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फ़्रांस की क्रांति

 स्मिता चंद्रा

धुनिक विश्व के इतिहास में यदि एक सबसे महत्वपूर्ण घटना को खोजा जाये तो संभवतः वह 1789 को फ्रांस की क्रांति  ही निकले। उसका कारण यह है कि मानव समाज में समता, स्वतंत्रता, भाईचारावाद, धर्म निरपेक्ष राज्य, मानव अधिकार एवं नागरिक अधिकार के मूल्यों की नींव फ़्रांस  की इसी क्रंाति ने रखी जो समय के साथ प्रत्येक आधुनिक समाज में सुनाई देने लगी। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी राजा राम मोहन राय से लेकर महात्मा गॉंधी तक ने इसी क्रांति के आदर्शो से अनेक शिक्षायें ग्रहण की थी। परन्तु यह क्रांति आसानी से संभावित नहीं हुई थी। यह कितनी असहनीय पीड़ा से उपजी थी, जनता का आक्रोश कितना हिंसात्मक था, उनके विचारों में कितनी दुविधाऐं थी एवं राजतंत्र एवं सामंतो की प्रतिक्रियाओं से कैसे आतंकी तरीके से जूझा गया, इन सभी तथ्यों से बना एक अत्यन्त रक्तरंजित इतिहास-1789 की फ्रांस की क्राति। इतने महत्वपूर्ण घटनाक्रम के बारे में विस्तार से जानने के लिये हिन्दी भाषाभाषियों के लिये अभी तक कोई भी पुस्तक नहीं थी। इस कमी को अत्यन्त सफलतापूर्वक पूरा किया हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय के पाश्चात्य इतिहास विभाग के अध्यक्ष  प्रोफ़ेसर  प्रमोद कुमार ने जिनकी पुस्तक को छापा है नेशनल बुक ट्रस्ट ने (पृष्ठ  173 मूल्य रुपए  65/-) इस उद्देश्य से कि भारत का जन सामान्य इस महत्वपूर्ण एवं रोमांचकारी घटना से भली भॉंति परिचित हो पाये।

