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कहानी एक पहाड़ी शहर की कुशीनगर में लोकरंग का रंग कौन हैं ये तिरंगा वाले रीढ़ वाले संपादक थे निहाल सिंह
1984 में आप कहां थे?

 राजदीप सरदेसाई 

दिसंबर 1984 में आप कहां थे? यही वह सवाल है, जो पिछले एक पखवाड़े में पूरे मीडिया ने भोपाल गैस त्रासदी पर निचली अदालत का फैसला आने के बाद बिना चूके लगातार पूरी तत्परता के साथ उठाया। अस्सी साल के वयोवृद्ध राजनीतिज्ञों, कूटनीतिज्ञों और नौकरशाहों सबको खोज-खोजकर एक ही बात जानने की कोशिश की गई: भारत की सबसे भयंकरतम औद्योगिक त्रासदी के बाद एक हफ्ते के भीतर किसने यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन वॉरेन एंडरसन को भारत से बाहर जाने दिया?
इस सवाल का जवाब देने के लिए किसी विशेष खोजबीन या चीखते शीर्षकों की जरूरत नहीं है। सच्चई यह है कि इस बात के पर्याप्त लिखित और दृश्य प्रमाण व दस्तावेज मौजूद हैं, जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि ‘भारत की राजव्यवस्था’ ने एंडरसन को जाने का ‘सुरक्षित रास्ता’ मुहैया कराया। ‘सरकार’ में भोपाल में अजरुन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस और केंद्र में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार दोनों ही शामिल थे।
दुर्भाग्य से इस बुनियादी और सीधी सी सच्चई को स्वीकार करने के बजाय हमने प्रतिदिन खंडन-मंडन, अंतर्विरोधों और खुलासों की प्रदर्शनी लगा रखी है। यह सब कितना हास्यास्पद है, क्योंकि एक दुखद त्रासदी में १५,क्क्क् से ज्यादा लोग मारे गए और उनके प्रति कोई गंभीर सहानुभूति व चिंता नहीं है। एक ओर जहां अजरुन सिंह ने बुद्ध की तरह मौन धारण कर लिया, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस अपने प्रिय नेता राजीव गांधी का बचाव करने के लिए समस्त हदें लांघ चुकी है। यहां तक कि विपक्ष भी भोपाल मामले में आपातकाल जैसा व्यवहार कर रहा है।
साफगोई और ईमानदारी की बात यह है कि इस मामले में न तो मौन उचित है और न ही प्रमादपूर्ण आलाप। अजरुन सिंह का यह कहना बहुत हास्यास्पद है कि भोपाल मामले में कोई निर्णायक कदम उठाने का उनके पास अधिकार नहीं था। वे उस समय मध्य प्रदेश के सबसे ऊंचे पद पर विराजमान नेता थे। एंडरसन राज्य सरकार के विमान से ही यहां से उड़ गया और धारा 304 के तहत उस पर जो आरोप लगे थे, सत्र न्यायालय में राज्य पुलिस द्वारा ही इस धारा को रफा-दफा कर दिया गया। निश्चित तौर पर इस देश को यह जानने का अधिकार है कि क्यों और किसके निर्देश पर श्री सिंह ने यह निर्णय लिया था।
लेकिन एंडरसन के बच निकलने के मामले में राजीव गांधी का भी हाथ होने का जो आरोप है, उस पर कांग्रेस और विपक्ष के भीतर जो उन्मादपूर्ण स्थिति है, उसका क्या? कांग्रेस, जो वंशवाद की परंपरा से नाभिनाल बद्ध है, राजीव गांधी का नाम भर लेना ही उसे गुस्सा दिलाने के लिए काफी है। उसकी प्रतिक्रिया होगी, ‘इस पूरे मामले में राजीव गांधी का नाम घसीटने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?’ विपक्ष, जो पीढ़ियों से नेहरू-गांधी परिवार के लिए घृणा के बलबूते ही फला-फूला है, उसके लिए यह हिंदुस्तान की राजनीति के प्रथम परिवार को कठघरे में खड़ा करने का एक अवसर है।
