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दूर सुनहरे क्षितिज की ओर
दूर सुनहरे क्षितिज की ओर
‘‘तमाम प्रयासों के बावजूद
कुछ नई नस्ल के कबूतर
उनके दड़बों की ओर रूख करने के लिए तैयार नहीं थे
ऐसे कबूतर पिचके पेटों के बावजूद 
लोहे की चोंचों वाले हो चले थे, 
वे आसमान में पंख पसार
नई संभावनाओं वाले नीड़ तलाशते
उड़कर बढ़े चले ज रहे थे
दूर सुनहरे क्षितिज की ओर।’’
 
यूकेएस चौहान, आईएएस
प्रबंध निदेशक, नाफेड
 
 
जड़हन का भात और मकई की रोटी 
हरिकृष्ण यादव
 
जड़हन और जोनहरी (मकई) पैदा होने वाले गांव में जन्मे त्रिलोचन शास्त्री परिवार के लिए कोलकाता में रिक्शा चलाया ताकि घरवालों को बेस्वाद जड़हन का भात और मकई की रोटी खाकर ही गुजरा न करना पड़े। इन्हीं लोगों के लिए ही बनारस, इलाहाबाद, मुरादाबाद, आगरा, रांची, भोपाल, दिल्ली और सागर जसे शहरों में दिनरात भटकते रहे। साथ ही अपना शौक (कविता, कहानी, नाटक लिखना और हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, अरबी, फारसी, उर्दू भाषाओं में विद्वता हासिल करना) पूरा किया। 
पिछले साल कुछ दिनों के लिए गांव जना हुआ। वहां दुनियादारीमें एेसे उलङा हुआ था कि महीना बीत गया पता नहीं चला। दिल्ली से नौ दिसंबर की देर रात बेटे अंकुर ने फोन किया। बताया ‘पापा, त्रिलोचनजी का निधन हो गया। सुनो, टीवी पर उन्हीं के बारे में ही बता रहे हैं।’ बेटे ने मोबाइल टीवी के पास रख दिया। संयोग से उस वक्त त्रिलोचन शास्त्री की आवाज सुनाई दे रही थी। पहले रिकार्डिग की बातचीत और महीने भर पहले उनसे हुई बातचीत की आवाज में कोई फर्क नहीं था। बोलने का वही लहज सुन कर मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा गीत ‘एक दिन बिक जएगा माटी के मोल, जग में रह जएंगे प्यारे तेरे बोल’ गूंजने लगा। 
महीने भर पहले जब उनसे मिला था तो मुङासे डेढ़-दो घंटे खूब बतियाए। गांव से लेकर दिल्ली तक के संगी-साथियों की चर्चा की। अपने बचपन की कुछ यादें ताज की। यह सब उस समय जब उनके छोटे बेटे सहित उनके संगी-साथी और शुभचिंतक उन्हें देखने के बाद टिप्पणी कर रहे थे- ‘त्रिलोचन की याददाश्त खत्म हो गई है, वे किसी को पहचानते तक नहीं, न ही किसी से बात करते हैं। बस गुमसुम बैठे रहते हैं।’ यह सब सुन कर मैं भी बेमन, मात्र दर्शन की भावना से उन्हें देखने गया। वहां पहुंचने पर लोगों के कहे पर विश्वास करके दस मिनट तक चुपचाप उन्हें निहारता रहा। उसके बाद मैंने कहा, ‘हमार घर मोतिगरपुर आहै।’ तब उन्होंने कहा, ‘दियरा के पास।’ उसके बाद बतकही का जो सिलसिला शुरू हुआ खत्म होने की उम्मीद नहीं थी। लेकिन मुङो नियत समय पर कहीं पहुंचना था। इसलिए उनका चरणस्पर्श करके न चाहते हुए भी वहां से चल दिया। यह उम्मीद लेकर कि फिर मिलने आऊंगा तो ढेर सारी बातें करूंगा। 
