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नामवर सिंह की चुप्पी शर्मनाक

 विष्‍णु खरे

विभूति नारायण राय और रवींद्र कालिया के कलुषित गठबंधन के विरुद्ध हिंदी में जो कार्रवाई हुई उसने हिंदी लेखक-लेखिकाओं की ताकतों, कमजोरियों और विरोधाभासों को भी उजागर करने में ‘मदद’ की। लेखिकाएं कपिल सिब्बल से मिलीं लेकिन कोई लिखित ज्ञापन नहीं ले गर्इं जिसमें विभूति नारायण के इस्तीफे या बर्खास्तगी की मांग की गई होती। वे राष्ट्रपति से नहीं मिलीं जिन्होंने कुलपति-पद के उम्मीदवारों की सूची से राय के नाम का अनुमोदन किया था। वे प्रधानमंत्री, उनकी पत्नी और उनकी बेटी से नहीं मिलीं। उन्होंने सोनिया गांधी से मिलने का प्रयास नहीं किया। जो धरना ज्ञानपीठ के सामने दिया गया वह रेस कोर्स रोड, जनपथ और राष्ट्रपति-भवन के सिंहद्वार पर भी दिया जा सकता था।
हम ‘जसम’ की विडंबना की बात कर चुके हैं, लेकिन प्रगतिशील लेखक संघ, जिसके राष्ट्राध्यक्ष नामवर सिंह वर्धा गांधी विश्वविद्यालय में राष्ट्रपति के नामजद कुलाधिपति हैं, की चुप्पी शर्मनाक और निंदनीय है। यदि कुलपति लेखिकाओं को ‘‘छिनाल’’ कह सकता है तो ‘विजिटर्स नॉमिनी’ उसकी सार्वजनिक भर्त्सना अपना नैतिक कर्तव्य समझकर क्यों नहीं कर सकता? उधर हिंदी के कुछ लेखक-लेखिकाएं एक रहस्यमय विवशता में इस पूरे मसले पर या तो चुप हैं, या, जो और भी लज्जास्पद है, राय-कालिया का बचाव या समर्थन कर रहे हैं। इस लेखक ने विभूति राय और रवींद्र कालिया की बर्खास्तगी की मांग करने वाले एक सार्वजनिक पत्र पर दस्तखत किए हैं जिस पर करीब दो सौ हस्ताक्षर और हैं। इनमें शायद हिंदी की सभी विचारधाराओं के प्रतिनिधि होंगे। लेकिन यह कहना कठिन है कि उन सब ने सदिच्छा, ईमानदारी और क्षोभ के साथ इस अभियान में हिस्सा लिया होगा।
वर्तमान हिंदी परिदृश्य ने इतने व्यामोह और मनोविदलता को जन्म दिया है कि हर पार्टनर से उसकी पॉलिटिक्स पूछना अनिवार्य हो गया है। जब मैं इन हस्ताक्षरों को देखता हूं तो कुछ की कोई साहित्यिक पहचान नजर नहीं आती, कुछ कुप्रेरक या दोमुंहे प्रतीत होते हैं और कम-से-कम एक के बारे में मैं ही नहीं, सारा सुधी हिंदी संसार जानता होगा कि वह एक ऐसा ‘बहादुर’ है जो स्त्रियों को छिनाल से भी बदतर समझने में अपनी सिंह-विजय समझता है और मूलत: राय-कालिया बिरादरी का है।
किसी सोद्देश्य हस्ताक्षर-अभियान का अर्थ यह नहीं होता कि उसमें घुसपैठ कर कुछ धूर्त भी सुर्खरू हो लें- उसमें हमेशा एक जानकार, जागरूक ‘मॉडरेटर’ चाहिए। खुशी की बात है कि राय-कालिया टीम का भी एक हस्ताक्षर अभयान सामने आया है, और दुर्भाग्यवश उसमें कुछेक ऐसे समझदार दस्तखत भी हैं जो शायद पुरानी दोस्तियों को निबाह रहे हैं। लेकिन महज कुछेक। इन दोनों अभियानों की सूचियों ने हिंदी साहित्य के इतिहास में पहली बार एक आधारभूत गुणात्मक और नैतिक विभाजन को रेखांकित किया है। कुछ विवेक से काम लेते हुए यदि इन दोनों सूचियों को थोड़ा-सा संशोधित किया जाए तो यह पांडवों-कौरवों या द्वितीय विश्व-युद्ध के ‘एलाइड’ और ‘एक्सिस’ वाले पक्ष बन जाते हैं और इन दोनों पर अगले वर्षों तक एक सख्त नजर रखी जानी चाहिए।