विडंबना यह है कि एंडरसन को हिंदुस्तान से बाहर का सुरक्षित रास्ता दिखाने में कुछ भी शर्मनाक नहीं है। अगर यह निर्णय राजीव गांधी द्वारा लिया गया था - और इस बात पर यकीन करना नामुमकिन है कि प्रधानमंत्री इस पूरे मामले से बिल्कुल अनभिज्ञ थे - तो यह निर्णय उनके द्वारा लिए गए बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णयों में से एक था। आप राजीव गांधी पर बाबरी मस्जिद के दरवाजे खुलवाने का आरोप लगा सकते हैं, 1987 में कश्मीर घाटी में आम चुनावों में कुछ छेड़छाड़ का भी आरोप लगा सकते हैं, लिट्टे समस्या पर उनके रुख को लेकर दोष मढ़ सकते हैं। ये सभी वे मुद्दे हैं, जिनके बहुत भयानक नतीजे सामने आए। आप ये सभी आरोप लगा सकते हैं, लेकिन एंडरसन के मामले में संभवत: उन्होंने सबसे सही रास्ता चुना था। दिसंबर 1984 जून 2010 नहीं है। उस समय कुछ ही हफ्तों पहले इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी, सिख आतंकवाद राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जबर्दस्त चुनौती बना हुआ था, देश की राजधानी खूनी नरसंहार से क्षत-विक्षत हो गई थी, दक्षिण-पूर्व धीमी आंच पर खदबदा रहा था, अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही थी, आम चुनाव होने में कुछ ही दिन बाकी थे। पूरा राष्ट्र आंतरिक व बाहरी समस्याओं से घिरा हुआ था।
इसके अलावा 1984 का वर्ष अमेरिकी ‘विशिष्टतावाद’ के चरम का वर्ष था। ‘विशिष्टतावाद’ यह अमेरिकी विश्वास था कि अकेला वही है, जिसके पास पूरी दुनिया में सभ्यता या लोकतंत्र स्थापित करने का अधिकार है। रोनाल्ड रीगन राष्ट्रपति थे। उनके नेतृत्व वाले अमेरिकी सैन्य-औद्योगिक गठजोड़ का बोलबाला था और वे शीतयुद्ध में विजय की कगार पर थे। एक देश जो आंतरिक उथल-पुथल की तकलीफ झेल रहा था, वह एक ताकतवर महाशक्ति को कैसे चुनौती दे सकता था। यदि रीगन ने राजीव को फोन किया और उनसे एंडरसन को छोड़ देने के लिए कहा तो ऐसी स्थिति में एंडरसन को छोड़ देना ही उस समय संपूर्ण राष्ट्र के हित में लिया गया सबसे बुद्धिमत्तापूर्ण और दूरदर्शी निर्णय था।
असली घोटाला यह नहीं है कि 7 दिसंबर 1984 को क्या हुआ, जब एंडरसन को देश छोड़कर जाने दिया गया, बल्कि यह है कि उसके बाद के 26 सालों में क्या हुआ? सच्चई यह है कि 1989 में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी खुशी-खुशी भारत सरकार और यूनियन कार्बाइड के बीच तकरीबन एक लाख गैस पीड़ितों के मुआवजे के बतौर 470 मिलियन डॉलर का समझौता कराया। लेकिन सच्चई तो यह है कि प्रभावित लोगों की वास्तविक संख्या कोर्ट द्वारा बताई गई संख्या की पांच गुना थी, लेकिन उन सब लोगों को कभी पूरा मुआवजा नहीं मिला।
1996 में सुप्रीम कोर्ट ने जानते-बूझते भोपाल त्रासदी के अभियुक्तों पर लगे आरोपों पर लीपापोती कर दी और सीबीआई ने उसे कोई चुनौती भी नहीं दी। सच्चई यह है कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अहमदी, जिन्होंने भोपाल मामले में फैसला सुनाया था, उन्हें बाद में भोपाल मेमोरियल ट्रस्ट हॉस्पिटल का प्रमुख बना दिया गया। सच्चई यह है कि न तो अभी तक दुर्घटना की जगह से विषैले कचरे को पूरी तरह साफ किया गया है और न ही आसपास रहने वाले लोगों के लिए पीने के पानी की समुचित व्यवस्था की गई है। 
सच्चाई यह भी है कि 1984 के बाद से कांग्रेस और भाजपा, दोनों ने मध्य प्रदेश पर शासन किया। यदि आप भोपाल की जेपी नगर कॉलोनी में घूमें तो स्पष्ट दिखाई देता है कि सरकार ने उन पीड़ितों के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किया। दो साल पहले जब कुछ पीड़ितों ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरना दिया तो उन्हें वहां से खदेड़ दिया गया और उन्होंने एक हफ्ता तिहाड़ जेल में गुजारे। एंडरसन को किसने जाने दिया, यह मुख्य मुद्दा नहीं है। मुद्दा यह है: भोपाल त्रासदी पर सरकार की आंखें खुलने में 26 साल क्यों लग गए?
पुनश्च : 1984 में इकलौते कैमरे से लिया गया एंडरसन का वीडियो देखते हुए ख्याल आता है: क्या आज के उन्मादी 24 घंटा चैनलों के दौर में कार्बाइड का बॉस इतनी आसानी से ‘बाय-बाय इंडिया’ करके निकल सकता था।
 
लेखक सीएनएन 18 नेटवर्क के एडिटर- इन-चीफ हैं।
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