ताजा खबर
राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बने अब सबकी निगाह राहुल गांधी पर कैसे पार हो अस्सी पार वालों का जीवन कश्मीर में सीएम बना नहीं पाया तो कहां बनाएगा ?
तालमेल पर भी बीजद में भारी मतभेद

 रीता तिवारी 

भुवनेश्वर, मार्च। ओडीशा में बदले राजनीतिक समीकरणों के बीच अगले महीने होने वाले लोकसभा व विधानसभा चुनावों में नवीन पटनायक की अगुवाई वाली बीजू जनता दल (बीजद) सरकार को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। भाजपा से 11 साल लंबी उसकी दोस्ती इसी महीने टूट गई है। यह दोनों पार्टियां अब एक-दूसरे के खिलाफ ताल ठोक रही हैं। इसकी काट के लिए बीजद ने कई नए दोस्त तलाशे हैं। लेकिन उनके साथ सीटों पर तालमेल का सवाल अभी अनसुलझा ही है। दो पुराने दोस्तों की दोस्ती में आई इस दरार का फायदा उठाने के लिए कांग्रेस ने भी पूरी ताकत झोंक दी है। ध्यान रहे कि राज्य में विधानसभा की 147 व लोकसभा की 21 सीटों के लिए दो चरणों में 16 और 23 अप्रैल को मतदान होना है। 
लंबी दोस्ती टूटने के बाद अब बीजद और भाजपा ने राज्य में एक-दूसरे के खिलाफ जम कर प्रचार शुरू कर दिया है।  इन दोनों दलों ने वर्ष 1998,1999 व 2004 का लोकसभा चुनाव मिल कर लड़ा था। वर्ष 2000 व 2004 में हुए विधानसभा चुनाव में भी यह दोनों पार्टियां एक साथ थीं। विधानसभा चुनावों में भाजपा 63 सीटों पर लड़ी थी और बीजद 84 पर। लोकसभा में भाजपा के खाते में नौ सीटें थी और बीजद के 12 सीटें। 
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के साथ तालमेल के सवाल पर भी बीजद में भारी मतभेद है और इसके विरोध में राकांपा के प्रदेश अध्यश्ध विजय महापात्र , पूर्व सांसद अनादि चरण साहू और हजारों कार्यकर्ताओं ने इसी हफ्ते बीजद से नाता तोड़ लिया है। राकांपा के ज्यादातर स्थानीय नेता इस तालमेल के खिलाफ हैं। बीजद ने अब नए दोस्तों की तलाश कर दी है। लेकिन इन नए दोस्तों के साथ सीटों पर तालमेल के सवाल पर अभी गहरी धुंध छाई है। बीजद के सूत्रों का कहना है कि पार्टी राज्य में अपने नए सहयोगियों के लिए लगभग 20 सीटें छोड़ सकती है। इन नए दोस्तों में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो), माकपा, भाकपा व राकांपा शामिल हैं। इन चारों में झामुमो ज्यादा सीटों की मांग पर अड़ा है। वह विधानसभा की 15 व लोकसभा की तीन सीटें मांग रहा है। इसी तरह वामपंथी दलों के साथ तालमेल का सवाल भी अभी अनसुलझा है। वामपंथी राज्य में विधानसभा की कम से कम 20 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहते हैं। लेकिन बीजद उसको 15 से ज्यादा सीटें देने को तैयार नहीं है। मुख्यमंत्री नवीन पटनायक वामपंथियों को लोकसभा की एक भी सीट देने के पक्ष में नहीं हैं। वह उनको विधानसभा की अधिकतम 15 सीटें देने को तैयार है।
पुराने दोस्तों के अलग होने का फायदा उठाते हुए कांग्रेस भी अबकी लोकसभा व विधानसभा चुनावों में पहले के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन करने के लिए कमर कस चुकी है। ज्यादातर राज्यों की तरह कांग्रेस अब तक यहां भी अंदरुनी राजनीति व गुटबाजी की शिकार थी। लेकिन पूर्व केंद्रीय मंत्री के.पी.सिंहदेव के प्रदेश कांग्रेस की कमान संभालने के बाद पार्टी में एक नई उम्मीद पैदा हुई है। कांग्रेस ने पिछली बार लोकसभा की 20 व विधानसभा की 133 सीटों पर चुनाव लड़ा था। बाकी सीटें  उसने अपने सहयोगी वामपंथी दलों के लिए छोड़ दी थी।