इस मामले के कुछ और पहलू भी जागरूकता की मांग करते हैं। क्या वजह है कि कपिल सिब्बल से मिलने वाली किन्हीं भी लेखिकाओं ने उस मुलाकात का अपना ब्योरा और आकलन नहीं दिया है? कुछ दूसरी लेखिकाओं ने क्यों राय-कालिया का पक्ष लिया है या चुप्पी अख्तियार कर रखी है- हालांकि स्त्री-पुरुष दोनों लेखकों को यह अधिकार भी है कि वे इस मसले को इतना घिनौना समझें कि हलधर बलराम की तरह युद्ध से विरक्त हो जाएं। कुछ लेखक तो इसलिए गूंगे हैं कि वे आगामी वर्षों में स्वयं को ज्ञानपीठ पुरस्कार की ‘शॉर्ट-लिस्ट’ में देख रहे हैं लिहाजा उसकी ‘ब्लैक-लिस्ट’ से बच रहे हैं। यह भी है कि लेखिकाओं का एक बहुत छोटा प्रतिशत अपने ‘कैरिअर’ को गतिशील बनाने के लिए संपादकों, आलोचकों, सहधर्माओं, प्रकाशकों, प्राध्यापकों और निजी तथा सार्वजनिक साहित्यिक-सांस्कृतिक प्रतिष्ठानों के बीच कुछ ज्यादा-ही सक्रिय है- यद्यपि यदि पुरुष लेखक वैसा करते हैं तो स्त्रियां क्यों न करें, लेकिन दक्षिण एशिया में औरत होने की ही ‘ऐसी ट्रेजिडी है नीच’- और मैं समझता हूं कि नारी-गरिमा के लिए कहीं भी अशोभनीय है और नैतिक रूप से संदिग्ध है। महिला- लेखक कम-से-कम पुरुष-लेखकों के पतन का अनुकरण तो न करें। इस प्रकरण में कुछ ब्लॉगों ने सक्रिय, जोशीली, पक्षधर भूमिका निबाही है लेकिन हिंदी का ब्लॉग-विश्व भी अत्यंत संदिग्ध प्रतिक्रियावादियों, कुंठित ‘लेखकों’, ‘पत्रकारों’, ‘पाठकों’, खुदाईखिद मतगारों, प्रगतिविरोधी तत्त्वों और देश के चतुर्दिक पतन से खलसुख प्राप्त करने वालों से बजबजा रहा है।
निस्संदेह कुछ अच्छे, सार्थक, विचारों के उत्तेजक टकराव वाले ब्लॉग भी हैं। लेकिन शेष अधिकांश हिंदी-समाज की गिरावट के प्रतिबिंब ही हैं। एक ही व्यक्ति अनेक नामों या अनामता से स्वयं अपने और दूसरों के ब्लॉगों पर आॅरवेलीय ‘डबलथिंक’ और ‘डबलस्पीक’ का लॅकैरीय ‘मोल’ या ‘डबल एजेंट’ बना हुआ है। कुछ महिलाओं के जाली नामों से लिख रहे हैं। कुल मिलाकर राय-कालिया जैसी उठाईगीर, बाजारू मानसिकता ने ब्लॉग जैसे सशक्त, कारगर माध्यम को कुछ ही समय में बर्बादी के कगार पर ला दिया है। वहां ‘छिनाल’ से भी ज्यादा अश्लीलता और चरित्र-हनन ‘माउस’ की एक ‘क्लिक’ पर कभी-भी, किसी के भी बारे में अवतरित हो सकते हैं। विडंबना यह भी है कि कंप्यूटरदु ि नया हिंदी में आज भी बहुत सीमित है। लेकिन ठीक राय-कालिया और उनकी बिरादरी की तरह कई ब्लॉग-टिटहरियां यह समझ रहीं कि हिंदी भाषा, साहित्य और पत्रकारिता का आकाश जैसा भी है उन्हीं की डेढ़ टांग पर टिका हुआ है। एक अजाचारी, समलैंगिक सुखभ्रांति चतुर्दिक व्याप्त है जिसमें आत्म-रति, अपना और अपने निरीह परिवार का विज्ञापन, गिरोहधर्मा अहोरूपम् अहोध्वनि, रूमानी भावनिकता, भेड़ियाधसान, पर्वतमूषकत्व आदि संचारी भाव हैं। कई ब्लॉग राय-कालिया मामले पर एक मौसेरे भाईचारे में चुप्पी साधे हुए हैं, क्योंकि उनके संचालकों को वृहत्तर अकादमिक और ज्ञानोदय-ज्ञानपीठ परिवार से अनेक आशाएं हैं।