1789 में फ़्रांस  की क्रांति के पहले देश की दशा थी, वहॉं की सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक एवं धार्मिक प्रणाली और वहॉं के जन मानस की दुर्दशा को बड़े ही सूचनात्मक ढंग  से एवं काफी विस्तारपूर्वक समझाया है लेखक ने अपने पहले अध्याय ‘आशियां युग‘ में। कोई भी व्यक्ति फ्रांस का इतिहास एवं उसकी क्रांति के बारे में बिलकुल अनभिज्ञ हो, वह भी इसे पढ़ने के उपरान्त भली भॉंति जान जायेगा कि वहां क्राति क्यों हुई? 
क्रांति कैसे शुरू हुई, सामान्य लोगो ने उसमे कैसे भागीदारी की, सम्राट की क्या प्रतिक्रिया हुई, बास्तीय के पतन की विस्तृत जानकारी, साथ में हुई हिंसात्मक क्रियायें, सामंतो का पलायन और नई सुबह का विवरण  दूसरे अध्याय ‘राष्ट्रीय सभा‘ में ऐसे दिया गया है मानो लेखक का ऑंखो देखा हो और पाठक खुद वहॉं मौजूद हो।
पुस्तक का तीसरा अध्याय ‘संविधान सभा‘ हमें ज्ञात कराता है कि हम जो अब के संसद सदन, उनमें बैठने का ढंग  देखते है और दक्षिणपंथी, वामपंथी इत्यादि दलों की बात करते हैं, सब फ्रांस की 1789 की क्रांति से उपजे हैं। एक पुरानी प्रणाली के खतम होने के बाद उसकी जगह एक नयी प्रणाली को स्थापित होते  होते क्या कठिनाइयॉं आती हैं, इस अध्याय में इसका विस्तृत वर्णन है। प्रतिक्रांतिकारियों का विरोध, क्रांतिकारियों का आपसी मतभेद, उनके क्लब, उनकी सेना की गतिविधियॉं, राज परिवार का पलायन, रानी मारी आंत्वानेत को उसके भाई लियोपोल्ड का धोखा देना और फिर लुई-ग्टप्प् का 30 दिसम्बर 1791 को संविधान के प्रति अपनी निष्ठा स्वीकारना सब उस वक्त की परिस्थितियों की कठिनाईयों को दर्शाते हैं, जिन्हें  प्रमोद कुमार ने अत्यन्त सजीव प्रकार से प्रस्तुत किया है।
चौथे अध्याय ‘विधान सभा‘ में लेखक ने अपने सशक्त कलम से उस दौर का विवरण किया है जब क्रांतिकारियों को उभरते हुये आंतरिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनैतिक एवं सामाजिक मुद्दो का सामना करने के साथ-साथ विदेशी शत्रुओं से भी जूझना पड़ रहा था। आस्ट्रिया व हंगरी एवं प्रशिया जैसे राजतंत्रों का आधुनिक लोकतंत्र से युद्ध तो होना ही था परन्तु क्र्रांतिकारी फ्रांस युद्ध के लिये तैयार न था। फ्रांसिसी सैनिको का हारना औरक्रांतिकारियों की उग्रता का बढ़ते जाना साथ-साथ हो रहा था परन्तु 21 सितम्बर 1792 को अविश्वसनीय तरीके से जब बं्रुसविक की सेनाऐं लौट गई और पेरिस बच गया तो क्रांतिकारी नागरिकों में असीम उत्साह एवं आत्मविश्वास भर गया और उसी दिन पेरिस में नव निर्वाचित राष्ट्रीय सम्मेलन का गठन हुआ।
‘राष्ट्रीय सम्मेलन‘ नामक पांचवे अध्याय में लेखक ने यथेष्ट गहराई में जाकर उस सत्र का वर्णन किया है जिसमें राजतंत्र के समापन की घोषणा की गई। क्रांतिकारी जैकोबिन और राजतांत्रिक जीरौंदो का आपसे मतभेद, राजा पर मुकदमा और उसे गिलोतीन पर चढ़ा देना अत्यन्त सजीव रूप से वर्णित किया गया है। लुई की मृत्यु के बाद युरोपियन युद्ध अवश्यंभावी हो गया। ‘प्रथम फ्रांस विरोधी‘ मोर्चा बन गया और क्रांतिकारी फ्रांस के बिरूद्ध युद्ध प्रारम्भ हो गया। जैकोबिन, कम्यून एवं एनरेजेज़ (पागलों) ने एक साथ मिलकर जीरौंदों के विरूद्ध विद्रोह प्रारम्भ कर दिया। आंतरिक युद्ध के कारण फ्रंासीसी गणतंत्र सीमाओं पर पराजित होने लगा, साथ ही फ्रांस की शोचनीय आर्थिक स्थिति ने क्रांतिकारी गणतंत्र के अस्तित्व को संकट में डाल दिया।
छठे अध्याय, ‘आतंक का गणतंत्र‘ में लेखक बताते हैं कि जून 1793 में जो संविधान बना उसमें अन्यायी सरकार के विरोध करने के सामाजिक अधिकार को मान्यता दी गई परन्तु निर्धन नागरिकों के सामाजिक अधिकारों की सुरक्षा नहीं प्रदान की गई थी। 27 जुलाई, 1793 में रोबेसपियर ‘कमेटी आफ पब्लिक सेफ्टी‘ का सदस्य बना और उसने आतंक युग को जन्म दिया। चारो तरफ संदेहास्पद लोगो की गिरफ्तारी और मौते होने लगी। ‘संदिग्धों के अधिनियम‘ को विस्तार से लिखते हुये लेखक ने बड़ी सजीवता से फ्रांस में डर एवं आतंक के माहौल का विवरण किया है, जिसमें अन्ततः रोबेसपियर और उसके समर्थकों को भी गिलोतीन पर मृत्युदंड दिया गया।
क्राति के पतन का वर्णन लेखक ने ‘पटाक्षेप‘ नामक अध्याय में बहुत भली भांति किया है। प्रतिक्रयावादी क्रातिकारी विरोधियों ने किस तरह से जेकोविनो का अत्यन्त हिंसात्मक विरोध किया और कैसे नेपालियन बोनापार्ट जो अपने को ‘क्राति का पुत्र‘ कहता था पूरे फ्रांस का ही नहीं अपितु सम्पूर्ण यूरोप का स्वामी बन गया और फ्रांस ‘क्रांति के युग‘ से ‘सैन्य तानाशाही के युग‘ में पहुँच  गया।
अपने आखिरी अध्याय ‘फ्रासीसी क्रांति और इतिहास लेखन‘ में प्रमोद कुमार ने फ्रांसीसी क्रांति पर लिखी गई अनगिनत पुस्तकों का सामूहित विश्लेषण किया है। एडमंड बर्क के ‘प्रबुद्धतावाद‘ से प्रभावित लेखन से लेकर ‘रोमांसवादी‘ इतिहासकार, ‘उदारवादी‘, ‘प्रत्यक्षवादी‘, ‘सामाजिक यर्थाथवादी‘ एवं ‘आलोचनात्मक‘, ‘मार्क्सवादी‘, ‘भीड़ की मनोवृत्ति‘ इत्यादि सिद्धान्तो के अनुसार अनेकानेक इतिहासकारों ने इस क्रांति पर टिप्पणियां दी हैं। लेखक ने इन सभी की विशेषताओं का विवरण देते हुये उनकी एक विस्तृत सूची दी है कि पाठक अपनी रूचि के अनुसार जो पुस्तक चाहें पढ़ सकते हैं।
प्रमोद कुमार की इस पुस्तक में फ्रांस की क्राति के समस्त ऐतिहासिक तथ्य एक छोटी सी पुस्तक द्वारा प्राप्त हो जाते हैं। इनकी भाषा सरस एवं सजीव हैं और इनकी टिप्पणियॉं अत्यन्त ज्ञानवर्धक एवं रूचिकर हैं। फ्रांसीसी  भाषा के शब्दों के सही उच्चारण लिखकर लेखक ने पाठकों का ज्ञानवर्धन किया है। नेशनल बुक ट्रस्ट एवं लेखक का अपना उद्देश्य है कि फ्रांसीसी क्रांति के बारे में आम इन्सान सब कुछ जान जाएँ और समझ सके और इस उद्देश्य में यह पुस्तक पूरी तरह खरी उतरती है। सामान्य पाठक ही नहीं अपितु इतिहास के विद्यार्थी भी इस पुस्तक से लाभान्वित होंगे क्योंकि इसमें अनेकानेक व्यक्तियों और घटनाओं के वर्णन है जो फ्रांस की क्रांति को जीवन्त कर देते हैं। यह पुस्तक हर तरह से एक रोचक, ज्ञानवर्धक एवं मनोरंजक किताब है।
 
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