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ना काहू से बैर,वाले कबीर के अनुयायी कोर्ट में

 संजीत त्रिपाठी
रायपुर, फरवरी। ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर कहने वाले  कबीर दास ने कभी सोचा भी नहीं रहा होगा कि उनके बाद उनके नाम से न केवल पंथ चलेगा बल्कि उनकी गद्दी के अनुयायी आपस में लड़ते भी रहेंगे। अभी हाल ही में छत्तीसगढ़ के दामाखेड़ा में दो आश्रम के अनुयायियों के बीच फिर एक बार वाद-विवाद हुआ और मामला पुलिस तक पहुंच गया। इससे पहले भी छत्तीसगढ़ में कबीर के अनुयायी पुलिस और कोर्ट तक जा पहुंचे हैं। अगर इतिहास पर नजर डालें तो हिंदी के विद्वानों में इस बात को लेकर मतभिन्नता रही कि कबीर ने अपने नाम से किसी पंथ का प्रचलन किया या नहीं। डॉ के एन द्विवेदी ने अपना मत देते हुए लिखा है,"कबीरपंथ की कतिपय रचनाओं में इस बात का उल्लेख हुआ है कि कबीर ने अपने प्रधान शिष्य धनी धर्मदास को पंथ स्थापना का आदेश देकर उनके वंश को गद्दी का उत्तराधिकारी होने का आशीर्वाद दिया था"।
वहीं आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है,"कबीर ने भारतीय ब्रह्मवाद के साथ सूफियों के भावात्मक रहस्यवाद, हठयोगियों के साधनात्मक रहस्यवाद और वैष्णवों के अहिंसावाद तथा प्रपंक्तिवाद का मेल करके अपना पंथ खड़ा किया"।
लेकिन उपरोक्त कथनों के समक्ष यदि हम कबीर के अनासक्त व्यक्तित्व और जीवन चरित को देखें तो यह कहना सही नही लगता कि वे अपने नाम से स्वयं पंथ शुरु कर चलाएं हों। जो सभी पंथ एवं संप्रदाय को समाप्त कर शुद्ध मानवता का प्रकाश चाहता रहा हो वह खुद एक नया पंथ क्यों खड़ा करेगा। अत: हम यह कह सकते हैं कि कबीर के विचारों के अनुयायियों के लिए एक स्वतंत्र संप्रदाय एवं पंथ की रचना की आवश्यक्ता हुई होगी और यही कबीरपंथ के नाम से फलित हुआ।
'बीजक' कबीरपंथ का प्रामाणिक धर्मग्रंथ माना जाता है। इसमे कुछ ऐसे संकेत प्राप्त होते हैं जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि कबीर पंथ स्थापना के कट्टर विरोधी थे, वे आचार्य या मठाधीश नही बनना चाहते थे। जैसा कि सर्वविदित है कबीर के शिष्यों की संख्या काफी थी। बताया जाता है कि इनमें से चार शिष्यों जागू साहेब,भगवान साहेब,श्रुतिगोपाल साहेब और धनी धर्मदास साहेब महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इनके साथ ही दो और शिष्यों तत्वा और जीवा का नाम भी बड़े आदर के साथ लिया जाता है। संभवत: इन्ही शिष्यों ने मिलकर कबीर के नाम पर कबीर पंथ की स्थापना की होगी। प्रारंभ में यह संक्षिप्त स्वरूप में रहा होगा और आगे चलकर समय बीतने के साथ-साथ इस पंथ का स्वरूप अधिक बड़ा और व्यवस्था संपन्न होता चला गया।
कबीर पंथ की विविध शाखाएं-
कबीरपंथ का आविर्भाव तत्कालीन सामाजिक व धार्मिक व्यवस्था के प्रति विद्रोह का प्रतीक था। कबीरपंथ इस समय अनेक शाखाओं-उपशाखाओं में विभाजित है। इनमें से कुछ शाखाएं अपनी शुरुआत से ही स्वतंत्र हैं तो कुछ ऐसी है जो पहले स्वतंत्र शाखाओं से संबद्ध थी किन्तु बाद में संबंध विच्छेद कर लिया। कई ऐसी भी शाखाएं विद्यमान हैं जिनका संबंध कबीरपंथ से नही है लेकिन कबीरपंथी महात्मा इनका मूल स्त्रोत कबीर या कबीरपंथ से ही मानते हैं।
अभिलाष दास ने अपनी किताब 'कबीर दर्शन' में कबीरपंथ की चार शाखाओं का उल्लेख किया है। प्रथम श्री श्रुतिगोपाल साहेब,काशी कबीर चौरा। द्वितीय श्री भगवान साहेब कबीर मठ धनौती। तृतीय श्री जागू साहेब कबीरमठ विद्रुपुर और चतुर्थ श्री धर्मदास साहेब छत्तीसगढ़ी शाखा(वर्तमान में दामाखेड़ा)।
 
विस्तृत अध्ययन एवं निष्कर्षों के आधार पर कबीर पंथ की तीन ही प्रमुख शाखाएं मानी जाती हैं।
 
1- कबीर चौरा काशी
कबीर पंथ की शाखाओं में यह पहली शाखा मानी जाती है जिसकी स्थापना सूरत गोपाल (श्री श्रुतिगोपाल) ने की थी। इसकी शाखाएं पूरे भारत में फैली हैं जिसमें मुख्य रूप से लहरतारा,मगहर,बलुआ, गया,बड़ौदा,नड़ियाद,अहमदाबाद है।
 
2- कबीरपंथ की भगताही (धनौती) शाखा
बिहार के छपरा जिले में स्थित धनौती ग्राम में भगताही शाखा का प्रधान मठ है। इस शाखा के प्रथम आचार्य श्री भगवान साहेब थे। इसकी शाखाएं बिहार के साथ-साथ पूरे भारत में यहां-वहां फैली है जिनमें प्रमुख नौरंगा,मानसर,दामोदरपुर,चनाव(छपरा) शेखावना(बेतिया) तधवा,बड़हरवा,सवैया,बैजनाथ(मोतिहारी, लहेजी और तुर्की है।
 
3- कबीरपंथ की छत्तीसगढ़ी शाखा
इस शाखा के प्रवर्तक धनी धर्मदास जी थे। जिनका जन्म मध्यप्रदेश के रींवा जिले में बांधवगढ़ में हुआ था। पूर्व में मूर्तिपूजक वैष्णव मत के अनुयायी थे। प्रौढ़ावस्था में तीर्थयात्रा पर गए और वहीं मथुरा में इनकी मुलाकात कबीर से हुई। कबीर से प्रभावित होकर धर्मदास ने मूर्तिपूजा आदि छोड़ दी व उन्हें अपने घर बांधवगढ़ आमंत्रित किया, पत्नी व बच्चों सहित दीक्षा ले ली।
बताया जाता है कि जब धर्मदास साहेब ने जिनका दीक्षा से पूर्व नाम जुड़ावन प्रसाद था, बांधवगढ़ में संत समागम आयोजित किया था और वहां कबीर भी उनके आमंत्रण पर पधारे थे। इसी दौरान धर्मदास ने कबीर के कहे अनुसार अपने पूर्व गुरु रूपदास जी से इजाजत लेकर पत्नी सुलक्षणा देवी और बच्चों नारायणदास व चूरामणि समेत दीक्षा ली। दीक्षा के बाद सुलक्षणा देवी आमिन माता व चूरामनि, मुक्तामणि के नाम से जाने गए। कबीर नें धर्मदास को सारी संपत्ति दान करने के बाद ही धनी कहकर संबोधित किया तब से उन्हें धनी धर्मदास ही कहा जाने लगा। 
 
कहते हैं कबीर ने धनी धर्मदास को पंथ की स्थापना का आशीर्वाद दिया और उनके लड़के मुक्तामणि(चूरामणि) को इस पंथ की वंशगद्दी का पहला आचार्य बताते हुए बयालिस वंश तक वंशगद्दी चलाने का आशीर्वाद दिया।
धर्मदास सुनियो चितलाई, तुम जनि शंका मानहू भाई। 
हमरे पंथ चलाओ जाई, वंश बयालिस अटल अधिकाई।।
वंश बयालिस अंश हमारा, सोई समरथ वचन पुकारा।
वंश बयालिस गुरुवाई दीना, इतना वर हम तुमको दीना।।
 
और 
 
मान बढ़ाई तुमको दीन्हा,जगत गुरु चूरामनि कीन्हा।
हमरो वचन चूरामनि सारा,वंश अश बयालिस अधिकारा॥
 