हिंदी में और अखिल भारतीय तंत्र में एक भयावह तत्त्व और है। यदि आप किसी भी क्षेत्र में मनसा-वाचा-कर्मणा वास्तविक नैतिक और विचारधारागत मतभेद रखते हैं तो आप न सिर्फ उस हलके में अवांछित (पर्सोना नॉन-ग्राटा) हो जाते हैं बल्कि आपका एक मौन-अलिखित बहिष्कार कुष्ठ या एड्सग्रस्त या अछूत दलित की तरह शेष हर क्षेत्र में होता जाता है। इसका आतंक अधिकांश भारतीयों को कायर, मौकाशनास, धूर्त और दोमुंहा बना देता है। दुर्भाग्यवश, आज के कठिन-सरल जीवन संघर्ष को देखते हुए अधिकांश युवा उसी की पनाह ले रहे हैं। इसलिए भी कि उनके अधिकांश वरिष्ठों ने उनके सामने कोई बेहतर उदाहरण नहीं रखा।
हिंदी संसार, वह जैसा-जितना है, एक और त्रासद विडंबना से ग्रस्त है कि हिंदी पत्रिकाएं और पुस्तकें ही नहीं, मानीखेज हलचलें भी कोलकाता-मुंबई की हिंदी बिरादरी तक कम या देर से पहुंचती हैं और तब भी उसे विशेष उद्वेलित नहीं कर पातीं। यह भी है कि भोपाल, इंदौर, पटना, इलाहाबाद, बनारस, जयपुर, कानपुर, लखनऊ, शिमला आदि नगरों-कस्बों के हिंदी लेखक, जिनमें खांटी वामपंथी भी शामिल हैं, राय-कालिया से भी कहीं गए- बीते सरकारी-गैरसरकारी सत्ताधारियों के साथ डेली बेसिस पर समझौते करते रहते हैं; महानगरों के शैतानों पर कभी-कभार प्रतीकात्मक पथराव कर देते हैं और छिनाल-जैसे मामलों पर या तो शिशुवत् भोलेपन का अभिनय करते हैं या कह देते हैं कि भैया ये तुम ‘दिल्लीवाले मठाधीशों’ का सत्ता-संघर्ष है, हमें इस कीचड़ में काहे को घसीटते हो, फिर माफी भी तो मांग ली गई है- और उसके बाद ‘ज्ञानोदय’ में रचना भेज कर ‘वर्धा’ का टिकट कटवा लेते हैं। जहां तक आम लुम्पेन हिंदीभाषी का प्रश्न है, राय- कालिया का मानसिक सहोदर होने के कारण वह सार्वजनिक क्षेत्रों में सक्रिय हर महिला को संदिग्ध ही समझता आया है।
यह कल्पना रोमांचक है कि यदि विभूति नारायण ने कार्पोरेट या राजनीतिक विश्व में निम्नोच्च स्तरों पर काम करने वाली महिलाओं को अपने प्रिय विशेषण ‘‘छिनाल’’ से नवाजा होता तो शास्त्री भवन, 7 रेसकोर्स रोड, 10 जनपथ, राष्ट्रपति भवन, तथा सरदार पटेल, बहादुर शाह जफर और कस्तूरबा गांधी के नामों पर रखे गए मार्गों पर क्या प्रतिक्रिया होती, फिक्की और एसोचैम उसके बारे में क्या कहते। यदि विभूति नारायण ने अंग्रेजी, मराठी, बांग्ला, उर्दू, मलयालम आदि भाषाओं की लेखिकाओं की शान में वह कसीदा पढ़ा होता तो नतीजों का तसव्वुर आसानी से किया जा सकता था। महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय का कुलपति उस मराठीभाषी क्षेत्र में बैठकर हिंदी लेखिकाओं को छिनाल कह रहा है जहां हिंदी साहित्य को लेकर अब भी बहुत स्नेह और सम्मान है, जहां चंद्रकांत पाटील सरीखा कवि- आलोचक-अनुवादक हाल ही में दस हिंदी कवयित्रियों को ‘संगिनी’ शीर्षक संग्रह के रूप में अनूदित कर चुका है। यदि विभूति नारायण को मालूम हो जाता तो मराठीभाषियों की चरित्र-रक्षा करने के लिए वे यह संग्रह ही रुकवा देते या उन्हें चेतावनी देने के लिए ‘संगिनी’ की जगह अपना पसंदीदा शब्द ‘बहुवचन’ में रखवा देते।
