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नारद निराले हैं, बेजोड़ हैं
हृदयनारायण दीक्षित
प्राचीन भारतीय वाड्.मय के पात्र-चरित्र रहस्यपूर्ण हैं। अधिकांश ऐतिहासिक हैं। प्रेरक हैं, उच्चतर काव्य सर्जना ने उन्हें और भी दिलचस्प बनाया है। लेकिन नारद निराले हैं, बेजोड़ हैं, रोचक भी हैं। पुराण कथाओं वाले नारद चुगुलखोर जैसे हैं, विग्रह विशारद हैं लेनि विश्व के प्राचीनतम ज्ञान अभिलेख ऋग्वेद के नारद द्रष्टा ऋषि हैं। ऋग्वेद में उनके रचे, देखे दो सूक्त (9.104 व 105) हैं। यहां वे एक अन्य ऋषि पर्वत काण्व के साथ हैं। दोनो ऋषि मित्रों ने मिलकर सोम की स्तुति की है, कहते है ‘हे सोम! आप तेजस्वी हैं हमें भी तेजस्वी बनांए। जैसे मित्र एक दूसरे को प्यार करते हैं वैसे ही आप भी मुझे प्यार करे - सखेव सख्ये नर्यो रूचे भव। (9.104.5) स्तुति है “आप पुरातन सुखों को हमारे लिए प्रकट करें। (वही, 6) ऋग्वेद के 8वें मण्डल में नारद का एक स्वतंत्र सूक्त (8.13) भी है। वे यहां इन्द्र की स्तुति में 33 मन्त्र गाते हैं, प्रार्थना है कि इन्द्र उत्तम कर्म करने वालों को ऐश्वर्यशाली बनाए (8.13.7) यहां श्रेष्ठ कर्म करने वाले लोगों को पुरूस्कृत किए जाने की नारद की स्तुति ध्यान देने योग्य है। नारद ऋग्वैदिक ऋषि हैं। ऋग्वैदिक काल हजारों वर्ष प्राचीन हैं इसलिए महाभारत या पुराण काल वाले नारद से उन्हें भिन्न समझना चाहिए। संभवतः ऋग्वेद वाले नारद के नाम पर बाद में वे एक संस्था बन गये। आचार्य श्रीराम शर्मा ने ऋग्वैदिक संहिता के अनुवाद (परिशिष्ट 1, पृष्ठ 4) में नारद काण्व का विशेष उल्लेख किया है “ये कण्व ऋषि के वंशज हैं इसी कारण इन्हें काण्व संज्ञा प्राप्त हुई है।” नारद के हाथ मंे वीणा है, वे गायन शास्त्र के ज्ञाता है। सामवेद में भी उनके रचे मन्त्रों (मन्त्र 568-69 व 574-75) का संकलन है। सायण ने ऋग्वेद (9.104 व 105) के भाष्य में नारद को पर्वत काण्व का मित्र बताया है - सखाय पर्वत नारदौ। नारद अथर्ववेद में भी हैं पर उनके साथ काण्व परिचय नहीं है। महाभारत (सभा पर्व, 5वाँ अध्याय) में नारद का खूबसूरत परिचय है “वे वेद उपनिषद, दर्शन के ज्ञाता हैं, इतिहासविद् है पुराणों के जानकार हैं, वे न्यायविद् हैं, प्रमाणकृत निश्चयः - प्रमाण के आधार पर ही निश्चय करते है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के ज्ञाता है। अंध आस्थावादी नहीं हैं। सांख्य योग को क्रमानुसार जानते हैं। सबसे खास बात यह है कि वे संधि और विग्रह के तत्ववेत्ता है। अपने और शत्रु पक्ष के बल का अनुमान लगाते हैं। शत्रु पक्ष के मंत्रियों आदि को फोड़ लेने वाली विद्या में पारंगत हैं”। नारद युधिष्ठिर की सभा में आए। युधिष्ठिर से पूछा “चिन्तयसि अर्थम् - क्या आप अर्थ चिंतन करते हैं?” नारद अर्थशास्त्र के भी ज्ञाता है। नारद स्मृति में भी अर्थशास्त्र का विवेचन है। नारद के अनुसार राजा को अर्थ चिन्तन करना चाहिए, अर्थशास्त्र का ज्ञाता भी होना चाहिए। यहां प्रश्नवाचक ढंग से अर्थशास्त्र की उपयोगिता है। वे आगे सुझाव देते हैं, “राजा को धर्म अर्थ के ज्ञाता वृद्धों से परामर्श लेते रहना