वहीं जब कबीर के समक्ष धर्मदास के मन में आने वाले बयालिस वंश के नाम जानने की जिज्ञासा हुई और उन्होने इस बारे में कबीर से पूछा तो कबीर ने उन्हें बयालिस वंश के नाम बताए।
वचन चूरामनि प्रथम कहि,बहुरि सुदर्शन नाम।
कुलपति नाम प्रमोध गुरू,नाम गुण धाम॥ 
नाम अमोल कहावपुनि,सूरति सनेही नाम। 
हक्कनाम साहिब कहौ,पाकनाम परधाम॥ 
प्रकटनाम साहेब बहुरि,धीरज नाम कहुं फेर। 
उग्रनाम साहिब कहूं,दयानाम कह टेर॥ 
गृन्धनाम साहिब तथा नाम प्रकाश कहाय।
उदित मुकुन्द बखानियो,अर्ध नार्म गुणगाय॥
ज्ञानी साहेब हंसमनि सुकृत नाम अज्रनाम। 
रस अगरनाम गंगमनि पारसनाम अमीनाम॥
जागृतनाम अरू भृंगमणि अकह कंठमनि होय।
पुनि संतोषमनि कहूं,चातृक नाम गनोय।। 
आदिनाम नेहनाम है,अज्रनामण महानाम।
पुनि निजनाम बखानिये,साहेब दास गुणधाम। 
उधोदास करूणामय पुनि,दृगमनि हंस42।
मुक्तामणि धर्मदास के,विदित ब्यालिस वंश॥
 
 
ब्रम्हलीन मुनि, कबीर चरितम में कहते हैं कि धर्मदास साहेब के बड़े लड़के नारायण दास ने अपनी वंश गद्दी की स्थापना बांधवगढ़ में ही की जो कि नौ पीढ़ियों के बाद प्रभावशाली नही रही जबकि छोटे लड़के चूरामणि ने मुक्तामणि के नाम से अपनी वंशगद्दी की स्थापना छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के ग्राम कुदुरमाल में की जिसे वंशगद्दी परंपरा का मुख्य केंद्र माना गया है।
 
भारत में भिन्न-भिन्न स्थानों में स्थित इस शाखा के प्रसिद्ध मठों के नाम इस तरह हैं। 
कुदुरमाल,रतनपुर,मण्डला, धमधा, कवर्धा, दामाखेड़ा,बमनी,हरदी,धनौरा,कबीर मन्दिर मऊ,सहनिया(छतरपुर),सिंघोड़ी,छोटी बड़ैनी(दतिया) कबीर मन्दिर(नानापेट पूना),गरौठा(बुन्देलखण्ड),कबीर आश्रम जामनगर,दार्गिया मुहल्ला सूरत,लाल दरवाजा (सूरत), कबीर मन्दिर सीनाबाग बड़ौदा,अहमदाबाद,खैरा(बिहार),खांपा(नागपुर),बंगलौर,जालौन व खरसिया जहां कि विक्रम संवत 1990 में नादवंश स्थापित हुआ।
 
 
 
कुदुरमाल से कवर्धा और फिर दामाखेड़ा का सफर
कुदुरमाल के बाद गद्दियां रतनपुर, मंडला, धमधा, सिगोढ़ी, कवर्धा आदि में स्थापित हुई। अंतत: बारहवें महंत उग्रमुनि नाम साहेब ने विक्रम संवत् १९५३ में रायपुर जिले के दामाखेड़ा में मठ स्थापित किया।
तथ्य यह भी है कि कबीरपंथ के आठवें वंशाचार्य श्री हक्कनाम साहेब ने कवर्धा में वंशगद्दी स्थापित की। कवर्धा गद्दी पर उनके बाद उनके बेटे पाकनाम साहेब ने गद्दी संभाली फिर प्रगटनाम साहेब और धीरजनाम साहेब ने संभाली। इसी दौरान कवर्धा वंशगद्दी के लिए दादी साहेब उर्फ धीरजनाम साहेब(प्रगटनाम साहेब के भतीजे) और उग्रनाम साहेब के बीच बम्बई हाई कोर्ट में मुकदमा चला जिसमें जीत धीरजनाम साहेब की हुई। अर्थात कवर्धा गद्दी के उत्तराधिकारी धीरजनाम साहेब हुए। मुकदमा हार जाने के बाद उग्रनाम साहेब ने कवर्धा छोड़ दिया और रायपुर जिले के दामाखेड़ा में धर्मगद्दी का स्थानांतरण कर दिया। उग्रनाम साहेब के समय से ही छत्तीसगढ़ मे कबीरपंथ के अनुयायियों की संख्या कवर्धा आदि गद्दी की बजाय दामाखेड़ा गद्दी की ओर झुकती गई और अब यह सबसे प्रमुख केंद्र है।
 
दामाखेड़ा में कबीरपंथ वंशगद्दी की स्थापना के लिए ग्राम दामाखेड़ा को तब 14000 रूपए में बेमेतरा के कुर्मी भक्तों ने खरीदा था। यहां हर साल माघ शुक्ल दशमी से पूर्णिमा तक विशाल संत समागम व मेला का आयोजन होता है जिसमें देश-विदेश से श्रद्धालु-भक्त-व कबीर प्रेमी पहुंचते हैं।
 
दामाखेड़ा में वंशगद्दी की स्थापना बारहवें गुरु उग्रनाम साहेब ने की जिसमें आगे चलकर चौदहवें गुरु गृन्धमुनि साहेब भी हुए जिन्होने 18 फरवरी 1992 तक गद्दी संभाली। कहते हैं कि गृन्धमुनि साहेब के समय में छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ ने जितनी प्रगति की उतनी अन्य किसी आचार्य के समय में नही हुई। वर्तमान में पंद्रहवें वंशाचार्य श्री प्रकाशमुनि साहेब हैं।
 
1982-85 के एक सर्वेक्षण के अनुसार विभिन्न शाखाओं के कबीरपंथ के अनुयायियों की संख्या देश भर में 96 लाख थी जिसका सबसे बड़ा हिस्सा दामाखेड़ा वंशगद्दी का 33.5 फीसदी था। अर्थात कबीरपंथ की सभी शाखाओं में छत्तीसगढ़ी शाखा दामाखेड़ा गद्दी का प्रचार क्षेत्र सबसे बड़ा है और पंथ प्रचार में इसे सर्वाधिक सफलता मिली है।
 
वेद पुराण सब झूठ है,हमने इसमें पोल देखा।
अनुभव की बात कहे कबीरा,घट का परदा खोल देखा॥
 
 
छत्तीसगढ़ में धनी धर्मदास द्वारा स्थापित कबीरपंथ की वंशगद्दी में अब तक चौदह गुरु हो चुके हैं तथा वर्तमान में पंद्रहवें आचार्य गद्दी पर विराजमान हैं जिनका ब्यौरा इस तरह है-
1- मुक्तामणि नाम साहेब विक्रम संवत 1538 से 1630
2- सुदर्शन नाम साहेब विक्रम संवत 1595 से 1630
3- कुलपत नाम साहेब विक्रम संवत 1652 से 1690
4- प्रमोद गुरु बालापीर साहेब विक्रम संवत 1728 से 1750
5- केवल नाम साहेब विक्रम संवत 1760 से 1775
6- अमोल नाम साहेब विक्रम संवत 1782 से 1825
7- सुरत सनेही नाम साहेब विक्रम संवत 1802 से 1853
8- हक्क नाम साहेब विक्रम संवत 1835 से 1890
9- पाक नाम साहेब विक्रम संवत 1855 से 1912
10- प्रकट नाम साहेब विक्रम संवत 1875 से 1939
11-धीरज नाम साहेब विक्रम संवत 1899 से 1937
(धीरज नाम साहेब गद्दीनशीन नही हुए क्योंकि इनका सतलोक गमन प्रकटनाम साहेब से पहले ही हो गया था)
12- उग्रनाम साहेब विक्रम संवत 1929 से संवत 1971
13- दया नाम साहेब विक्रम संवत 1956 से 1984
14- गृन्धमुनि नाम साहेब विक्रम संवत 1922( सन 1935 ) से सन 1992 तक
15- प्रकाश मुनि नाम साहेब जिनका जन्म हुआ सन 1967 में, 1990 में गद्दीनशीन हुए व वर्तमान में यही दामाखेड़ा के पंद्रहवें वंशगद्दी आचार्य हैं।
 
 
 
मै कहता सुरझावन हारी,तू राख्यो अरुझाई रे।
मै कहता तू जागत रहियो, तू जाता है सोई रे।।
 