राय-कालिया जोड़ी ने ऐसा कारनामा अंजाम दिया है कि तीनों के लिए सिर्फ असंसदीय, अमुद्रणीय, घोर अपमानजनक शब्द ही जेहन और कलम की नोक पर आ-आकर लौट रहे हैं। दुर्भाग्यवश ‘ज्ञानोदय’ और ‘ज्ञानपीठ’ का प्रबंधन भी उन्हीं शब्दों को अर्जित करता लग रहा है-पाखंडी शालीनता में यकीन करना ऐसे मामलों को प्रोत्साहित करना ही होगा।
एक और अजीब कैफियत मुझ पर तारी हुई है। वेश्या-गमन से मुझे कोई आपत्ति नहीं है, बल्कि मैं उसे कानूनी वैधता प्रदान करने के पक्ष में हूं ताकि वेश्याओं का अपमान न हो। मुझे स्वयं कभी उन अभागी औरतों की दरकार नहीं हुई। बहरहाल, जो ‘‘बाजारीकरण’’ हमारे आसानीपरस्त, महदूद कहानीकार-कवियों का पिटा हुआ चहेता विषय हो चुका है उसी का विकराल स्वरूप इस शब्द के निर्लज्ज उपयोग और उसके बचाव के पीछे सक्रिय है। हमारे समाज और संस्कृति में बहुत कम गैरत और गुणवत्ता बची थी, बाजारीकरण उनका वेश्याकरण कर रहा है और ठीक इसी तरह साहित्यिक बाजारवाद बचे-खुचे सार्थक, श्रेष्ठ, प्रतिबद्ध लेखन के वेश्याकरण में जुटा हुआ है। जब ज्ञानपीठ का प्रबंधन यह कह रहा है कि रवींद्र कालिया ने ‘ज्ञानोदय’ और अन्य प्रकाशनों की बिक्री बढ़ा दी है, क्षमा मांग ली गई है, इसलिए उनके विरुद्ध और कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। चालीस वर्ष पहले ज्ञानोदय-ज्ञानपीठ की निरामिष आत्मपावनता का यह आलम था कि किसी कहानी आदि में ‘शराब’, ‘अंडा’ और ‘गोश्त’ जैसे शब्द ‘जूस’, ‘आलू’ और ‘पराठा’ में बदल दिए जाते थे। आज पेंडुलम दूसरे आत्यंतिक छोर पर है जब ग्राहक बढ़ाने के लिए छिनाल चलाई जा रही है।
विभूति नारायण और रवींद्र कालिया से इस्तीफा लेना अब इसलिए बेमानी लगता है कि, जहां तक मेरा आकलन है, हिंदी साहित्य में उनकी प्रतिष्ठा यदि कभी थी भी तो आज फूटी कौड़ी की नहीं रह गई है। लेकिन अधिकांश ऐसे प्राणी, उनके सरपरस्त और समर्थक गंडक-चर्म में वाराहावतार होते हैं। उन्हें न व्यापै जगत-गति। फिर जिस समाज में हत्यारे, बलात्कारी, डकैत, स्मग्लर, करोड़ों का गबन करने वाले संसद तक पहुंच रहे हों वहां हिंदी, जो खुद गरीब की जोरू की तरह सबकी भौजाई या साली है, भले ही उसका एक गांधी विश्वविद्यालय हो, उसकी लेखिकाओं को छिनाल कह देना तो एक होली की ठिठोली से ज्यादा कुछ नहीं। हिंदी साहित्य को अब ज्ञानोदय-ज्ञानपीठ से कुलटा, रखैल, समलिंगी, हिजड़ा, ‘निम्फोमैनिएक’ सुपर-विशेषांकों और ग्रंथों की विकल प्रतीक्षा रहेगी। पोर्नोग्राफी के जिस दैत्याकार मार्केट के लिए विदेशी कंपनियां लालायित हैं, ज्ञानपीठ-ज्ञानोदय उसे भारतमाता को कलुषित नहीं करने देंगे। इस तरह वे विदेशी मुद्रा बचाएंगे और खुद कमाएंगे। किसे मालूम कि उससे कभी ज्ञानपीठ पुरस्कार एक करोड़ या उससे भी अधिक का किया जा सके!