घर से निकल तो आया पर ध्यान उन्हीं पर लगा रहा। सोचा, ‘सब कुछ होते हुए कुछ भी नहीं है’ को एक शब्द में कहना हो तो ‘त्रिलोचन’ शायद ही अतिशयोक्ति हों! उनका कुनबा संपन्न है और सुधीजनों की लंबी कतार। दो पुत्रों के पिता त्रिलोचन ‘अपनों’ को देखने के लिए तरस रहे थे। उनके दिवंगत छोटे भाई का परिवार गांव में रहता है। व्यावहारिक रूप से पैतृक संपत्ति के वे ही मालिक हैं। त्रिलोचन नाम से इंटर कालेज और लाइब्रेरी की देखभाल भी वे ही करते हैं। एक बेटा वकील है तो दूसरा ठेकेदार। यानी भाई का भी खाता-पीता परिवार है। 
शास्त्रीजी के बड़े बेटे कें्रीय विश्वविद्यालयों में बरसों पढ़ाने के दौरान प्राच्य म्रुा विशेषज्ञ के रूप में जने गए। फिलहाल वे बनारस में निजी अनुसंधान कें्र में कार्यरत हैं। दूसरा दिल्ली में अखबारनवीस हैं। लेकिन परिवार ताश के पत्तों की तरह बिखरा है। बड़ा बेटा और बहू बनारस में रहते हैं। पौत्र अमेरिका में, पौत्रियों में एक गाजियाबाद में डाक्टर है, दूसरी दिल्ली में फैशन डिजइनर है। छोटे बेटे की बहू हरिद्वार में वकील हैं, जिनके पास शास्त्रीजी काफी समय से रह रहे थे। पौत्र कोलकाता में प्रबंधन में है और पौत्री दिल्ली में पिता के साथ रह कर पढ़ रही है। 
शुभचिंतकों में अशोक वाजपेयी, विष्णु चं्र शर्मा, विष्णु प्रभाकर, नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह जसे कई दिग्गज साहित्यकार और कवि शास्त्रीजी के सुख-दुख में साथ रहे। समय-समय पर इन लोगों ने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई। 
शास्त्रीजी ने परिवार की जिम्मेदारियां भरसक ईमानदारी से निभाईं। परिवार में बड़ा होने के नाते कम आयु में ही कुनबे की जिम्मेदारी संभाल ली। इसलिए कच्ची उम्र में ही साल में चार महीने खेत-खलिहान में काम करते। बाकी आठ महीने बाहर जकर मेहनत मजदूरी। जड़हन और जोनहरी (मकई) पैदा होने वाले गांव में जन्मे त्रिलोचन ने परिवार के लिए कोलकाता में रिक्शा चलाया ताकि घरवालों को बेस्वाद जड़हन का भात और मकई की रोटी खाकर ही गुजरा न करना पड़े। इन्हीं लोगों के लिए ही बनारस, इलाहाबाद, मुरादाबाद, आगरा, रांची, भोपाल, दिल्ली और सागर जसे शहरों में दिनरात भटकते रहे। साथ ही अपना शौक (कविता, कहानी, नाटक लिखना और हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, अरबी, फारसी, उर्दू भाषाओं में विद्वता हासिल करना) पूरा किया। 
बचपन से सरस्वती के पीछे भागने वाले त्रिलोचन जीवन के अंतिम क्षण तक उनसे विमुख न हो सके। जब कभी-कभार लक्ष्मी उनके पास आईं तो परिजनों को सौंप दिया। पिछले साल जब परिवार वालों को कुछ करने की बारी आई तो सबने मुंह फेर लिया। अपनों की बाट जोह रहे त्रिलोचन शायद इसीलिए अपने आख्रिरी दिनों में सुधीजनों से बोलना और उन्हें पहचानना जरूरी नहीं समङाते रहे हों। 
परिवार वालों ने गजब का फर्ज निभाया। जीवन के अंतिम दौर में भतीजों ने गांव से ही एक-दो दफा फोन पर हालचाल पूछ कर फर्ज अदा किया गया। बड़ा बेटा जिस पर उन्हें बड़ा नाज था देखने तक नहीं आया। छोटा बेटा अपनी नौकरी और पौत्री पढ़ाई के साथ उनकी कितनी सेवा कर पाए होंगे इसका अंदाज लगाया ज सकता है। बावजूद उन्हें कभी किसी से कोई गिलवा शिकायत नहीं रही। यदि होती तो उस दिन जरूर मुङासे बताते। उनके जीते जी उनके लिए जिन्होंने जो कुछ किया वे सुधीजन ही थे। उनकी सेवा करके वे धन्य हुए! 
 
