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जागेश्वर का मेला

 राजकुमार शर्मा

देहरादून. देवभूमि हिमालय के पावन कोख में भगवान शिव विश्वम्भर नाथ का प्रथम ज्योर्तिलिंग जागेश्वर में स्थित है जागेश्वर का प्राचीन मृत्युंजय मंदिर धरती पर स्थित बारह ज्येार्ति लिंगों के सहित सारे लिंगों का उद्गम स्थल है इसके पौराणिक ऐतिहासिक तथा पुरात्वीय प्रमाण प्रचुर मात्रा में मिलते हैं.यहां की प्राकृतिक बैभव यहंा आने वाले हर पर्यटक,तीर्थयात्री को मंत्र मुग्ध कर लेती है.देवों के देव महादेव यहाँ  आज भी बृक्ष वेश में युगल रूप से मां पार्वती सहित विराजते ऐसी मान्यता को लेकर हजारों श्रद्धालू यंहा हर वर्ष अपनी मनोकामना ले कर खिचा आता है,यहाँ  आने वाले हर श्रद्धालू की मन की मुराद पुरी होती है.भगवान शिव-पार्वती जी का युगल रूप का दर्शन यहंा आने वाला श्रद्धालू इस मंदिर परिसर में ही स्थित नीचे से एक तथा ऊपर दो युगल शाखाओं में स्थित विशाल देवदारू के बृक्ष में करता है जो 62.80 मीटर लम्बा और 8.10 मीटर व्यास का है जिसके अतिप्राचिन हाने की मान्यता भक्तों में प्रबल आस्था को बलवान बनाता है.उत्तराखण्ड के कुमाऊं एंव गढ़वाल का यह प्रदेश सदा से ही देवों का निवास स्थान होने के कारण ही देवभूमि के नाम से जग में विख्यात है.
भारत के सनातन संस्कृति में त्रय देवों में भगवान शिव को महादेव के नाम से पुकारा जाता है,श्वेताश्वर उपनिषद में शिव को उनके विशिष्ठ गुणों के कारण महादेव कहा गया है.हमारे बेदों में केवल प्रकृति तत्व जो जीवन के मूल तत्व हैं.जेसे अग्नि,जल और वायु में ही देवत्व की प्रतिष्ठा की गयी है,वहां  भी शिव को रूद्र नाम से प्रतिष्ठापित किया गया हैवैदिक काल से पूर्व भी शिव का अस्तित्व रूद्र रूप् से था.शिव कालातीत देवता है.वे सदैव लोक मंगल के लिए गतिशील देवता के रूप् में जाने जाते हैं.वे किसी विशेष समय किसी प्रयोजन के लिए अवतार नही धारण करते है.वे अनादि अनन्त हैं.इसी कारण उनके सगुण और निर्गुण दोनो पक्ष विद्यमान है.
हिमालय पर्वत श्रृंखला में कुमाऊं क्षेत्र अपने नैसर्गिक सौन्दर्य के कारण विश्व में प्रसिद्ध है.इस क्षेत्र के अल्मोड़ा नगर से पूर्वात्तर दिशा में पिथैरागढ़ मार्ग पर 36किमी की दूरी पर देवताओं की महानगर जागेश्वर स्थित है.इस स्थान की समुद्रतल से ऊंचाई 1870 मीटर है.देवदारू के घने बृक्षों से घिरी यह सारी घाटी एक मनोहारी तीर्थस्थल है.जागेश्वर में 124 मंदिरों का पुरा समूह ही है जो अति प्राचीन है जिसके चार-पांच मंदिरों में आज भी नित्य पूजन-अर्चन होती है.यहंा स्थित शिव लिंग भगवान शिव का प्रथम ज्योर्ति लिंग के रूप विख्यात हैं.