क्या हिंदी लेखकों में वह नैतिक बल और संकल्प है कि वे विभूति नारायण और रवींद्र कालिया के रहते हिंदी विश्वविद्यालय और ज्ञानपीठ का बहिष्कार कर सकें? क्या हिंदी के अधिकांश सक्रिय लेखक-लेखिकाएं राय-कालिया जैसी हरकतों के विरुद्ध कोई दृढ़, दीर्घावधि स्टैंड ले सकते हैं? क्या हम हर संभव दरवाजा पीट सकते हैं?
राय और रवींद्र कालिया के सम्मिलित छिनाल कांड ने जिस तरह बेहतर हिंदी लेखकों को जागृत और एकजुट किया है वह एक विडंबनात्मक वरदान है। प्रश्न यही है कि हिंदी के ये सभी स्वाभिमानी और जिम्मेदार लेखक अपमानित मुचकुंद की तरह इस कालयवनद्वय को भस्म कर पाएंगे या वही बने रहेंगे जिसे ‘छिनाल’ की तरह परिभाषित किया जाता रहे- जबकि वेश्या भी रंडी कहे जाने पर एक तमाचा तो मार ही देती है?
जनसत्ता से     
 
साहित्यिक पत्रकारिता का पतन 
विष्‍णु खरे
हममें से लगभग हर एक के साथ ऐसा होता है कि हम कुछ विचारों, वस्तुओं और व्यक्तियों को कभी बर्दाश्त नहीं कर पाते। ये पूर्वग्रह कभी सकारण होते हैं और कभी नितांत निरंकुश, जिनके लिए उर्दू में ‘बुग्ज-ए-लिल्लाही’ जैसा खूबसूरत पद है। हमें कुछ लोगों का जिक्र करने, उन्हें देखने, उनके साथ उठने-बैठने-फोटो खिंचाने, उन्हें अपने घर की दहलीज पर फटकने देने की कल्पना मात्र से घिन आने लगती है। यह खयाल भी हमारा इलाज नहीं कर पाता कि कुछ दूसरे हमजिंस हमारे बारे में भी ऐसा ही सोचते होंगे। बुग्ज की रौनक इसी में है।
‘छिनाल’-ख्याति के विभूति नारायण राय को ही लें। मेरे जानते उन्होंने मेरा कभी कुछ बिगाड़ा नहीं है। उलटे एक बार जब वे किसी वामपंथी सम्मेलन में जा रहे थे, जिसमें मैं भी आमंत्रित था पर अपनी जेब से यात्रा-व्यय नहीं देना चाहता था, तो आयोजक ने मुझसे कहा था कि राय प्रथम श्रेणी में आ रहे हैं और मुझे अपने साथ निष्कंटक मुफ्त में ला सकते हैं। फिर जब वे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति हुए तो वर्धा के एक विराट लेखक-सम्मेलन में उन्होंने मुझे निमंत्रणीय समझा। अपने पूर्वग्रहों के कारण दोनों बार मैं उनके सान्निध्य से बचा।
उन्हें मैं कतई उल्लेखनीय लेखक नहीं मानता था और हाल ही में जब उनकी एक प्रेत-प्रेम कथा में यह पढ़ा कि अर्नेस्ट हेमिंग्वे के उपन्यास 1909 में आना शुरू हो चुके थे तो मेरी यह बदगुमानी पुख्ता हो गयी कि वे मात्र अपाठ्य नहीं, अपढ़ भी हैं। उनके आजीवन संस्थापन-संपादन में निकल रही एक पत्रिका उनके मामूली औसत मंझोलेपन का उन्नतोदर आईना है और उनके संरक्षण में उनके विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित की जा रही तीनों पत्रिकाएं अधिकांशत: नामाकूल संपादकों के जरिये हिंदी पर नाजिल हैं, हालांकि उनमें से एक में मेरी कुछ शंकास्पद कविताओं के अन्यत्र प्रकाशित शोचनीय अंग्रेजी अनुवाद दोबारा छपे हैं।