वह बातें जो छत्तीसगढ़ के कबीरपंथ की पहचान हैं
1- छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ के अंतर्गत यहां एक विशिष्ठ प्रकार की मठ व्यवस्था प्रचलित है।
2- गुरु की संतान गद्दी की उत्तराधिकारी होती है।
3- अधिकांश कबीरपंथी श्वेत वस्त्र धारण करते हैं क्योंकि उनन्के अनुसार यह आभ्यांतरिक शुद्धि और ज्ञान का प्रतीक है।
4- कबीरपंथी धोती व अचला धारण करना त्यागी और निरक्त जीवन का चिन्ह मानते हैं। ये गले में तुलसी की माला धारण करते हैं, औरतें भी कण्ठी धारण करती हैं।
5- कबीरपंथी द्वादश तिलक लगाते हैं। यह तिलक न्यायपूर्ण जीवन का प्रतीक माना जाता है।
6- कबीरपंथी अपने महात्मा या गुरुओं को तीन बार बंदगी करते है।
7- छत्तीसगढ़ी कबीरपंथी शाखा में पूर्णिमा का विशेष महत्व है। उनका यह विश्वास है कि जो व्यक्ति पूर्णिमा के दिन यह व्रत रखते है उन्हें ॠद्धि-सिद्धि, भक्ति व मुक्ति प्राप्त होती है।
8- चौका आरती को कबीरपंथ में महत्वपूर्ण विधान माना जाता है।
9- कबीरपंथ के अनुसार शव को पृथ्वी में गाड़ देने का विधान है व इसके लिए विशेष विधि प्रचलित है।
 
जात न पूछौ साधु की, जो पूछौ तो ज्ञान। 
मोल करो तलवार का, परा रहन दो म्यान।। 
 
कबीरपंथ की कुछ शाखाओं में चौका आरती का विधान है और इसे मोक्ष साधन के लिए जरुरी माना जाता है। चौका आरती को कबीरपंथ का सात्विक यज्ञ भी कहा जाता है। आम तौर पर कबीरपंथ की चौका आरती के बारे में तो बहुतों ने सुना पढ़ा होता है लेकिन इसके अलावा और भी कुछ परंपराएं या रिवाज़ हैं। आईए देखें कि दामाखेड़ा में कबीरपंथ की और क्या परंपराएं या रिवाज़ हैं।
1-दीक्षित करने की विधि
2-पूर्णिमा व्रत 
3-चौका विधान- इसके अंतर्गत
-आनंदी चौका
-जन्मौती या सोलह सुत का चौका
-चलावा चौका 
-एकोत्तरी चौका
4-अंत्येष्टि क्रिया
5-नित्य कर्म विधि 
6-द्वादश तिलक
 
इसमें से हम अंत्येष्टि क्रिया और द्वादश तिलक के बारे मे थोड़ी चर्चा पहले ही कर चुके हैं अत: इनके विस्तार में न जाकर चौका आरती के के बारे में बात करते हैं।
 
चौका आरती की विधि केवल महंत ही संपन्न करवा सकते हैं। चौका करने के लिए जिस प्रकार किसी महंत की नियुक्ति आवश्यक है ,उसी प्रकार सर्व सामग्री को यथास्थान स्थापित करने के और चौके के कार्य में महंत को सहयोग देने के लिए दीवान का होना भी जरुरी है। चौका बनाने के सभी 'सुमिरन' दीवान को और महंत द्वारा किए जाने वाले चौका संबंधी कार्यों के समस्त सुमिरन महंत को कंठस्थ होने चाहिए । लग्नतत्व स्वरोदय और पान पहचाननें का ज्ञान भी महंत के लिए अपेक्षित है।
 
 
कबीर माला काठ की, कहि समझावे तोहि।
मन ना फिरावै आपनों, कहा फिरावै मोहि।। 
 
 
आनंदी चौका- किसी नवीन व्यक्ति के कबीरपंथ में दीक्षित होने के समय य आ अन्य प्रकार के आनंदोत्सव के निमित्त यह चौका कराया जाता है।
 
जन्मौती या सोलह सुत का चौका- संतान प्राप्ति की कामना अथवा पुत्र जन्म के उपलक्ष्य में यह चौका संपादित होता है।
 
चलावा चौका- मृत व्यक्ति की आत्मा की शांति के लिए चलावा चौका की विधि की जाती है।
 
एकोत्तरी चौका- जो विधि एक सौ एक पूर्वजों के शांति के लिए की जाती है उसे एकोत्तरी चौका कहा जाता है।
 
 
मूरख को समुझावते, ज्ञान गाँठ का जाई। 
कोयला होई न ऊजरो, नव मन साबुन लाई।।
 
लंबा मारग, दूरि घर, विकट पंथ, बहु मार। 
कहौ संतो, क्यूं पाइये, दुर्लभ हरि-दीदार॥
 
 
कबीर और धनी धर्मदास की स्मृति में दामाखेड़ा में हर साल आयोजित होने वाला 'संत समागम समारोह' खासा महत्व रखता है। इसमें हिस्सा लेने के लिए देश विदेश से कबीरपंथ के अनुयायी पहुंचते हैं।
इस समारोह के दौरान कार्यक्रम को इस तरह बांटा गया है।
1-बसंत पंचमी (गुलाल-उत्सव) 
2-संत समागम
3-भेंट बंदगी
4-सत्संग सभा
5-पंथश्री का प्रवचन
6-पूनों महात्म्य पाठ
7-आनंदी चौका आरती(सात्विक यज्ञ) 
8-सामूहिक चलावा चौका
9-सामूहिक दीक्षांत समारोह व पंजा वितरण
 
आईए देखें दामाखेड़ा के कुछ चित्र
 
 
`कबीर सब जग हंडिया, मांदल कंधि चढ़ाइ। 
हरि बिन अपना कोउ नहीं, देखे ठोकि बजाइ॥
 
 
`कबीर' कलिजुग आइ करि, कीये बहुत जो मीत ।
जिन दिलबाँध्या एक सूं, ते सुखु सोवै निचींत ॥
 
कामी लज्या ना करै, मन माहें अहिलाद । 
नींद न मांगै सांथरा, भूख न मांगै स्वाद ॥
 
 
माषी गुड़ मैं गड़ि रही, पंख रही लपटाइ । 
ताली पीटै सिरि धुनैं, मीठैं बोई माइ ॥
 
 
घूँघट का पट खोल रे, तोको पीव मिलेंगे।
घट-घट मे वह सांई रमता, कटुक वचन मत बोल रे॥
धन जोबन का गरब न कीजै, झूठा पचरंग चोल रे।
सुन्न महल मे दियना बारिले, आसन सों मत डोल रे।।
जागू जुगुत सों रंगमहल में, पिय पायो अनमोल रे।
कह कबीर आनंद भयो है, बाजत अनहद ढोल रे॥
 
 
जाति-पांति पूछै न कोई।
हरि का भजै सो हरि का होई॥
छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ ने सर्वाधिक प्रभाव निचली या पिछड़ी जातियों पर ही डाला,लेकिन ऐसा नही है कि उच्च या सवर्णों पर कबीरपंथ का प्रभाव पड़ा ही नही। अब तक हुए वंशगद्दी आचार्यों में से एक-दो का विवाह ब्राम्हणी कन्या से होने का उल्लेख मिलता है। किसी ब्राम्हणी कन्या का विवाह किसी कबीरपंथी से होना तभी संभव प्रतीत होता है जब वह ब्राम्हण परिवार स्वयं भी कबीरपंथ का अनुयायी हो। दर-असल कबीरपंथ जब छत्तीसगढ़ में अपने पांव पसार रहा था तब की सामाजिक स्थिति ऐसी थी कि निचली जातियां सवर्णों से प्रताड़ित थीं और जाति-पांति का बंधन बहुत ज्यादा था। इसलिए कबीरपंथ के अनुयायी वही ज्यादा बने। जैसे कि सिदार,ढीमर, तेली,अहीर, लोधी, कुम्हार, रावत,पटवा, साहू,वैश्य,कुर्मी,कोष्टा और मानिकपुरी जिसे पनका या पनिका भी कहा जाता है। इनमें एक दोहा प्रचलित है।
पानी से पनिका भये,बूंदों रचा शरीर।
आगे-आगे पनका गये,पाछे दास कबीर।।
 
उनकी मान्यता है कि पनिका का उद्भव पानी से हुआ है - उनका शरीर पानी से बना है। पनिका मार्ग का नेतृत्व करते हैं और संत कबीर उनका अनुशरण। लगभग सभी पनिका कबीर पंथी हैं। पनिका शब्द की उत्पत्ति (पानी + का) से हुआ है। जैसा कि जाना जाता है जनमते ही मां ने कबीर को त्याग दिया था। मां ने एक पत्ते से कबीर को लपेटकर एक तालाब के पास छोड़ दिया था। बच्चे के रोने की आवाज सुनकर किसी और मां ने उठा लिया और उसने अपनी संतान की तरह उन्हें पाला -पोसा। क्योंकि वह शिशु पानी की सतह पर मिला था, जो आगे चलकर कबीर के नाम से प्रसिद्ध हुआ, इसलिए पनिका अपने को पनिका (पानी + का) कहने में गर्व का अनुभव करते हैं।
 
