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ब्लू स्टार और भोपाल कांड

 शेखर गुप्ता

भोपाल गैस त्रासदी पर आए फैसले के बाद राजीव गांधी के कुछ राजनीतिक वारिस ही उनके नाम की मिट्टीपलीद करने पर आमादा हैं। ऐसे में यह मुफीद होगा कि उनके द्वारा अपने शुरुआती दिनों में, यहां तक कि दफ्तर संभालने से भी पहले उठाए गए एक अच्छे कदम को याद कर लिया जाए। ऐसा करने की जरूरत तीन कारणों से है। पहला तो यह कि राष्ट्रीय सुरक्षा में राजीव गांधी के योगदान को हमेशा कम आंका गया। 
दूसरा यह कि माओवादी चुनौती का सामना करने में आड़े आ रहे हमारे सुपरिचित कंफ्यूजन के लिए भी इसमें एक सबक हो सकता है। और तीसरा यह कि यह ऐसा विचार था, जो 1984 के साल उपजा। शायद, 1984 हमारे हालिया इतिहास का सबसे कठिन साल था, जिसमें हमने एक के बाद एक ऑपरेशन ब्लूस्टार, सेना की सिख यूनिट में बगावत, इंदिरा गांधी की हत्या और उसके बाद भड़के सिख विरोधी दंगों और फिर चुनाव अभियान के ऐन बीच भोपाल गैस त्रासदी जैसे हादसों का सामना किया।
एक पत्रकार की हैसियत से मैंने इनमें से आखिरी को छोड़कर शेष सभी घटनाओं को कवर किया था, लिहाजा मुझे तो कोई शुबहा नहीं कि 1971 की उथल-पुथल के बाद 1984 ही ऐसा साल था, जब भारत ने बाहरी और अंदरूनी मोर्चो पर सबसे ज्यादा अस्थिरता का सामना किया। दरअसल, 84 के चुनावों में राजीव गांधी की बड़ी जीत की एक वजह शायद यह भी थी कि जनता किसी तरह का जोखिम नहीं उठाना चाहती थी।
मैंने भोपाल त्रासदी को कवर तो नहीं किया था, लेकिन हादसे के चंद दिनों बाद ही मैं भोपाल से होकर गुजरा जरूर था। मैं सिख विद्रोहियों के कोर्ट मार्शल को कवर करने जबलपुर जा रहा था। उस वक्त चौतरफा मुश्किल में घिरे भारत की कमान एक कार्यवाहक प्रधानमंत्री के हाथ में थी, जिसे कामकाज संभाले महज पांच हफ्ते ही हुए थे। अगर भोपाल गैस त्रासदी पर केंद्र ने ज्यादा तवज्जो नहीं दी तो उसकी एक वजह नई दिल्ली में अस्थिरता का माहौल भी था। अगर आपकी सेना अपने ही देशवासियों से जंग लड़ रही हो, अगर देश भर में बगावतें हो रही हों, अगर देश की सबसे ताकतवर राजनेता की हत्या हो जाए और उसके बाद एक प्रिय और सम्मानित समुदाय के बाशिंदों के कत्लेआम का दौर शुरू हो जाए तो ऐसे में एक और हादसे की खबर से आप स्तब्ध ही रह जाएंगे।
शायद इन्हीं सब के चलते हम राजीव गांधी के कुछ सर्वाधिक उपयोगी योगदानों के बारे में बात करना भूल जाते हैं। इन्हीं में से एक है वह सोच, जो नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (एनएसजी) की स्थापना का कारण बनी। एनएसजी को आमतौर पर ब्लैक कैट कमांडो कहा जाता है, जिन्हें 26/11 के दौरान दुनिया भर ने हरकत में आते देखा था। जून, 1984 में जब ऑपरेशन ब्लूस्टार शुरू हुआ, तब राजीव गांधी सरकार में शामिल नहीं थे, लेकिन वे पीएमओ से ज्यादा दूर भी नहीं थे। ऑपरेशन ब्लूस्टार एक सैन्य सफलता थी, लेकिन राजनीतिक और रणनीतिक मोर्चे पर यह भारी चूक थी। 
अभियान के बाद उपजी बगावतों ने राजीव को सोचने पर मजबूर कर दिया। क्या इस तरह के संवेदनशील अंदरूनी मसले का सामना करने के लिए सेना का इस्तेमाल टाला नहीं जा सकता था? क्या कोई और रास्ता नहीं था? आखिर उनके नाना ने भी तो 1948 में हैदराबाद में सेना भेजी थी और इसे ‘पुलिसिया कार्रवाई’ बताया था। 1961 में उन्होंने गोआ में नौसेना और वायुसेना का भी इस्तेमाल किया और तब भी इसे ‘पुलिसिया कार्रवाई’ ही बताया। नेहरू नासमझ नहीं थे। वे जानते थे कि सेना को हमेशा अंदरूनी मसलों से ऊपर और विवादों से दूर रखा जाना चाहिए। जहां तक पुलिस का सवाल है, उसे यूं भी बुरा समझा जाता है और जो अपनी आलोचना सह सकती है।