यह सोचना भ्रामक और गलत होगा कि जो ख्याति विभूति नारायण ने ‘छिनाल’ के इस्तेमाल से हासिल की है, वह नयी है। उनके वर्धा कुलपतित्व (‘पतित’ के साथ अगर श्लेष लगे तो वह अनभिप्रेत समझा जाए) के पहले भी उन्हें लेकर अनेक अनर्गल किंवदंतियां थीं जिनका संकेत भी देना भारतीय दंड संहिता की मानहानि-संबंधित धाराओं को आकृष्ट कर लेगा; हालांकि उन्हें लेकर मुद्रणेतर माध्यमों में जो कुछ कहा जा रहा है, उस पर अगर वे अदालत गये तो उन्हें अपना शेष जीवन वकीलों के चैंबरों के पास पोर्टा कैबिन सरीखे किसी ढांचे में रह कर बिताना होगा।
गनीमत यह है कि हिंदी लेखिकाओं के लिए उन्होंने ‘छिनाल’ शब्द कहा ही नहीं है, उसे छपवाया भी है, उस पर बावेला मचने पर लोकभाषाओं और असहाय प्रेमचंद के हवालों से उसके इस्तेमाल का बचाव किया है – यानी उसे कबूल किया है – और अंत में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के राष्ट्रीय स्तर पर एक खेले-खाये नौकरशाह की तरह सरकारी यदिवादी मुआफी भी मांग ली है। अपने कायर मगर चालाक त्वचारक्षण में कपिल सिब्बल और विभूति नारायण की मिलीभगत कामयाब रही – लाठी भी नहीं टूटी और शास्त्री भवन की इमारत खतरनाक, कुपित सर्पिणियों से खाली करवा ली गयी।
इसे क्या कहा जाए – ‘एंटी क्लाइमैक्स’, ‘इंटर्वल’, ‘हैपी एंडिंग’, ‘ट्रेजडी’, ‘फार्स’ या ‘बेकेट-ग्रोतोव्स्की-प्रसादांत’? क्या यह मसला सिर्फ एक बदजुबान, बददिमाग कुलपति-निर्मित-आईपीएस की सार्वजनिक मौखिक-लिखित अशिष्टता का था, जिसे खुद को लेखक-बुद्धिजीवी समझने की खुशफहमी भी है, जिसकी नाबदानी फासिस्ट फूहड़ता को रफा-दफा और दाखिल-दफ्तर कर दिया गया है?
इस मामले को ‘विभूति नारायण बनाम हिंदी लेखिकाएं’ मानना सिर्फ आंशिक रूप से सही होगा। हम इस अस्तित्ववादी बहस में यहां नहीं पड़ना चाहते कि तमाम महानतम विचारों, आस्थाओं और व्यक्तित्वों के बावजूद मानवता लगातार एक आत्महंता पतन का वरण ही क्यों करने पर अभिशप्त दीखती है, लेकिन यह एक कटु, निर्मम सत्य है कि समूचे भारत के सुकूत के बीच हिंदीभाषी समाज, उसकी संस्कृति(यों), हिंदी भाषा और साहित्य की उत्तरोत्तर अवनति और सड़न अब शायद दुर्निवार और लाइलाज है – बल्कि यह तक कहा जा सकता है कि दक्षिण एशिया के वर्तमान सांस्कृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक पतन के लिए मुख्यत: हिंदीभाषी समाज, यानी तथाकथित हिंदी बुद्धिजीवी, जिम्मेदार और कुसूरवार हैं।
प्राइमरी स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक, रेडियो, टेलीविजन, सिनेमा, मुद्रित समाचार जगत, अकादेमियां, प्रकाशक, पुस्तकखरीद संस्थाएं, संस्कृति संसार, केंद्रीय और प्रांतीय सरकारों के मंत्रालय और विभाग, विधायिका-कार्यपालिका-न्यायपालिका – जहां भी हिंदी में या हिंदी का काम हो या नहीं हो रहा है, वहां के सारे हिंदी-उत्तरदायी इसके अपराधी हैं। हिंदीभाषी निम्न-उच्च और मध्यवर्ग भी इसके लिए कम दोषी नहीं।