 
 
 
हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ?
रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ?
जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते,
हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या ?
खलक सब नाम अनपे को, बहुत कर सिर पटकता है,
हमन गुरनाम साँचा है, हमन दुनिया से यारी क्या ?
न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से,
उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ?
कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से,
जो चलना राह नाज़ुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या ?
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बैरागी बिरकत भला, गिरही चित्त उदार ।
दुहुं चूका रीता पड़ैं , वाकूं वार न पार ॥1॥
`कबीर' हरि के नाव सूं, प्रीति रहै इकतार ।
तो मुख तैं मोती झड़ैं, हीरे अन्त न फार ॥2॥
ऐसी बाणी बोलिये, मन का आपा खोइ ।
अपना तन सीतल करै, औरन को सुख होइ ॥3॥
कोइ एक राखै सावधां, चेतनि पहरै जागि ।
बस्तर बासन सूं खिसै, चोर न सकई लागि ॥4॥
जग में बैरी कोइ नहीं, जो मन सीतल होइ ।
या आपा को डारिदे, दया करै सब कोइ ॥5॥
आवत गारी एक है, उलटत होइ अनेक ।
कह `कबीर' नहिं उलटिए, वही एक की एक ॥6॥
 
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अरे दिल,
प्रेम नगर का अंत न पाया, ज्यों आया त्यों जावैगा।।
सुन मेरे साजन सुन मेरे मीता, या जीवन में क्या क्या बीता।।
सिर पाहन का बोझा लीता, आगे कौन छुड़ावैगा।।
परली पार मेरा मीता खडि़या, उस मिलने का ध्यान न धरिया।।
टूटी नाव, उपर जो बैठा, गाफिल गोता खावैगा।।
दास कबीर कहैं समझाई, अंतकाल तेरा कौन सहाई।।
चला अकेला संग न कोई, किया अपना पावैगा।
 
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रहना नहीं देस बिराना है।
यह संसार कागद की पुडि़या, बूँद पड़े घुल जाना है।
यह संसार कॉंट की बाड़ी, उलझ-पुलझ मरि जाना है।
यह संसार झाड़ और झॉंखर, आग लगे बरि जाना है।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, सतगुरू नाम ठिकाना है।
 
 
रचना स्त्रोत
1-छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ का ऐतिहासिक अनुशीलन-डॉ चंद्रकिशोर तिवारी
2-कबीर धर्मनगर दामाखेड़ा वंशगद्दी का इतिहास-डॉ कमलनयन पटेल
 
 

 गीताश्री 

पाकुड़, झारखंड,फरवरी। सुशांति मरांडी अब कभी अपनों का भरोसा नहीं कर पाएगी। उसे गैरो ने नहीं, अपनों ने छला है। जब 6 साल की थी तब उसके पिता की मौत खेत में हल चलाते समय ठनका यानी बिजली गिरने से हो गई। इस घटना के छह महीने भी नहीं हुए कि सुशांति ने अपनी मां खो दी। नन्हीं सी जान पर इतनी कम उम्र में ही दुख का पहाड़ टूट पड़ा। 
उस समय वह अकेली, बेसहारा-सी पड़ी थी। दूर के एक रिश्तेदार ने उसकी सुध ली। खुद को उसका भाई बताते हुए अपने साथ चलने को कहा। अनाथ और बेसहारा लड़की उंगली थामे चल पड़ी। क्या पता था कि आसान और चैन वाली जिंदगी की तलाश उसे किसी अंधेरे गुफा की तरफ ले जा रही है।उस कथित भाई ने सुशांति को दिल्ली ले जाकर एक पंजाबी परिवार में छोड़ दिया, इस वायदे के साथ कि वह 2-3 दिन में अपना काम करके लौट कर आयेगा। सुशांति इतनी कच्ची उम्र में कुछ समझ नहीं पाई। उस घर में काम करते हुए जिंदगी के 7 साल बिता दिए। 
वह कथित भाई कभी ना लौटा। गांव छूटा, बचपन गया और यातना का सिलसिला शुरु हुआ। रोज शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न के बीच जेहन में गांव का नाम अब भी बसा हुआ था। एक दिन सामान लेने के बहाने बाहर निकली, दुकानदार की मदद से रेलवे स्टेशन और फिर अपने गांव लौट आई। मगर सुशांति के जीवन में जैसे शांति की कोई जगह ही नहीं थी। अपने गांव में भी तिरस्कार और मुश्किलें उसकी प्रतीक्षा कर रही थीं।सुशांति बताती है कि वह अपने घर बेल पहाड़ी आई परंतु वहां उसका घर भी किसी ने हड़प लिया था। सुशांति भूख-प्यासी अपने गांव के करीब पड़ी थी। वहीं एक आदमी ने सुशांति को देखा जो पाकुड़िया के किशोरी निकेतन के बारे में जानता था। वह उसे किशोर निकेतन लेकर आया। अब सुशांति यहीं रहती है। 
पाकुड़ की ही रहने वाली एक और बच्ची का बचपन कुछ इसी तरह छीन गया। अपने मां-बाप, चार बहन और एक भाई के साथ राधानगर गांव में रहने वाली श्रीमुनी हेम्ब्रमके परिवार में यूं तो कई परेशानियां थीं लेकिन सबसे बड़ी परेशानी थी परिवार की गरीबी। घर चलाना जब मुश्किल होने लगा तो श्रीमुनी के पिता ने उसे भी एक पत्थर कारखाने में काम पर लगा दिया। तब श्रीमुनी की उम्र थी 10 साल। परिवार वालों ने जाने किस मजबूरी में कभी पलट कर नहीं देखा।
पत्थर तोड़ते चार साल जैसे-तैसे गुजरे। श्रीमुनी ने कोशिश की कि पत्थर कारखाने से बाहर निकला जाये। उसने जब मालिकों से बात की तो मालिकों ने साफ मना कर दिया। आखिर में श्रीमुनी एक दिन चुपके से पत्थर कारखाने से भाग खड़ी हुई। सीधा जा पहुंची अपने गांव। लेकिन गांव में जिस सच्चाई से सामना हुआ, वह पत्थर से कहीं ज्यादा कठोर था। गांव में उसका कोई भी परिजन नहीं था, न मां, न बाप। भाई-बहन भी नहीं। पता चला, उसका पूरा परिवार कहीं कमाने-खाने चला गया है।
किसी तरह वह गांव के एक आदमी के साथ किशोरी निकेतन पहुंची। अब यहीं वह अपनी जिंदगी के पन्नों को दुरुस्त करने में लगी है। उसने टोकरी बनाना सीखा और अब दूसरों को यह काम सीखा रही है। उसकी पढ़ाई तो चल ही रही है।पाकुड़ के गांवों में सुशांति और श्रीमुनी जैसी कई-कई लड़कियां हैं। इस जंगली इलाके में इन लड़कियों का दुख जंगल से भी कहीं ज्यादा घुप्प और गहरा है। किसी का बचपन छीन गया है तो किसी की जवानी और कोई तस्करी के अंधेरे में खो गया है। कई लड़कियों का अब तक नहीं पता कि वे कहां और किस हाल में हैं। 
बांग्लादेश की सीमा से लगा है झारखंड का पाकुड़ और साहेबगंज यानी संथाल परगना का इलाका। उच्च गुण्ावत्ता वाले पत्थर इस इलाके की पहचान हैं लेकिन इन्हीं पत्थरों के कारण इस इलाके की पहचान बदल रही है और अब यह हिस्सा लड़कियों की तस्करी का गढ़ के रुप में जाना जाने लगा है।होता ये है कि इस इलाके से ट्रकों में पत्थर लाद कर बांग्लादेश ले जाया जाता है। पत्थर निकालने एवं ट्रक पर पत्थर भरने का काम ज्यादातर लड़कियां ही करती हैं। यहीं से शुरु हो जाता हैं इनकी तस्करी और यौन शोषण का रास्ता। 
झारखंड के एटसेक यानी एक्शन एगेंस्ट ट्रैफिकिंग सेक्सुअल एक्सप्लाएटेशन ऑॅफ चिल्ड्रेन के राज्य संयोजक संजय मिश्रा स्थिति की भयावहता के बारे में बताते हैं कि कैसे काले पत्थर की खान और उसके निर्यात से आदिवासी लड़कियों की जिंदगी काली होती जा रही है। संजय कहते हैं-  तस्करी की वजह से एक जनजाति का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। पाकुड़ से पहाड़िया जनजाति खत्म हो रही है। गिनती के परिवार बच गए हैं। उनकी जगह बांग्लादेशी आकर बस रहे हैं। खासकर वहां की लड़कियों की संख्या बढ़ती जा रही है।
इस समस्या की गंभीरता पर संजय मिश्रा ने ही प्रशासन का ध्यान खींचा। उन्होंने इस मुद्दे पर व्यापक अध्ययन करने के बाद एक गैर सरकारी संगठन मानवी के साथ मिलकर पिछले साल मई में एक सेमिनार का आयोजन करवाया, उसके बाद प्रशासन की नींद खुली।संजय बताते हैं - मानव तस्करी पाकुड़ जिले के आसपास ही ज्यादा फल फूल रही है। एक तरह से यह इलाका देह बाजार के रुप में कुख्यात हो रहा है। खास कर हिरनपुर में आदिवासी लड़कियों के बीच देह व्यापार एक धंधे का रुप ले चुका है। यहां से बाकायदा आदिवासी लड़कियां लगातार बांग्लादेश के बाजारों में बेची और भेजी जा रही हैं।
एटसेक ने अपनी पहल पर सिर्फ पाकुड़ जिले में तस्करी की संभावना को देखते हुए दो वीजीलेंस कमिटी का गठन किया है, जो इस पूरे मामले पर नजर रखे हुए है। इनकी सजगता का नतीजा है कि ये लोग समय-समय पर वहां लड़कियों को तस्करों के चंगुल से मुक्त कराते रहते हैं। प्रशासन को नींद से जगाने वाली संस्थाओं को भी धीरे धीरे उनका सहयोग मिलने लगा है। अब आए दिन पाकुड़ की देह मंडी से लड़कियां बरामद होकर संजय मिश्रा के रांची और पाकुड़ किशोरी निकेतन में पहुंचने लगी हैं। 
संजय दावा करते हैं कि उनके संगठन ने अब तक 372 आदिवासी लड़कियों को विभिन्न राज्यों समेत बांग्लादेश से मुक्त करवाया है। एटसेक के आंकड़ो के अनुसार झारखंड की 1।23 लाख आदिवासी लड़कियां देश के विभिन्न शहरों में घरेलू नौकरानी के रुप में काम कर रही हैं, जिनमें 2339 दिल्ली में हैं, बाकी हरियाणा, मुंबई और उत्तर प्रदेश के कुछ शहरों में हैं। संजय दुख और चिंता जताते हुए कहते हैं-  हिरन पुर में महिला मंडी, पशु हाट से ज्यादा दूरी पर नहीं था। ये सभी अच्छी तरह जानते हैं कि यहां से हजारों की तादाद में गैर कानूनी तरीके से पशु भी बांग्लादेश भेजे जाते हैं। लेकिन ये महिलाएं भी उन्हीं पशुओं की तरह ट्रीट की जाती हैं और ये सिलसिला अब भी जारी है।
असल में राज्य के पुलिस अधिकारी भी नहीं जानते कि लड़कियों की तस्करी के मामले में कानूनी प्रावधान क्या-क्या हैं। इममोरल ट्रैफिकिंग प्रिवेंशन एक्ट में कितनी कड़ी सजा का प्रावधान है, इसका अहसास भी इन पुलिस अधिकारियों को नहीं था। आखिर में स्वयंसेवी संस्थाओं की पहल पर इस मुद्दे पर पुलिस की कार्यशालायें हुईं और मानव तस्करी पर रोक लगाने के लिए बकायदा टास्क फोर्स का भी गठन किया गया। इन कोशिशों का ही नतीजा है कि इलाके में मानव तस्करी के मामले में कमी आई है लेकिन क्या इसे जड़ से खत्म नहीं किया जा सकता ? संजय मिश्रा कहते हैं- मांग है तो आपूर्ति रहेगी ही। हमें समाज के सोचने के तरीके को बदलना होगा।
 
