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मंद पड़ गई विकास की गति

 खुशवंत सिंह

प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल की पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर मीडिया में मिली-जुली प्रतिक्रिया रही। आमतौर पर आलोचना का स्वरूप भी कुछ इस तरह था कि प्रधानमंत्री के प्रथम कार्यकाल में विकास की जो गति थी, वह इस दूसरे कार्यकाल में मंद पड़ गई है और सरकार अपने प्रयासों और कार्यप्रणाली को उतने स्पष्ट ढंग से प्रस्तुत नहीं कर पा रही है, जितना कि किया जाना चाहिए। 
इन आरोपों में कुछ तो सच्चई है, इसलिए मैंने भी उन समस्याओं की वरीयता क्रम में एक फेहरिस्त बनाई है, जिनका तत्काल समाधान खोजे जाने की आवश्यकता है।
मेरी फेहरिस्त में सबसे ऊपर है खाद्य पदार्थो की बढ़ती कीमतें। बहुत बुनियादी चीजें जैसे चावल, गेहूं, दाल, प्याज, आलू और खाना बनाने वाले तेल के इतने महंगे दाम दे सकने में अधिकांश जनता असमर्थ है। जितनी जल्दी हो सके, इन चीजों का दाम कम होना चाहिए और यह हो सकता है। 
इसी प्राथमिकता के साथ सरकार को उन इलाकों में पुन: अपना आधिपत्य हासिल करने की जरूरत है, जिन पर माओवादियों का बसेरा है और वे शासन कर रहे हैं। यह राज्य सरकारों और केंद्र का एक सम्मिलित प्रयास होना चाहिए। 
माओवादी नेताओं के साथ संवाद शुरू करने के लिए सरकार को यह देखना चाहिए कि उनकी परिस्थितियों में क्या उचित और न्यायपूर्ण होगा ताकि वे गैरकानूनी ढंग से रखे हुए अपने हथियार छोड़ दें और हिंसा का सहारा न लें। इसे कार्यरूप में परिणत करने का भार और जिम्मेदारी केंद्रीय गृह मंत्रालय से भी ज्यादा राज्य सरकारों के कंधों पर है।
पूरे देश में एक व्यापक और गहरी असुरक्षा की भावना है। यहां तक कि राजधानी में भी स्त्रियां अंधेरा होने के बाद अकेले जाने में असहज महसूस करती हैं। सड़कों पर बहुत सारे खानाबदोश बेरोजगार आवारा घूमते रहते हैं। 
उनके पास करने को कोई काम नहीं है और वे पर्स, हैंडबैग छीनते और युवा लड़कियों के साथ अभद्र व्यवहार करते घूमते फिरते हैं। इन असामाजिक तत्वों को सड़कों-बाजारों से खदेड़ने के लिए आम नागरिकों को निश्चित तौर पर पुलिस की मदद करनी चाहिए। और अंत में हमें अपनी न्यायिक प्रक्रिया की गति को तेज करने के लिए अवश्य ही कुछ कदम उठाने चाहिए। 
अपराधियों को न्याय व्यवस्था के सम्मुख लाने में जितनी ज्यादा देर होती है, उससे लोगों में निराशा का भाव पैदा हुआ है और यह विश्वास भी कि अब कानून को अपने ही हाथों में ले लेना चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि जिन लोगों पर कानून को बनाए रखने की जिम्मेदारी है, वे अपना यह उत्तरदायित्व निभाने में बहुत ज्यादा वक्त लेते हैं।
एक बार प्राथमिकताओं की इस फेहरिस्त को लेकर सहमत हो जाएं तो इस बात पर विचार करें कि इन्हें पूरा करने के लिए सबसे सुयोग्य व्यक्ति कौन है? मनमोहन सिंह के स्थान पर और जो भी विकल्प हो सकते हैं, उन सब नामों के बारे में विचार करें। 