बरह ज्योर्तिर्लिंगं इस प्रकार है-1-प्रथम श्री सोमनाथ जो सौरास्ट्र के काठियावाड़ में स्थित है.2-श्रीशैल पर्वत जो तमिलनाडू प्रदेश के कृष्णा जिले में कृष्णा नदी के तट पर श्रीमल्लिकार्जन के नाम से दक्षिण के कैलाश पर्वत पर स्थित है.3-मध्यप्रदेश के उज्जयिनी में श्रीमहाकाल के नाम से विख्यात है.4-ऊँ कारेश्वर अथवा ममलेश्वर के नाम से जाने जाते है.5-हैदराबाद के परली में वैद्यनाथ के नाम से विख्यात है.6-पूना से उत्तर भीमानदी के तट पर डाकिनी नामक स्थान में श्री भीमशंकर के नाम से विख्यात हैं.7-तमिलनाडु प्रान्त के रामनद जिले में में सेतुबन्ध श्री रामेश्वरम के नाम से विख्यात हैं.8-दारूकावन अल्मोड़ा के 35 किमी की दूरी पर योगेश अथवा जागेश्वर के नाम से विख्यात है.9;- उत्तरप्रदेश के बाराणसी में बाबा बिश्वनाथ के नाम से विख्यात है. 10-गोदावरी के तट पर नासिक-पंचवटी के निकट श्री त्रयम्बकेश्वर के नाम से विख्यात है.11-देवभूमि हिमालय के केदारखंण्ड में श्री केदारनाथ जी के नाम से विख्यात है.
जगेश्वर में इन मंदिर समूहों  का निर्माण किसने करवाया इस सवाल का जबाब खोजने पर भी नही मिलता किन्तु इन मंदिरों के जीर्णोद्धार का काम राजा शालिवाहन द्वारा अपने शासन काल में करवाया गया था.पौराणिक काल में भारत में कौसल,मिथिला,पांचाल,मस्त्य,मगध,अंग,बंग,चेदि नाम के अनेक राज्य का उल्लेख मिलता है,कुमाउं उसी कौशल राज्य का एक भाग था माधवसेन नाम का सेनवंशी राजा देवों के शासन काल में जागेश्वर आया था,चन्द्र राजाओं की जागेश्वर के प्रति अटल श्रद्धा थी देवचन्द्र से लेकर बाजबहादुर चन्द्र तक के राजाओं ने जागेश्वर को हर तरह से सम्मानित किया.बौद्ध काल में भगवान बदरीनारायण की मूर्ति गोरी कुण्ड में तथा जागेश्वर की देव मूतियां ब्रह्मकुण्ड में कुछ दिनों पड़ी रहीआदि जगत गुरू शंकराचार्य जी ने अपनी दिग्बिजय के यमय इन मूर्तियों की पुनःस्थापना की स्थानीय विश्वास के आधार पर इस मंदिर के शिव लिंग को नागेश लिंग घोषित किया गया.
भगवान शिव ही एक मात्र देवता है जिन्होंन  सदैव मृत्यु पर विजय पायी है.मृत्यु ने कभी भी शिव को पराजित नही किया.इसी कारण उन्हे मृत्युंजय के नाम से पुकारा गया.जागश्वरधाम में मंदिर समूहों में सबसे बिशाल एंव सुंदर मंदिर महामृत्युंजय महादेव जी के नाम से विख्यात है जिसमें पूजन आदि का कार्य उच्चकुल भट्ट ब्राम्हण परिवार के सदस्य षष्टी दत्त भट्ट का परिवार करता है.भट्ट परिवार के विद्वत सदस्य षष्टी जी जटागंगा का वर्णन करते हुए कहते है कि दारूपर्वत के मध्य में मंगलमयी जटागंगा भगवान शंकर की जटाओं से निकल कर प्रवाहित होती है जो गंगा पाप रूपि देवाग्नि को शांत करने वाली है,इसके दर्शन से मानव को मुक्ति मिलती है.इसी परिसर में झांकर सैम महादेव जी के साथ बृद्ध जागेश्वर महादेव,पुष्टि भगवती मां,ऐरावत गुफा,होम कुण्ड,दर्शनीय स्थल है जो धर्म के साथ पर्यटकों को भी आर्षित करते है.
प्रदेश का पर्यटन विभाग की उपेक्षा का दंश झेल रहा यह धाम सावन भर विशाल मेला के कारण श्रद्धालूओं से पटा रहता हैं निंशक सरकार के पर्यटन मंत्री मदन कौशिक जिस तरह पर्यटन विभाग के साथ मजाक कर रहे है उसका जीता जागता नमूना जागेश्वर धाम के मंदिर समूह की उपेक्षा से समझा जा सकता है.16 जुलाई से भक्तों की भारी भीड़ यहा पहंुच रही है.
 
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