राज्य में बीते दो लोकसभा चुनावों में बीजद-भाजपा गठबंधव व कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला हुआ था। लेकिन इसमें बाजी बीजद-भाजपा गठजोड़ के हाथ रही थी। उसने वर्ष 1999 में 21 में 20 व 2004 में 18 सीटें जीती थी। लेकिन सीटों पर तालमेल की बातचीत फेल होने और कथित हिंदुत्ववादी एजंडे पर टकराव के चलते पुराने सहयोगियों के अलग होने की वजह से अबकी बीजद, भाजपा व कांग्रेस के बीच तितरफा मुकाबले की संभावना बन रही है। इस तिकोने मुकाबले में बीजद व भाजपा, दोनों को नुकसान हो सकता है। कांग्रेस व भाजपा ने भले अबकी एकला चलो का फैसला किया हो, बीजद ने कई नए दोस्त तलाश लिए हैं। 
प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष व पूर्व सांसद भक्त चरण दास कहते हैं कि इस बार हमें बेहतर प्रर्दशन का भरोसा है। हमने साल भर पहले से ही चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी थी। भाजपा व बीजद के रिश्तों में टूट का फायदा हमें मिलना तय है।  कांग्रेस ने मुख्यमंत्री के तौर पर किसी वरिष्ठ नेता का नाम आगे नहीं बढ़ाया है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि इससे वह फायदे की स्थिति में है।
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को अबकी दोहरे मोर्चे पर जूझना पड़ना रहा है। अपनी पुरानी सहयोगी भाजरा की खबर लेने के साथ ही वे अपनी चुनावी रैलियों में कांग्रेस को भी निशाने पर रख रहे हैं। पटनायक ने केंद्र की यूपीए सरकार पर जानबूझ कर राज्य की उपेक्षा करने का आरोप लगाया है। वेकिन प्रदेश कांग्रेस नेता इससे परेशान नहीं हैं। पार्टी ने पूरे राज्य में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व महासचिव राहुल गांधी की तस्वीरों वाले बड़े-बड़े बैनर लगा कर विकास के लिए पार्टी को वोट देने की अपील  की है।
यहां राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि भाजपा व बीजद के अलग होने से कांग्रेस अचानक बेहतर स्थान पर पहुंच गई है।  तीसरे मोर्चे, वामपंथी दलों के समर्थन और राकांपा के केंद्रीय नेतृत्व के समर्थन पर प्रदेश राकांपा में बगावत जैसे मुद्दे नवीन पटनायक सरकार के खिलाफ जा सकते हैं। ऐसे में पटनायक को अबकी चौतरफा चुनौतियों का समान करना पड़ रहा है। 
 
 
email ईमेल करें Print प्रिंट संस्करण
  • चंचल का चैनल
  • जहां पत्रकारिता एक आदर्श है
  • जहां आये कामयाब आये
  • नामवर की नियति
  • चिड़िया ते बाज तुड़वाऊं?
  • प्रभाष जोशी और इंडियन एक्सप्रेस परिवार
  • एक ऋषि की यात्रा का अंत
  • असली मैदान तो यूपी बनेगा
  • राजकाज
  • भगतों की चांदी है
  • मेरठ के बांके!
  • बाबरी विध्वंस की आयी याद
  • इतिहास में उपेक्षित तिलका मांझी
  • आखिरी पड़ाव गोमोह जंक्शन
  • संगम के अखाड़े में लेफ्ट-राइट
  • एक थे लोकबंधु राजनारायण
  • अपनी जमीन ही नसीब हुई
  • रवीश के सामाजिक सरोकार
  • गिरोह क्यों कहते हैं
  • ई राजेंद्र चौधरी कौन है ?
  • Post your comments
    Copyright @ 2016 All Right Reserved By Janadesh
    Designed and Maintened by eMag Technologies Pvt. Ltd.