कुछ लोग ऐसे हैं, जो उनसे ज्यादा बुद्धिमान और चतुर प्रतीत होते हैं, लेकिन क्या कोई व्यक्ति ऐसा है, जो उनकी मेधा और दूरदर्शिता का मुकाबला कर सकता है? कुछ लोग ऐसे हैं, जो जिन क्षेत्रों से ताल्लुक रखते हैं, वहां उनकी ज्यादा राजनीतिक साख और पहुंच है, लेकिन क्या किसी को भी आर्थिक मामलों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का इतना व्यापक अनुभव है और क्या किसी और को देश की अर्थव्यवस्था को आमूल-चूल बदल देने का श्रेय दिया जा सकता है, जैसाकि मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान और बाद में अपने प्रधानमंत्रित्व काल में कर दिखाया? उनकी सज्जनता, सादगी और विनम्रता को उनकी कमजोरी समझने की भूल न करें।
बिना अपवाद के उनके मंत्रिमंडल के सभी मंत्री उनके प्रति बेहद सम्मान का भाव रखते हैं और उनके निर्णय को स्वीकार करते हैं। इस बारे में हमारे ऊपर शासन करने वाले स्त्री-पुरुषों में असहमति का कोई स्वर नहीं है। उन्होंने अपना काम किया है और जैसाकि मनमोहन सिंह ने खुद अपने चरित्र की संपूर्ण विनम्रता के साथ यह स्वीकार किया : हमने अच्छा काम किया है, हम इससे भी अच्छा काम कर सकते थे।
फिर से शंकर सेन : मेरे लिए कोलकाता के शंकर सेन एक खोज हैं। इसके पहले मैंने कवि शम्सुर रहमान के उनके अनुवादों के बारे में बड़े प्रशंसात्मक ढंग से लिखा था। मेरे पास अब उनकी कविताओं का संग्रह है डाउन मेमोरी लेन। नीचे लिखी हुई पंक्तियां मेरी संवेदनाओं के साथ पूर्णत: एकाकार हैं। शंकर सेन के शब्द मेरे शब्दों से कहीं ज्यादा बेहतर ढंग से यह बात कहते हैं :
कुछ क्षणों के लिए / छिप जाता है सूर्य
बादलों के पीछे/ रोशनी धुंधली हो जाती है
मैं खुद से पूछता हूं, 
क्या यह आखिरी मुकाम है?..
संसार में जितने सुख थे
उन सुखों का मेरा हिस्सा लिया मैंने
मैंने दुख झेले, बहाए आंसू 
देखी यारों की धोखेबाजियां
और यार बनकर दिए धोखे
जिसे टाला नहीं जा सकता
जैसे-जैसे वह अंत निकट आता है
एक आखिरी ख्याल सिर उठाता है
उन अनलिखे पन्नों पर
जो अब भी कहीं डायरी में पड़े हैं
इंच दर इंच/ मुझे खत्म न होने दो
जलती हुई मोमबत्ती की तरह
जो खत्म हो जाती है बिना टिमटिमाए
उल्का जैसा हो मेरा जाना/ तेज, अचानक
और अग्नि की आखिरी तड़क
ले जाए अजानी दुनिया की ओर
क्या प्रसन्न होगे तुम
यह आखिरी इच्छा पूरी करने में?
मनमोहना नहीं, मनमोहन : जिस रंगरेज ने संता की पगड़ी रंगी थी, वह उससे बहुत नाराज था, क्योंकि उसने जो रंग करने को कहा था, पगड़ी का रंग उससे मेल नहीं खाता था। 
संता को वह नीला रंग चाहिए था, जो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पहनते हैं, लेकिन रंगरेज ने ज्यादा गाढ़ा नीला रंग कर दिया। वह गुस्से से भर गया और बोला, ‘मैं मनमोहन सिंह जैसा दिखना चाहता हूं, मनमोहना (भगवान कृष्ण) जैसा नहीं।’
आखिरी इच्छा : अंबाला के पास जीटी रोड पर दो ट्रकों के बीच में एक वैन खड़ी हुई थी। उस वैन का जो इकलौता हिस्सा नजर आ रहा था, उस पर लिखा हुआ था - ‘प्रेस’।
(सौजन्य : मदन गुप्ता, सपाटू, चंडीगढ़)
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