यह मैं मानता हूं कि सर्जनात्मक साहित्य में कभी-कभी कथित अश्लील भाषा और चित्रण के बगैर लेखक का काम चल नहीं सकता, हालांकि उनके बिना भी सार्थक साहित्य लिखा ही जा रहा है। लेकिन गैर-रचनात्मक लेखन में लेखक को उससे बचना चाहिए, विशेषत: जब वह किन्हीं व्यक्तियों और समूहों को लेकर अपनी कोई धारणा व्यक्त कर रहा हो।
यह सही है कि विभूति नारायण ने अपना अधिकांश कार्यकाल एक ऐसे महकमे में काटा है जिसमें अश्लीलतम गालियां देना और सुनना पेशे का अनिवार्य और स्पृहणीय अंग है। लेकिन अगर एक ओर आपको यह भ्रम हो कि आप एक वाम समर्थक-समर्थित लेखक हैं – देखिए कि जन संस्कृति मंच ने उन्हें लेकर कैसे दो परस्पर-विरोधी जैसे बयान जारी किये हैं, जिनमें से एक को जाली बताया गया था – और दूसरी ओर गांधीजी (जिनके दुर्भाग्य का पारावार नजर नहीं आता) के नाम पर खोले गये हिंदी भाषा और साहित्य के अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति, तो आपको हिंदी को लेकर ‘बा मुहम्मद होशियार’ जैसा लौह-नियम जागते-सोते याद रखना चाहिए।
लेकिन, ‘जिन्हें देवता बर्बाद करना चाहते हैं पहले उन्हें विकल मस्तिष्क कर देते हैं’ वाली यूनानी कहावत के मुताबिक हमारे कुलपति का दिमाग लेखक होने के उनके वहम और वामपंथियों के अपनी वर्दी की कई जेबों में होने की खुशफहमी ने तो खराब कर ही दिया होगा, हिंदी कुलपति होने की सत्ता के कारण राष्ट्रव्यापी अधिकांश हिंदी प्राध्यापक-लेखक-प्रकाशक गुलामी जो उन्हें अनायास प्राप्त हो गयी उसने उन्हें विभूति-विभ्रम (‘डिल्यूजंस ऑफ ग्रैंड्योर’) का आखेट बना डाला। हम अधिकांश हिंदी विभागों की गलाजतों को जानते ही हैं। स्वयं गांधी विश्वविद्यालय में सैकड़ों पद और छात्रवृत्तियां हैं, एमलिट, एमफिल, पीएचडी के निबंध-प्रबंध हैं, अपने अपने रुझान के उपयुक्त छात्र-छात्राएं हैं, लेखक-लेखिकाओं को बुलाने के लिए सारे बहाने और बहकावे-बहलावे हैं।
आप ‘एक्सपर्ट’ बन कर किस-किस को कहां-कहां कैसे-कैसे सेलेक्ट और रिजेक्ट नहीं कर सकते। प्रकाशक-मुद्रक-संपादक-कागज व्यापारी आपके बूट चूमने लगते हैं। हिंदी की सारी दुनिया आपके लोलुप लोचनों में छिनाल से कम नहीं रह जाती। हिंदी का प्राय: हर व्याख्याता, रीडर या प्रोफेसर इन्हीं फंतासियों में जीता है और उन्हें चरितार्थ करने में सक्रिय रहता है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अब जो कल्पनातीत और अधिकांशत: अपात्र वेतनमान लागू हैं, उनके कारण प्राध्यापक वर्ग में हिंदी के शुद्ध मसिजीवी लेखकों के प्रति हिकारत और बढ़ गयी है। सभी जानते हैं कि हिंदी विभागों में कई दशकों से यौन-शोषण चल रहा है, जो अक्सर दबा-छिपा दिया जाता है।