 
 रमन मेडीकल स्टोर 
आलोक तोमर 
नई दिल्ली, जनवरी- सुधा सिंह को बहुत लोग नहीं जानते। छत्तीसगढ़ के कवर्धा कस्बे में तीन साल पहले रमन मेडीकल स्टोर के काउंटर के पीछे उनसे मुलाकात हुई थी। रमन मेडीकल स्टोर डॉक्टर रमन सिंह का बनाया हुआ है और बहुत दिनों तक उनका और अब उनके परिवार का खर्चा इसी स्टोर से निकलता है। 
आज के जमाने में यह बात किसी को भी अटपटी लग सकती है लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे समृध्द राज्य के दूसरी बार मुख्यमंत्री बने डॉक्टर रमन सिंह का पारिवारिक मेडीकल स्टोर अब भी चलता है और यह किसी बाजार में नहीं बल्कि पारंपरिक मकान के बाहर वाले कमरे में चलता है। 
तीन साल पहले जब लोगों ने कहा था कि रमन सिंह संयोग से तो मुख्यमंत्री बन ही गए हैं लेकिन उनके मुख्यमंत्री होने में कहीं भी ग्लैमर या चकाचौंध नहीं हैं। आम तौर पर ऐसी बातों पर भरोसा नहीं होता लेकिन श्रीमती सुधा सिंह से मिल कर लगा कि कई बाते हैं जिन पर तर्क नहीं होने के बावजूद भरोसा कर लेना चाहिए। पति का नाम बिघ्न हरण सिंह और बेटे का नाम रमन सिंह। बेटे के आगे पीछे कारों का काफिला घूमता है लेकिन घर के दरवाजे तक बोर्ड लगा था कि कृपया मुख्यमंत्री को दिए जाने वाले आवेदन यहां नहीं दिए जाएं। 
सुधा सिंह वैसी ही हैं जैसी आम तौर पर मां होती हैं। बेटे की गरिमा और जलवे से उन्हें कोई खास लेना देना नहीं था। वे तो खाने की पीढ़ी पर बिठा कर कह रही थी कि मेरा बेटा बावला है और अगर वह अपने तरीके से डॉक्टरी करता रहता तो घर और खेत दोनों बिक जाते। उत्तर प्रदेश के एक जिले से रोजगार की तलाश में रमन सिंह के पूर्वज छत्तीसगढ़ आ कर बसे थे और यहीं के हो कर रह गए थे। रमन सिंह ने आयुर्वेद की पढ़ाई की और एक लोकल नामी डॉक्टर के साथ प्रैक्टिस भी शुरू की। हाथ में हुनर था इसलिए प्रैक्टिस चल निकली। लेकिन मरीजों की संख्या से ही डॉक्टर की सफलता तय नहीं होती। कई मरीज आते थे और उनके पास दवाई खरीदने के पैसे नहीं होते थे इसलिए डॉक्टर साहब इलाज भी करते थे और पैसे भी देते थे। 
 
यही बात उस दिन डॉक्टर रमन सिंह की मां सुधा सिंह बता रही थी। गुस्से में नहीं, लगभग निहाल हो कर। वे यह भी कह रही थीं कि बेटे में कोई शौक नहीं और कोई जिद नहीं। वह तो संघ परिवार के साथ जुड़ा था और वहां से कब राजनीति में चला गया, यह पता ही नहीं चला। एक किस्सा जो याद आता है वह यह था कि रमन सिंह की शादी तय कर दी गई और उनसे कहा गया कि वे चाहे तो लड़की देखने जा सकते हैं। रमन सिंह अपनी समाज सेवा में इतने व्यस्त थे कि उन्होंने माता जी को ही कह दिया कि आपको जो करना है फाइनल कर दो। इस तरह शादी हुई और यह बात अलग है कि श्रीमती सुधा सिंह ने बेटे के लिए सुंदर बहू पसंद की। 
यही जीवट वाली सुधा सिंह अब अस्पताल में हैं। लकवे का झटका लगा और दिमाग में रक्त का संचार कम हो गया। रमन सिंह मुख्यमंत्री पद के सारे काम निपटाते हैं लेकिन जुलूस और जलसों से दूर रह कर ज्यादा से ज्यादा मां की सेवा में लगे रहते हैं। विडंबना यह है कि मां कोमा में हैं इसलिए उन्हें इस सबका आभास भी नहीं होता। 
कवर्धा में घुसते ही पहले मोड़ पर रमन मेडीकल स्टोर अब भी मौजूद हैं। मुख्यमंत्री के छोटे भाई उसे चलाते है। मुख्यमंत्री माओवाद से ले कर केंद्र सरकार तक अपनी और अपने राज्य की समस्याओं से जूझते रहते हैं लेकिन उनकी मां फिलहाल अपने जीवन से जूझ रही हैं। वे इंटेसिव केयर में हैं इसलिए उन्हें लगातार डॉक्टरों का ध्यान मिलता है लेकिन मुख्यमंत्री की मां होने के नाते कोई विशेषाधिकार नहीं मिला। ठीक वैसे ही जैसे ठाकुर बिघ्न हरण सिंह मुख्यमंत्री के पिता होने के बावजूद राज्य सरकार के अधिकारियों से समय ले कर मिलते हैं और अपने बेटे के पिता होने की दादागीरी किसी पर नहीं झाड़ते। बदनाम हो चुके समकालीन लोकतंत्र में इस तरह के अपवाद भी मिल ही जाते हैं
 