 
 
बिसरा नहीं हूं मैं
 
हरिकृष्ण यादव 
त्रिलोचन और चर्चाओं का पुराना नाता है। आज वे अपनी अशक्त वृद्धावस्था और ‘सुध बिसरने’ के कारण चर्चा में रहे। कुछ लेखकों, उनकी कविताओं के प्रशंसकों ने उनसे मिलकर प्रचारित किया कि कविजी की याददाश्त गुम हो गई है। वे अपनों को भी नहीं चीन्हते। उनके छोटे बेटे ने भी यही बताया।
मैंने दिल्ली में रहने वाले उनके कई पुराने परिचित कवियों और साहित्यकारों को फोन करके गुजरिश की कि वे कवि की मिजजपुर्सी कर लें। पता नहीं किसे देखने से उनमें उत्साह का संचार हो। उनकी याददाश्त वापस आ जए। त्रिलोचन से मिलने की साध तो मेरे मन में भी थी। उनके बारे में सुनकर मिलने की हसरत होते हुए भी मन में तमाम आशंकाएं थीं। जीते जी किंवंदती बन गए कवि त्रिलोचन के बारे में सुना-पढ़ा था। देखा कभी नहीं था। 
बहरहाल उन्हें सिर्फ देखने के इरादे से उनके वैशाली (गाजियाबाद) स्थित घर पहुंचा। उन्हें एक दरवेश की तरह चौकी पर बैठा देखकर तसल्ली और खुशी हुई। चरण छूकर आशीर्वाद लिया और खड़ा रहा। उनके बेटे अमितजी ने ऊंची आवाज में कहा, ‘इनका भी घर सुल्तानपुर है। आपकी कई रचनाएं इन्होंने एक वेबसाइट पर लोड भी की है।’ शास्त्रीजी यह सब सुन केवल देखते रहे। पास रखी कुर्सी पर मैं बैठ गया। दस मिनट बाद मैंने कहा, ‘हमार घर मोतिगरपुर आहै’ तब जकर वे बोले, ‘दियरा के पास।’ मेरे ‘हां’ कहने पर उन्होंने बोलना शुरू किया। और लगभग दो घंटे तक गांव-गांव में अवधी के बदलते रूप और अपने समय के रचनाकारों पर बतियाते रहे। लगा ही नहीं कि कवि की सुध कहीं बिला गई है।
चैतन्य भाव से उन्होंने बताया: जब मैं मिडिल की परीक्षा देने ज रहा था, तब से इस गांव को जनता हूं। गांव का एेसा नाम और कहीं नहीं है। मोती यानी मूल्यवान। यह सबके पास तो होता भी नहीं। मुश्किल से एक-दो के पास होता है। उस जमाने में किसी के पास रहा होगा। तभी उस गांव का नाम मोतिगरपुर पड़ा। वहीं के सरयू पांडेय थे, जिनको मैं अच्छी तरह जनता था। काफी पढ़े-लिखे थे। 
उत्सुकतावश मैंने एक परिचित कवि की अवधी में लिखे श्यामचरित मानस की ये दोहा और चौपाई उन्हें सुनाई: कतहुँ साधु गावत भजन, हरि हर करि जयकार। कहुँ बरसावत सीस सिव, भगत गंग जलधार।।