एनएसजी का विचार यहीं से उपजा। एक ऐसा सुप्रशिक्षित आतंकरोधी दस्ता, जिस पर गृह मंत्रालय का नियंत्रण हो और जिसमें हमारे तमाम सैन्यबलों से बेहतरीन लड़ाके शामिल किए गए हों। एनएसजी इसलिए एक शानदार पहल थी क्योंकि उसका सर्वेसर्वा स्पेशल एक्शन ग्रुप (एसएजी) तकरीबन पूरी तरह सेना की एलीट यूनिटों से गठित किया गया था। एनएसजी की मुहिमों के दौरान आमतौर पर बाहरी घेरा तैयार करने का काम करने वाले स्पेशल रेंजर ग्रुप (एसआरजी) के रंगरूट उसे महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान करते हैं। एसआरजी कमांडो में से अधिकतर का चयन अर्धसैनिक बलों में से किया जाता है। इन्हें अमूमन वीआईपी सुरक्षा में तैनात देखा जा सकता है। इस समूचे बल की अगुआई किसी आईपीएस अफसर द्वारा की जाती है, ताकि उसका असैनिक मुलम्मा बरकरार रहे।
एनएसजी की खासियत इसी में है कि इसके मार्फत किसी अंदरूनी मसले में सशस्त्र सेना की तमाम ताकतों और संसाधनों का इस्तेमाल किया जा सकता है और वह भी उसे संस्थागत तौर पर जाहिर किए बिना। एनएसजी को पहली कामयाबी 1988 की गर्मियों में ऑपरेशन ब्लैक थंडर के दौरान मिली, जब उसे उग्रवादियों को एक दफे फिर स्वर्ण मंदिर से खदेड़ना था। लेकिन इस दफे कोई विवाद नहीं हुआ, किसी तरह की बगावत की नौबत नहीं आई और न ही दीगर नुकसान हुए। यह एनएसजी की पहली और अब तक की सर्वश्रेष्ठ मुहिम थी।
आज ये तमाम बातें महज इतिहास को उलटने-पुलटने के लिए ही नहीं की जा रही हैं। इनका उद्देश्य है उस कल्पनाशील और निर्णयात्मक रुख को रेखांकित करना, जिसके जरिए राजीव गांधी ने अंदरूनी सुरक्षा की चुनौतियों का सामना किया था। इसी पृष्ठभूमि में हमें उस आत्महंता और बौद्धिक रूप से विपन्न ‘बहस’ का जायजा भी लेना चाहिए, जो उनके वारिसों के बीच जारी है। नई चुनौतियों का रचनात्मक ढंग से सामना करने के बजाय वे महज दोषारोपण की राजनीति कर रहे हैं और मीडिया में खुलासे करते हुए खुद को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। खुद को गंभीरता से लेने वाला दुनिया का कोई भी मुल्क सार्वजनिक मंच पर रणनीतिक मसलों पर बहस नहीं करता। यह समस्या तब और जटिल हो जाती है, जब ‘बहस’ का इस्तेमाल महत्वपूर्ण मंत्रियों और मंत्रालयों द्वारा भी रणनीति की तरह किया जाता है।
ये बातें दिमागी दिवालिएपन से उपजती हैं कि माओवादी हिंसा के कुछ ‘बुनियादी कारण’ हैं और उनका निदान किया जाना चाहिए। और यह भी कि ऐसा तब तक नहीं हो सकता है, जब तक हिंसा का ही अंत न कर दिया जाए। लेकिन ऐसा कैसे होगा और इसके लिए कितने न्यूनतम बल की दरकार होगी, यह तय करना और परिणामों की जवाबदेही लेना सरकार का काम है। संभव है वे राजीव गांधी के एनएसजी जैसा कोई बेहतरीन विचार सामने नहीं रख सकें, लेकिन उन्हें कोई रणनीतिक समाधान तो खोजना ही होगा। यदि वे अब भी खुद को डावांडोल ही महसूस करते हैं तो फिर वे राष्ट्रीय सुरक्षा की उस ठोस विरासत को ही शर्मसार कर रहे हैं, जो उन्हें अपने नेताओं से मिली है और जिनके नाम पर वे आज भी वोट मांगते हैं।
लेखक द इंडियन एक्सप्रेस के एडिटर-इन-चीफ हैं।
   
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