 संघ का भाजपा पर कोई दबाव नहीं

चेतन उपाध्याय 
 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघ चालक श्री के।एस। सुदर्शन ने कहा है कि आतंकवाद के मुद्दे पर सभी लोगों को जाति, धर्म, भाषा व किसी भी प्रकार के मतभेद से ऊपर उठकर सरकार के साथ रहना चाहिए। उन्होने जोर देकर कहा कि संकट की इस घड़ी में सरकार को चाहिए कि वो देश के सभी वर्गों र्को विश्वास में लेकर, उनकी भावनाओं को ढही में रखते हुए पाकिस्तान के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करे। दिल्ली में मंगलवार को दिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में संघ प्रमुख ने कहा कि भारत की जनता बहुत सहनशील है मगर साथ ही जरूरत पड़ने पर बहादुरी के साथ दुश्मनों को माकूल जवाब देना भी जानती है। आज की तारीख में अगर सारे उपाय और अन्य विकल्पों के आज़माने के बाद भी पाकिस्तान न सुधरे तो फिर आर-पार की लड़ाई जरूरी है। हो सकता है कि यह लड़ाई आणविक-युध्द में परिवर्तित हो जाए और बहुत सारे लोगों को अपनी जानें भी गवानी पड़े, मगर इस विनाश के बाद जो संसार बचेगा वो बहुत ही सुंदर होगा। वहाँ पर कुछ भी बुरा नहीं रहेगा और आतंकवाद भी गायब हो जाएगा।
 
प्रस्तुत है इस इंटरव्यू के मुख्य अंश: 
 
प्रश्न: सुदर्शन जी, मुंबई पर हुए आतंकवादी हमलों के बाद देश का एक बहुत बड़ा वर्ग मानता है कि सरकार से कहीं न कहीं भारी चूक हुई है। इस पर आप क्या कहेंगे?
 
 
उत्तर: मैं इस घटना को अलग करके नहीं देखता। यह तो संपूर्ण साजिश का एक हिस्सा भर है। पिछली कुछ शताब्दियों से भारत के सामाजिक व सांस्कृतिक ताने-बाने को खत्म करने का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कुचक्र रचा जा रहा है। ये शक्तियाँ भारत को टुकड़ों में बाँटना चाहती हैं, मगर हम हमेशा विजयी रहे हैं। हम सहनशील हैं, मगर साथ ही बहुत बहादुर भी। हाँ, लेकिन जब हमारी आपसी एकता में कोई कमी आई, तब-तब हमें गुलामी और पराजय भी मिली। लिहाजा पूरे देश का एक होना बहुत जरूरी है।
 
प्रश्न: सरकार को क्या करना चाहिए?
 
उत्तर: सरकार को जनता की आवाज़ सुननी चाहिए। लोगों में भारी गुस्सा व रोष है। लोग गुस्से में सड़कों पर उतर आए। ऐसा जबरदस्त आक्रोश पहले कभी भी नहीं देखा गया। और आपदा की इस घड़ी में देश की जनता व सरकार जो भी निर्णय लेगी, हम उसके साथ होंगे। आतंकवाद से निपटने के मुद्दे पर सरकार से किसी भी प्रकार के विरोध का सवाल नहीं है।
 
प्रश्न: सुदर्शनजी, अगर आप इस देश के प्रधानमंत्री होते तो इस समय करते?
 
उत्तर: देखिए यह तो काल्पनिक सवाल है। जब मैं राजनीति में हूँ ही नहीं तो प्रधानमंत्री बनाने का सवाल ही कहाँ उठता है? लेकिन हाँ, अगर होता तो वही करता जो देश की आम जनता निर्णय लेती। और आज भी मैं यही कहूँगा कि इस बात पर मंथन होना चाहिए कि इस देश का बुध्दिजीवी, नौकरीपेशा, व्यापारी और आम जन इस बारे में क्या चाहता है और फिर उसी के हिसाब से समस्या से निपटा जाए। जब पाकिस्तान और अमेरिका की सरकारों ने भी यह स्वीकार कर लिया है कि मुंबई हमलों में शामिल आतंकवादी पाकिस्तानी ही थे, तो ऐसे में हाथ पर हाथ धर कर बैठना भी कैसे संभव है? हमने उनसे बीस आतंकवादियों को भारत को सौपने की माँग की और वो नाना प्रकार के बहाने बनाकर अशांति को बढ़ावा दे रहे हैं। 
 
प्रश्न: क्या भारत को ऐसी स्थिति में युध्द का रास्ता अख्तियार करना चाहिए?
 
उत्तर: हाँ, अगर कोई और रास्ता नजर न आ रहा हो। जब-जब संसार में आसुरी शक्तियों का बोलबाला बढ़ने लगता है, तब युध्द आवश्यक हो जाता है। आप ही बताइए कि क्या और भी कोई रास्ता है? लेकिन मैं बता दूँ कि युध्द अन्तिम विकल्प होना चाहिए, उससे पहले भारत को अन्य सारे विकल्पों पर खूब अच्छी तरह विचार कर लेना चाहिए। 
 
प्रश्न: क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि अगर इस बार युध्द हुआ तो वह गोली-बारूद तक नहीं सीमित रहेगा?
 
उत्तर: हा, मैं जानता हूँ। यह परमाणु-युध्द होगा जिसमें बहुत सारे लोगों को अपनी जानें गँवानी पड़ेंगी। सिर्फ मैं नहीं, बल्कि दुनिया के बहुत सारे लोगों ने इस बात की आशंका जताई है कि आतंकवाद की परिणति तीसरे विश्व युध्द के रूप में हो सकती है और यह आणविक-युध्द होगा जिसमे जान-माल का बहुत भारी नुकसान होगा। लेकिन आज की परिस्थिति में दानवों के विनाश के लिए और कोई रास्ता नहीं है। लेकिन मैं एक बात बहुत विश्वास के साथ कहना चाहता हूँ कि इस विनाश के बाद जो संसार आएगा, वह बहुत ही सुंदर होगा। वहाँ पर कुछ भी बुरा नहीं होगा और आतंकवाद भी गायब हो जाएगा।
 
प्रश्न: हिन्दू आतंकवाद के बारे में आप क्या सोचते हैं?
 
उत्तर: एक हिन्दू कभी भी आतंकवादी नहीं हो सकता। किसी भी धर्म विशेष को आतंकवादी कहना पूर्ण रूप से अनुचित है।
 
प्रश्न: क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि इस्लामी जेहाद के प्रत्युत्तर में आने वाले दिनों में बंदूक, बम व ग्रेनेड से लैस हिन्दू लड़को की पौध आ सकती है?
 
उत्तर: हिन्दू धर्म का मूल स्वभाव ही हिंसा के खिलाफ है।
 
प्रश्न: लेकिन अगर ऐसी परिस्थिति आ ही जाए तो, जैसा शिवाजी ने किया था?
 
उत्तर: आत्म-रक्षा अलग बात है, मगर कोई भी सच्चा हिन्दू कभी भी आतंकवादी नहीं हो सकता। निरीह व बेगुनाह जनता को मारना हमारी बुनियादी शिक्षा के खिलाफ है सच तो यह है कि हम पूरे देश को एक साथ लेकर चलने में विश्वास रखते हैं। 
 
प्रश्न: तो क्या यह माना जाए कि एक धर्म के रूप में हिन्दू धर्म अपनी विराटता के सागर में अन्य लोगों को डूबा पाने में थोड़ा कमजोर रहा है? ऐसा तो नहीं कि अपने प्यार के आगोश में भरकर सभी को प्यार देने में कोई कमी रह गयी है?
 