, पूर्ण ब्रह्म जेहि सुत होइ आए। सुकृत बिमल दसहूँ दिसि छाए।। निज सुत वचन जनि मोहिं दासा। दिव्य ग्यान उर देहु प्रकासा।। पुरी द्वारिका नावउँ माथा। परिजन सहित बसे यदुनाथा। सुरतरु सुभग बाग भल सोहा। सोभा अमित देव मन मोहा।। उन्होंने कहा: ‘ठीक है, लेकिन यह अवधी में नहीं है। उन्होंने जो लिखा है अपनी मर्जी से लिखा है। यदि किसी जनकार से ट्रेनिंग ली होती तो जलधार की बजए जल या धार में से केवल एक शब्द को चुनते। चौपाई सुनने में अच्छी लगे इसके लिए ‘दासा’, ‘प्रकासा’ शब्द का इस्तेमाल सही नहीं है। ‘नाथ’ का ‘नाथा’ प्रयोग एकदम गलत है। नाथा कोई शब्द नहीं होता। नाथ को नाथा कह कर कोई पुकारता भी नहीं। मैंने अवधी में लिखा है, यह वह बोली जो मेरे गांव के लोग बोलते थे। अवधी में बोलना आसान है। लिखना बहुत मुश्किल।’ अमितजी ने चुटकी लेते कहा, ‘तभी तो आपको कोई नहीं पढ़ता क्योंकि समङा नहीं पाता। इसलिए आप गांव के कवि होकर रह गए।’
त्रिलोचनजी ने कहा दिल्ली में ‘अमोला’ के बारे में कोई जनता नहीं। मैंने बताया कि पहले मैंने भी अमोला को कोई विशेष शब्द जनकर ही मतलब जनने की कोशिश की। जब इसके बारे में अमितजी से चर्चा की तब समङा कि यह वही अमोला है जो अपने गांव में होता है। बचपन याद आने लगा। जब अमोले को उखाड़कर हम उसकी पिपिहरी बनाकर बजते थे। सावन-भादों में जगह-जगह उग आए आम के पौधे को उखाड़ कर उसकी किसुली को पत्थर या लकड़ी पर बड़ी जतन से रगड़ते। मेड़, बाग और मैदान में घूमते घंटों सीटी बजते रहते। उसकी आवाज मेलों में बिकने वाली नरकुल की पिपिहरी से मिलती थी। 
जब मैंने कहा हम सब बचपन में अमोला उखाड़ कर खूब पिपिहरी बजते थे, वे पिपिहरी शब्द बोल कर मुस्कराने लगे। कहा, ‘मेरे बारे में आपको बहुत बाद में पता चला।’ मैंने उलाहना भरे शब्दों में कहा, ‘आपके बेटे ने आपके बारे में कभी कुछ नहीं बताया। यह भी नहीं बताया कि आप सुल्तानपुर के हैं। यह तो ध्रुवनाथ चतुर्वेदी का शुक्रिया जिन्होंने आपके बारे में एक बार सब कुछ बताया .. जब आप इलाहाबाद में थे तो आपके घर के पास ही उनका घर था। उन्होंने ही बताया कि लोगबाग आपसे लिखवा कर अपने नाम कुछ सामग्रियां छपवा लेते थे।’ यह सुन कर शास्त्रीजी हंसने लगे। अपनी सुध का परिचय देते हुए पूछा, ‘चतुर्वेदीजी कहां काम कर रहे हैं।’
उनकी पुरानी यादें ताज करने के इरादे से मैंने कहा, ‘जब आप बनारस में थे तब वहां 
एक सूचना अधिकारी शंभुनाथ मिश्र आपके परिचित थे। एक बार उनके पैर में फ्रैक्चर हो गया। अस्पताल में एक महीना रहे। आप घर से रोज चार किलोमीटर पैदल चल कर उन्हें देखने जते, फिर घंटो पास बैठ कर लौटते थे। मिश्रजी ने ही बताया था कि आप उनके साथ देर रात बनारस में रिक्शे से घूमने निकलते थे, फिर रिक्शेवाले को रिक्शे में बिठा कर खुद रिक्शा चलाते थे। यह सुन कर शास्त्रीजी हंसने लगे। लेकिन न जने क्यों उनके दिमागी कंप्यूटर में शंभुनाथ मिश्र के ‘पासवर्ड’ से उनका रूप-गुण नहीं खुला।