चाहिए।” नारद युधिष्ठिर से सवाल पूछते हैं “क्या किसान प्रसन्न रहते हैं? किसान का अन्न बीज खराब तो नहीं होता? क्या किसान को कम ब्याज पर ऋण मिलता है? सेना को नियमित वेतन मिलता है? समय पर वेतन न पाकर मृत्युगण कोप में आते है। क्या विशेष पुरूषार्थी के लिए विशेष सम्मान की व्यवस्थाए हैं? क्या विद्वानों के लिए यथायोग्य धन की व्यवस्था है? आदि। नारद अर्थवेत्ता हैं। कृषि विज्ञान में पारंगत हैं। राज्य व्यवस्था के संचालन सूत्रों से सुपरिचित हैं। उनकी और युधिष्ठिर की बातचीत एक ज्ञानी और राजा का सम्वाद है। आधुनिक काल के पत्रकार ऐसी ही प्रश्नावली मंत्रिगणों शासकों के लिए भी बनाते हैं। नारद आधुनिक पत्रकारों की प्रेरणा हैं। सुसंगत प्रश्नावली राजा, राज्य व्यवस्था को तंग करती है, सुझाव मूलक सत्य तथ्य का ज्ञान भी कराती है। प्रश्न काटते है समाधान भी देते है। नारद प्रश्नकर्त्ता विद्वानों के हीरो हैं। नारद घुमंतू ऋषि हैं। देशकाल की सीमांए उन्हें रोक नहीं पाती। पुराणकथाओं वाले नारद सभी लोकों में भ्रमण करते दिखाई पड़ते हैं लेकिन तुलसीदास की रामचरितमानस में उन्होंने हिमालय की एक गुफा में ध्यान लगाया। योगध्यान एकान्तिक साधना है लेकिन एकान्तिक साधना में इन्द्रियां और प्रबल होती हैं। कामदेव सक्रिय हो गये। बसंत आ गया, फूलखिले, भौंरे गूंजे, कोयल बोली, हवांए मस्त हो गयीं। इन्द्रियां अपना संसार रचती हैं, गीत, गान भी सुनाई पड़ने लगे। लेकिन नारद ने योगध्यान के जरिए इन्द्रियजाल पर विजय पाई। कथा के अनुसार नारद को अहंकार आया उन्होंने शिव को काम जीतने की अपनी विजयगाथा सुनाई। शिव ने कहा ऐसा अन्यत्र न कहना। स्वयं की प्रशंसा उचित नहीं होती। उन्होंने यही कथा विष्णु को भी सुनाई। विष्णु ने नारद के मन का अभिमान दूर करने के लिए फौरन एक नगर बनाया। नगर के राजा के घर स्वयंम्बर का आयोजन हो गया। नारद उसकी पुत्री पर मोहित हो गये। उन्होंने विष्णु से अपने सुन्दर रूप की प्रार्थना की जेहि विधि नाथ होई हिवमोरा, करूऊ से वेगि दास मै तोरा। विष्णु नारद के हितैषी थे। उन्होंने उन्हें कुरूप बना दिया। स्वयंम्बर में विष्णु स्वयं आये, कन्या ने उन्हें चुना। नारद ने अपना रूप देखा, खफा हो गये। विष्णु को हड़काया और शाप दिया, “मनमानी करते हो, अबकी दफा हमसे पाला पड़ा है। बन्दर का रूप हमें दिया है, स्त्री वियोग दिया है, तुमभी स्त्री वियोग में मारे मारे फिरोगो।” विष्णु ने मायाजाल हटाया, वहां नगर, स्त्री, राजा रानी कोई था ही नहीं। तुलसीदास भक्त कवि है, निष्कर्ष है “सुर नर मुनि कोऊ नाहि, जेहिन मोह माया प्रबल - माया मोह, सभी मनुष्यों, देवों ऋषियों मुनियों को भी तंग करता है। नारद उच्चस्तरीय प्रतिभा का भारतीय प्रतीक हैं। वे परम ज्ञानी है लेकिन संसार के रागद्वेष उन्हें भी तंग करते हैं। नारद हार नहीं मानते। छान्दोग्य उपनिषद् के 7वे प्रपाठक में नारद की मनोव्यथा और आत्मतत्व प्राप्ति की इच्छा का वर्णन है। नारद ने सनत्कुमार से कहा, “मन्त्रविदेवास्मि नात्मवित् - मन्त्र जानता हूँ लेकिन आत्मविद् नहीं हूँ। मैं शोकग्रस्त हूँ, मैंने सुना है कि आत्मा को जानने वाला शोक