उत्तर: नहीं, हमारी कोशिशें लगातार जारी हैं। हम समाज के सभी वर्गोंर् और धर्मों के लिए लगातार काम कर रहे हैं। सांप्रदायिक सौहार्द की दिशा में जबरदस्त कार्य कर रहे है, हम सब। पिछले 7 नवम्बर् 2008 को हमने गौ रक्षा हेतु सम्मेलन किया था, जिसमें मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के सक्रिय सहयोग से लगभग 170 उलेमाओं और अन्य बुध्दिजीवियों ने शिरकत की थी। इसके अलावा देवबंद को मानने वाले 6000 लोगों ने साझा रूप से गौ-हत्या के खिलाफ हस्ताक्षर किए। सच तो यह है कि खुद हज़रत मोहम्मद ने भी कहा है कि गाय का दूध शिफा है और गाय का मांस जहर। सांप्रदायिक सौहार्द को बढ़ावा देने में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच का जबरदस्त योगदान है। और मैं बता दूँ कि यह सिर्फ एक उदाहरण है। हम यह मानते हैं कि हर धर्म में ढेर सारे अच्छे लोग हैं। ऐसे सभी लोगों के प्रति हमारा पूरा सम्मान व प्यार है। यह हमारा सौभाग्य भी है और कर्तव्य भी कि हम सभी धर्मों र्को मानने वाले लोग आपस में प्यार-मुहब्बत से रहें। 
 
प्रश्न: एक सवाल जरा हटकर, क्या आपको ऐसा लगता है कि भाजपा आपसी अंतर्कलह का शिकार है?
 
उत्तर: हाँ, किसी भी अन्य पार्टी की तरह भाजपा भी काफी हद तक इसका शिकार बन चुकी है। लेकिन यह सब उस राजनैतिक व्यवस्था का दोष है, जो हमने अपनाया। कुछ लोग यह मानने की भूल करते हैं कि यह व्यक्तियों का दोष है, न कि सिस्टम का। लेकिन यह अर्धसत्य है। एक सिस्टम में कुछ न ठीक होने वाले दोष भी हो सकते हैं, जिसकी वजह से समस्या आना लाजिमी है। ब्रिटिश चुनाव व्यवस्था का वेस्ट मींस्टर मॉडल वहीं के लिए ठीक था, भारत जैसे बड़ेदेश के लिए नहीं। ऐसा देश जो जनसंख्या व क्षेत्रफल में विशालकाय होने के साथ ही जाति, धर्म व भाषा की विविधताओं से भरा हुआ है, ऐसे देश के लिए यह मॉडल बिल्कुल फिट नहीं बैठता।
 
प्रश्न: पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान खबर थी कि भाजपा की कमियों के चलते संघ परिवार किसी नये राजनैतिक दल को समर्थन देने पर विचार कर सकता है। क्या यह विचार आज भी प्रासंगिक है?
 
उत्तर: (हँसते हुए) मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहूँगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक सामाजिक व सांस्कृतिक संगठन है, भाजपा एक राजनैतिक पार्टी मतदान के योग्य संघ के कार्यकर्ता अपने विवेक से मतदान करते हैं, संघ इस बारे में कोई दिशा निर्देश जारी नहीं करता। 
(शब्दार्थ)
 
टापुओं पर कब्जा करने की योजना
  अरुण शौरी 
   लश्कर-ए-तैयबा के लडाके भी तेल संयत्रों को नेस्तनाबूद करने के लिए प्रशिक्षित किए जा रहे हैं। उनकी योजना कुछ निर्जन टापुओं पर कब्जा करने की है, जो देश के तटीय रेखा पर हैं और उन्हें हिन्द महासागर में अपनी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए बेस कैम्प बनाना चाहते हैं
  नवंबर 2006 को नई दिल्ली में आयोजित देश के तमाम पुलिस के इंस्पेक्टर जनरल और डायरेक्टर जनरल की संयुक्त बैठक को सम्बोधित करते हुए हमेशा सतर्क रहने वाले भारत के तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने कहा था कि भारत के तटीय क्षेत्र आतंकवादी समूहों की ओर से लगातार बढते हुए खतरे की जद में आ रहें है। आतंकी भारत में घुसपैठ के लिए समुद्री मार्ग को इस्तेमाल करना तय कर चुके हैं। उन्होंने कहा था कि हम समझते हैं कि वे भारत के समुद्री किनारों और उसके आसपास स्थित तेल शोधक कारखानों के बारे में सूचनाएं इकट्ठी करते रहे हैं। कुछ लश्कर-ए-तैयबा के लडाके भी तेल संयत्रों को नेस्तनाबूद करने के लिए प्रशिक्षित किए जा रहे हैं।  उनकी योजना कुछ निर्जन टापुओं पर कब्जा करने की है, जो देश के तटीय रेखा पर हैं और उन्हें हिन्द महासागर में अपनी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए बेस कैम्प बनाना चाहते हैं। इस मामले में हमारे रक्षा राय मंत्री भी कम चौकन्ने नहीं रहे हैं। उन्हें 9 मार्च, 2007 में लोकसभा में पूछा गया कि गुप्तचर एजेंसियां इस बारे में चेतावनी दे चुकी है कि आतंकवादी समुद्री रास्ते के जरिए हमारे संयंत्रों को लक्ष्य करके कर रहे हैं। उनका उत्तर था, हां, क्षीमान। ऐसी रिपोर्ट्स हैं कि कई तंजीम से तालुक्कात रखने वाले आतंकी समुद्री रास्ते से घुसपैठ कराने के लिए तैयार किए जा रहे हैं। उनसे पूछा गया कि समुद्री आतंक, नशीले पदार्थों की तस्करी और पायरेसी बडे खतरे के रूप में उभरे हैं जिनसे भारत को अपनी समुद्री सीमाओं से चुनौती मिल रही है। उनका उत्तर था, हां, क्षीमान। लगभग यही सवाल 9 मई, 2007 में गृहमंत्री से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि हमारे पास उपलब्ध रिपोर्ट के आधार पर पाक आधारित कुछ आंतकी समूह, विशेषकर लश्कर, अपने लडाके और आतंकी जखीरा समुद्र के जरिए पहुंचाने की कोशिश कर रहे है।
  इसी तरह दिसम्बर 8 दिसम्बर, 2007 को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम के नारायणन भी इसी तरह की शिक्षा दुनिया को दे रहे थे। मौका था चौथी क्षेत्रीय सुरक्षा समीट, जो इण्टरनेशनल इंस्टीटयूट ऑफ स्ट्रेटजिक स्टडीज मनामा डायलॉग। उन्होंने कहा कि हमारी खुफिया सूचना के अनुसार पाक अफगान सीमा पर अन्तर्राष्ट्रीय बिग्रेड की नई खेप तैयार हो रही है, जहां 14-15 देशों के लड़के वहां प्रशिक्षण ले रहे हैं। यह अपनी प्रकृति में ही बडा भयभीत करने वाला है। 
  देश के रक्षा मंत्री एके एंटनी का बयान याद आ रहा है जो इस सन्दर्भ में महत्वपूर्ण है,11 मार्च, 2008 को नई दिल्ली में आयोजित इंटरनेशनल मेरीटाइम सर्च एंड रेस्क्यू कॉफ्र्रेंस में प्रतिनिधियों से मुखातिब थे। उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में समुद्री आतंकवाद का खतरा बढ़ रहा है। उन्होंने स्वीकार किया था कि तटरक्षक बलों की पर्याप्त संख्या और दूसरी बुनियादी कमी खल रही है, जिसके लिए आवश्यक कदम उठाने की जरूरत है। हिंद महासागर में भारतीय तटरक्षक दलों को भरपूर संसाधनाें से और अधिक मजबूत करने की आवश्यकता है। इतना ही नहीं,मुंबई में असला बारूद रखने से एक पखवाडे पहले ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी चेताया था कि आतंक का खतरा समुद्र की ओर से लगातार चुनौती दे रहा है। 
  यह एक दूसरा अवसर था जब शिवराज पाटिल पुलिस के इंसपेक्टर जनरलों की 22 नवंबर को मीटिंग लेने वाले थे। 22 नवंबर यानी मुंबई हमलों से ठीक पहले उन्होंने पुलिस प्रमुखों को यह बताया कि समुद्री रास्ते से आतंकियों की घुसपैठ हो सकती है और भारत के मित्र राष्ट्रों की सीमाओं से सटे क्षेत्र में आतंकी कार्रवाई हो सकती है। चार दिन बाद ही आतंकी बिलकुल उसी रास्ते से न केवल सीमाओं में अंदर प्रवेश करते हैं बल्कि देश की अब तक की सबसे बड़ी त्रासदी का इतिहास लिख देतो हैं। सवाल उठता है कि ये मंत्री भारत सरकार के केवल परामर्शदाता हैं या सरकार को चलाते भी हैं। क्या उनका काम चेतावनी देना या यह देखना है कि उन पर कितना काम हुआ है। बस, चेतावनी दी और काम खत्म। आखिरकार इसी समुद्री रास्ते से विस्फोटक 1993 के बम ब्लास्ट के समय भी तस्करी के जरिए लाए गए थे। क्या उस समय के श्रुखलाबध्द भयानक विस्फोटों के बाद भी किसी चेतावनी की जरुरत थी। 
  
