर्षो से यूपीए सरकार के पास विचाराधीन था।  सरकार इस शिक्षा विधेयक को अपने पहले कार्यकाल मे ही पास करना चाहती थी लेकिन तत्कालीन सहयोगी वाम दलो की गंभीर आपत्तियों के कारण इस विधेयक को पास कराने मे 06 वर्षो से अधिक का समय लग गया।
लेकिन इससे पहले सन 2000 मे ही सरकार उच्चशिक्षा के क्षेत्र मे 100प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की मंजूरी दे चुकी है। जिसके तहत वे भारत मे शैक्षणिक संस्थान  तो खोल सकते थे लेकिन उसे  किसी विदेशी विश्वविद्यालय से संम्बद्व नही किया जा सकता था और ऐसी कोई डिग्री भी मान्य नही थी  लिहाजा यह कानून बनाया गया।
हलांकि इस कानून के पास होने के पहले ही कपिल सिब्बल कह चुके है कि भारत मे परिसर स्थापित  करने वाले विदेशी विश्वविद्यालयों पर कोटा कानून लागू नही होगा।
शिक्षाशास्त्रियों का एक तबका सरकार के इस कदम का विरोध कर रहा है उनका मानना है कि सरकार के इस कदम से देश के भीतर  दो  प्रकार के विश्वविद्यालय होंगे एक वे जिनका सामाजिक 
सरोकार शून्य होगा वे  सिर्फ मुनाफाखोर बहुराष्टीय कंपनियों की तरह होंगे। दूसरे बुनियादी सुविधाओं से दूर घरेलू विश्वविद्यालय जिसमें देश के गरीब बच्चे पढेगें। सामाजिक कार्यकर्ताआंे का मानना  है कि सरकार का यह कदम घरेलू विश्वविद्यालयों को दोयम दर्जे का बना देगा जो आज भी शिक्षा देने के बुनियादी संसाधन से कोंसों दूर है। सरकार को चाहिए था कि भारतीय विश्वविद्यालयों को  ही बुनियादी संसाधनों से लैस किया जाता ताकि वे भी  विश्वस्तर के होते। लेकिन सरकार को केवल पैसे वाले कुछ छात्रो की ही चिन्ता है। इन संस्थानो के उपर कोटा कानून न लागू करना भी यह दिखाता है कि इनका कोई सामाजिक उत्तरदायित्व नही है वे केवल मुनाफाखोर कंपनी मा़त्र होंगी। लेकिन आलोचको का एक तबका इससे इतर इसे अंबानी शिक्षा रिपोर्ट से जोड कर देखता है।राजनैतिक कार्यकर्ताओं का विचार है कि ये रिपोर्ट अतीत की अंबानी शिक्षा रिपोर्ट से प्रेरित  है। वे कहते है कि अब इस विधेयक के पास होने के बाद उच्च शिक्षा पर सब्सिडी धीरे धीरे खत्म कर दी जाएगी क्योकि अब विदेशी शिक्षा संस्थान सरकार पर सब्सिडी खत्म करने के लिए दबाव देगें नतीजा उच्चशिक्षा ओर मंहगी होगी।
बहरहाल सरकार का यह कदम आने वाले दिनो मे  क्या उच्चशिक्षा को बेहतर कर  सकेगा फिल हाल यह तो भविष्य के गर्त मे है पर  इस विधेयक ने उच्चशिक्षा  केा बाजारू ताकतों के हवाले कर दिया है इसमें कोई संदेह नही है। 
 
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