से पार हो जाता है, आप मुझे शोक से पार करें।” (7.1.3) सनत् कुमार ने नारद से शिक्षा पूछी। नारद ने बताया “ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास पुराण, पिन्न्य, राशि, दैव निधि, वाक्योवाक्य, एकायन, देवविद्या, ब्रह्मविद्या, भूत विद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या, सर्प और देवजन विद्य पढ़ा हूँ।” (वही 2) नारद द्वारा बताए गए विषयों से प्राचीन भारत के उपनिषद्काल की शिक्षा व्यवस्था की झलक मिलती है। यहां नारद के प्रकाण्ड विद्वान होने के सबूत भी हैं। सनत्कुमार ने कहा “आपका अध्ययन केवल ‘नाम’ है।” सारी विद्यांए संज्ञा है, शब्द हैं, अध्ययन बुद्धिगत है अनुभूतिपरक नहीं है। नारद से पूछा नाम (शब्द-ज्ञान) से बड़ा क्या है? सनत्कुमार ने बताया “वाणी नाम से बड़ी है, वही पूरी विद्या को धारण करती है।” (7.2.1) ठीक बात है, बहुत सारे विद्वान पढ़ जाते है, लेकिन पढ़े हुए को वाणी में धारण नहीं कर पाते। सनत्कुमार ने कहा, “वाणी से भी बड़ा मन है।” (7.3.1) मन की प्रेरणा से ही वाणी बोलती है। सनत्कुमार ने इसी तरह संकल्प को मन से बड़ा बताया फिर चित्त को संकल्प से बड़ा और ध्यान को चित्त से बड़ा बताया। ध्यान संकल्प लाता है, संकल्प से चित्त दशा शुद्ध होती है, चित्त से मन नियंत्रित होता है, मन से वाणी प्रेरित होती है, वाणी में नाम-पढ़े हुए विषय प्रकट होते हैं। सनत्कुमार ने बताया लेकिन ध्यान से भी बड़ा विज्ञान है। यहां विज्ञान सम्यक ज्ञान है। सम्यक ज्ञान पर ही ध्यान लगाना ठीक होता है सनत्कुमार ने कहा लेकिन बल विज्ञान से बड़ा है, फिर बताया कि बल से अन्न बड़ा है। अन्न से जल बड़ा है। जल से तेज बड़ा है। तेज से आकाश बड़ा है। आकाश से स्मृति बड़ी है। नारद ने पूछा “क्या स्मृति से भी कोई तत्व बड़ा है, मुझे वही बताइए - तन्मे ब्रवीवित्वति। (7.13.2) सनत्कुमार ने बताया ‘आशा स्मृति से बड़ी है, आशा से भी बड़ा प्राण है। प्राण ही सर्वस्व है।” (7.15.4) सनत्कुमार ने बताया “सत्य जानने की इच्छा जिज्ञासा करनी चाहिए। जिज्ञासा मनन कराती है, इसके लिए श्रद्धा चाहिए, श्रद्धा के लिए निष्ठा चाहिए। निष्ठा से कर्त्तव्य है। कर्त्तव्य में सुख लाभ है। नारद ने प्रतिप्रश्न किया “सुख क्या है?” सनत्कुमार ने बताया “यो वे भूमा तत्सुखं - जो सीमाहीन है, विराट है, वही भूमा है, वही सुख है। नाल्पे सुखमस्ति - पूर्णता से थोड़ी सी भी अल्पता सुख नहीं है। नारद ने पूछा ‘भूमा का क्या आधार है, कहां स्थित है? सनत्कुमार ने कहा “स्वे महिम्नि, यदि वा न महिम्नीति - स्वयं की महिमा में या किसी भी महिमा में नहीं।” महाभारत वाले नारद युधिष्ठिर से प्रश्न करते हैं, उनके प्रश्न सुझाव मूलक हैं। छान्दोग्य उपनिषद् वाले नारद सुयोग्य शिष्य हैं, वे आचार्य से प्रश्नों की झड़ी लगाते हैं। वे तत्ववेत्ता हैं। पुराणकाल वाले नारद विग्रह विशारद हैं। नारद हम सबको आश्चर्यचकित करते हैं और प्रश्नाकुल बनाते हैं। नारद पत्रकारिता का गौरीशंकर शिखर हैं, प्रेरक हैं, प्राण हैं और विराट भी हैं। उन्हें शतशः नमन।
 

 

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