  इसके सात साल बाद 2000 में इसी तरह से चेतावनी और पिछले सबक का हश्र हुआ। चार टास्क फोर्सेज गठित की गई जिसमें एक ने सीमा प्रबंधन में बारे में चेतावनी दी थी कि लम्बी तटीय रेखा पर अपेक्षाकृत कम सुरक्षा कर्मी है और यही एक आसान रास्ता होगा जिससे हथियार और विस्फोटक अलग-थलग पड़े टापूओं पर पहुंचाए जाएंगे। वहां से देश के अंदर आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया जाएगा। इस स्थिति में पाकिस्तान की गुप्तचर ऐजेंसी आईएसआई की गतिविधियां और अधिक विस्तृत हो गई हैं। केरल के तटीय इलाके को जब से विस्तार दिया गया, इन इलाकों पर खास तौर से निगरानी की जरूरत महसूस की जाने लगी है। 
  देखने वाली बात यह है कि टास्क फोर्स ने रहस्य उद्धाटन किया कि आईएसआई लक्षद्वीप पर इसी तरह की गतिविधियां शुरू कर चुकी है जो आने वाले समय में भारत के सामरिक हितों के लिहाज से बहुत चुनौतीपूर्ण होगा। ये एजेंसी न केवल तस्करी करती है, बल्कि अपने नेटवर्क को वहां के निर्जन टापू पर फैलाने का काम कर रही है। जिससे हिंदी महासागर में अपनी गतिविधियों को चला सके। लक्षद्वीप के 36 टापूओं में 10 निर्जन हैं यानी जिस पर कोई इंसानी आबादी नहीं है। इसके सुहेली टापू पर न केवल अवांछित गतिविधियां देखी गई हैं, बल्कि दो रोटोर हेलीकॉफ्टर, जो अमूमन सेना के काम में आते हैं, को भी वहां उतरते देखा गया है। 
  चौंकाने वाली बात यह है कि हमारी गुप्तचर एजेंसियों ने तथ्य जुटाए हैं कि एक इंस्पेक्टर, एक सब इंस्पेक्टर, एक हैड कांस्टेबल और तीन कांस्टेबल कावरत्ती की स्पेशल ब्रांच में काम कर रहे हैं। इस ब्रांच के अलावा बाकी बचे 35 टापूओं की निगरानी के लिए केवल एक कांस्टेबल, एक हैड कांस्टेबल जिम्मेदार है। 
  मैं ऐसे और भी बहुत सारे उदाहरण आपको बता सकता हूं जिन पर कोई ध्यान नहीं है। एक जो घटना मुझे याद आ रही है, वह सटीक भी होगी। रायसभा में राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर डिबेट दौरान मैंने इस टास्क फोर्स की रिपोर्ट के कुछ अंशों को लहराया था तो कांग्रेस की ओर से शोर-शराबा होने लगा कि यह तो गोपनीय रिपोर्ट है, इसके पास कैसे पहुंची। 
  देश की सुरक्षा के लिए चीजें तो बहुत सारी करने की हैं, सबसे पहले उन सिफारिशों को लागू किया जाए, जो समितियों के जरिए आ रही हैं, जिन्हें आपने गठित किया है। दूसरे ये तब तक संभव नहीं होगा जब तक हम इसे बेहतर तरीके से ड्राफ्ट करके विधेयक के रूप में सरकार के पास न भेजें। हम जिन्हें नेता चुनते हैं, वे पुलिस को अपनी निजी सेना की तरह से व्यवहार करते हैं। यही हाल हमारी जांच एजेंसियों का हैं, जिन्हें हमारे नेता अपने राजनीतिक विरोधियों को फंसाने के लिए यादा इस्तेमाल करते हैं। इसलिए पुलिस और इन जांच एजेंसियों से कोई अपेक्षा मत रखिए कि ये अचानक आतंकी वारदातों को रोकने के लिए पहले से ही पुख्ता बंदोबस्त होंगे। 
  तीसरा, याद रखना चाहिए कि आप पहले दर्जे की कमाण्डो फोर्स के साथ तीसरे दर्जे की दण्ड-व्यवस्था नहीं रख सकते। क्योंकि आपके गुप्तचर अधिकारी आतंकियों को पकडते हैं और न्यायालय उन्हें या तो राहत दे देते हों, या फिर बरसों तक हमारे खजाने पर सरकारी मेहमान की तरह जिंदा रखते हैं। इस तरह बेहतरीन ऑफिसर का मनोबल हैड कांस्टेबल और कांस्टेबल के स्तर तक आ जाता है। जब केपीएस गिल ने पंजाब में अमन-चैन की बहाली की तो सबसे पहले वहां के स्थानीय थानों को मजबूत कर उनमें नई जान फूंकी थी। 
  
  मैं पूछना चाहता हूं कि किसने राष्ट्रीयता जैसे शब्द को गंदी राजनीति शुरू की। देश में 60-70 हजार बेगुनाह इस आतंक की चपेट में आ चुके है, लेकिन हम अब भी इस बात पर वाद-विवाद कर रहें हैं कि क्या हमें एक संघीय जांच एजेंसी की दरकार है? या आतंक की रोकथाम के लिए एक विशेष कानून के प्रावधान की आवश्यकता है? निश्चय ही हमें एक एजेंसी की आवश्यकता है। निश्चय ही दुनिया के सबसे सख्त कानून की भी जरूरत है। लेकिन केवल कानून बनाने से कुछ हासिल नहीं होगा, उन्हें क्रियान्वित करना होगा। तस्वीर का एक पहलू है मुस्लिमों के वोट-बैंक की राजनीति। सरकार ने गुजरात विधानसभा की ओर से पारित विधेयक को पास करने की बजाय उसे लटका रखा है। जबकि उसी तर्ज पर महाराष्ट्र सरकार का बनाया कानून मकोका केवल इसलिए पास कर दिया जाता है क्योंकि वहां कांग्रेस की सरकार है। दूसरा पहलू यह है कि वहां उस कानून को उसी रूप में काम में भी नहीं लिया जा सका है। 
  
  जरा सोचिए कि भारी तादाद में हथियारों का जखीरा आतंकवादी देश के अंदर ले आते है, विस्तृत स्थानीय जानकारी वे रखते हैं कि किस जगह उन्हें अपनी बोट किनारे लगानी है, उस बिल्डिंग की लोकेशन, जिस में यहूदी और इजरायली रहते हैं और होटल के अंदर से वे इस कदर अपने प्लान को अंजाम नहीं दे सकते थे, जब तक कि उन्हें महीनों तक स्थानीय मदद नहीं दी जा सकी हो। 
  संसद भवन पर आतंकी हमला करते हैं, कई सुरक्षाकर्मी मारे जाते हैं। उन्हीं में से एक आतंकी को सुप्रीम कोर्ट की ओर से सजा सुना दी जाती है लेकिन घटना के आठ सालों बाद भी उसके पेपर्स अभी प्रक्रिया में है। सजा के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान भी चला। इन सारी परिस्थितियों में एक आतंकी के लिए अपने मिशन में कामयाब होने के बाद यह सबसे मुफीद होगा कि वह पकड़ा जाए। उसे अपनी पैरवी के लिए सबसे लायक वकील मिलेंगे। उसे ऐसे न्यायाधीश मिलेंगे जो उसके अधिकारों के प्रति काफी उदार और जागरूक रहेंगे और लचर प्रक्रिया। उसे ऐसे आंदोलनकारी भी मिलेंगे जो उसके लिए मीडिया में उसके लिए जगह बनाएंगे।
  आप स्पष्टतया महसूस कीजिए कि पाकिस्तान के समाज की स्थिति और दशा क्या हो रही है। वहां के इस या उस शासक की नियति में विश्वास करना सरासर मूर्खता होगी। याद कीजिए, मुशर्रफ ने कहा था कि मैं नया दिल ले के आया हूं। तालिबान अ्ौर अलकायदा पाकिस्तान की दशा के कारण नहीं है। वे पाकिस्तानी समाज और राष्ट्र के तालिबानीकरण का परिणाम है। वहां पहली जमात से जहां तक पढता है, उसे वहां के शिक्षक यह सुनिश्चित करते हैं कि वह जिहाद के महत्व को पहचाने और उसकी इनायत से बावस्ता हो। वे अपने दिल में जिहाद के लिए जबा पैदा करें तथा ताबलिग, शहादत, गाजी, शहीद और जिहाद के लिए अपने दिल में प्यार और लगाव पैदा करें। क्या आप सोचते हैं कि ये निर्देश इस्लामिक कट्टरपंथी वहां के मदरसों के मौलवियों को देते हैं? नहीं। हकीकत यह है कि ये काम पाकिस्तान की सरकार अपने शासकीय सर्कुलर के जरिए सरकारी स्कूल के सभी प्रिंसीपल और शिक्षकों को जारी किया जाता है। यही समस्या का बडा हिस्सा है।(शब्दार्थ)
 
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