उन्होंने मुङासे पूछा, ‘यहां कहां रहते हो।’ मैंने कहा, ‘करावल नगर सादतपुर।’ उन्होंने कहा, ‘सादतपुर में ही विष्णुचं्र शर्मा रहते हैं। मैं उनके यहां गया हूं। ई-११ सादतपुर। ये लोग सादतपुर का नाम बदलना चाहते थे। पर बदल नहीं पाए। दरअसल वहां पहले कभी उर्दू के आधुनिक कवि काफी संख्या में थे। पर अब वे नहीं हैं। वहां सैयद लोग काफी संख्या में थे। इसीलिए जगह पहले सादातपुर थी, जिसे अब सादतपुर के नाम जना ज रहा है।’
बातचीत के दौरान उन्होंने तीन-चार बार राज बहादुर सिंह का जिक्र किया। कहा, वे सुल्तानपुर के ही थे, पर बंबई में रहते थे। बहुत अच्छा लिखते थे। लेकिन उनसे मैं कभी मिला नहीं। इस बात का मलाल वाकई उनके चेहरे पर देखने लायक था। मुङो बाद में पता चला कि राजबहादुर सिंह सुल्तानपुर जिले के कोइरीपुर गांव के थे और बंबई में नवभारत टाइम्स के संपादक रहे। अपने गांव के लंगोटिया यार बेंचू सिंह की जब उनसे चर्चा की तो उन्होंने कहा वे सुल्तानपुर में पढ़ाते हैं और साथ ही मेहता लाइब्रेरी का कामकाज भी देखते हैं। हालांकि बाद में मालूम हुआ उनका पं्रह-सोलह पहले ही देहांत हो गया। शायद बेंचू सिंह की मौत की खबर भी उनके दिमागी कंप्यूटर में कहीं दब गई थी। 
कवि की आंखे सहसा कौंधी। जहां उन्होंने मोतिगरपुर के सरयू पांडेय के बारे में बताया वहीं कादीपुर के पास गांव चतुरपुर के एक पंडितजी का जिक्र करते हुए बोले: वे पहले लोगों के बीच कथा वगैरह कहते थे। बाद किसी स्कूल में मास्टर हो गए। वहीं ब्लाक दोस्तपुर में सबसे पहले अंग्रेजी की पढ़ाई शुरू हुई थी। शायद उनके दिमाग में उनका गांव और लोकगीत कहीं कौंधने लगा था। उन्होंने अचानक कहा तब कुछ जतियों के अपने-अपने लोकगीत होते थे। जसे, बिरहा, धोबी गीत और कहरवा आदि।
कवि त्रिलोचन के साथ सुल्तानपुर जिले के गांवों में गिने-चुने पढ़े-लिखों को, मेड़ों व पोखर के किनारे तलाशना, फिर हर चार मील बाद भाषा में आए बदलाव को बारीकी से जनना-समङाना कतई आश्वस्त नहीं करता कि उनकी याददाश्त कम हुई है। वार्धक्य को बोङा उनकी सुध पर है। तीमारदारी भी वैसी नहीं हो पाई जसी चाहिए। शायद वह संग और सेवा उन्हें नहीं मिल पा रही जिसकी उन्हें जीवन के इस चौथेपन में दरकार है। बतकही और संगत ही उनके लिए जिजीविषा की बूटी है। 
 
 
 
 
 
 

 

 

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