हम यह न भूलें कि ऐसे लोगों ने वे भी पाल रखे हैं, जिन्हें लीलाधर जगूड़ी के एक पुराने मुहावरे में ‘पुरुष-वेश्या’ ही कहा जा सकता है। अनेक हिंदी विभाग दरअसल ऐसी ही ‘अक्षतयोना’ पुरुष-वेश्याओं के उत्पादक चकले बन गये हैं, जहां कायदे से ‘कामायनी’ न पढ़ा कर ‘कुट्टनीमतं काव्यं’ पढ़ाया जाना चाहिए। एक छोटा-मोटा दस्ता रामचंद्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी युगों से ही उठ खड़ा हुआ था, फिर नंददुलारे वाजपेयी, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, नगेंद्र आदि के उप-युगों से होता हुआ अब नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, मैनेजर पांडे, पुरुषोत्तम अग्रवाल से गुजरता हुआ सुधीश पचौरी और अजय तिवारी जैसे अकादेमिक बौने छुटभैयों तक एक अक्षौहिणी में बदल रहा है।
देश के अन्य विश्वविद्यालय केंद्रों की कैसी दुर्दशा होगी यह सहज ही समझा जा सकता है – वहां यही लोग तो ‘एक्सपर्ट’ बन कर अपने तृतीय से लेकर अंतिम श्रेणी के भक्तों को तैनात करते हैं। अल्लाह ही बेहतर जानता है कि सूडो-नामवर सिंह होने की महत्त्वाकांक्षा रखने वाला एक हिंदी प्रोफेसर केंद्रीय सेवाओं के कूड़ेदान के लिए किस कचरे का योगदान कर रहा होगा। हिंदी की साहित्यिक संस्कृति का एक अनूठा आयाम यह भी है कि प्राय: सभी लेखक और प्रकाशक आपस में मित्र या शत्रु हैं, इन दोस्तियों और दुश्मनियों में भले ही बराबरियां न हों, ये संबंध अकादमिक दुनिया तक भी पहुंचते हैं और लगातार बदलते रहते हैं। इनमें एक वर्णाश्रम धर्म और वर्ग विभाजन भी है, नवधा-भक्तियां हैं, संरक्षकत्व, अभिभावकत्व, मुसाहिबी, चापलूसी, दासता आदि जटिल तत्त्व शामिल हैं। इसमें छोटी-बड़ी पत्रिकाओं के संपादकों की भूमिकाएं भी हैं, मगर बड़ी पत्रिकाओं के प्रकाशकों संपादकों के पास अधिक सत्ता है।
यह इसलिए है कि यों तो अपना नाम और फोटो छपा देखने की आकांक्षा पिछले साठ वर्षों से ही देखी जा रही है, पर लेखकों में फिर भी कुछ हया, आत्मसम्मान और स्व-मूल्यांकन के जज्बात बाकी थे। दुर्भाग्यवश अब पिछले शायद दो दशकों से हिंदी के पूर्वांचल से अत्यंत महत्त्वाकांक्षी, साहित्यिक नैतिकता और खुद्दारी से रहित बीसियों हुड़ुकलुल्लू-मार्का युवा लेखकों की एक ऐसी पीढ़ी नमूदार हुई है, जिसकी प्रतिबद्धता सिर्फ कहीं भी किन्हीं भी शर्तों पर छपने से है। ‘अकविता आंदोलन’ के बाद साहित्यिक मूल्यों का ऐसा पतन सिर्फ इधर की कहानी और कविता दोनों में देखा जा रहा है। पत्रिका-जगत में ऐसे सरगनाओं जैसे संपादकों का वर्चस्व है, जो अपने-अपने लेखक-गिरोह तैयार करने के लिए साम-दाम-दंड-भेद के इक्कीसवीं सदी के संस्करणों का निर्लज्ज इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि प्रतिभाशाली, संयमी, विवेकवान और साहसी युवा, प्रौढ़ और वरिष्ठ लेखक-लेखिकाएं बचे ही नहीं, मगर ग्रेशम के नियम के साहित्यिक संस्करण में खोटे सिक्कों ने वास्तविकों को बचाव-मुद्रा में ला दिया है जो अंतत: श्रेयस्कर ही है।
विभूति नारायण का छिनाल-प्रकरण अकादमिक-लेखकीय-संपादकीय मिलीभगत (‘नैक्सस’) के बिना संभव न होता। ‘नया ज्ञानोदय’ के संपादक रवींद्र कालिया विभूति नारायण से कम मीडिऑकर लेखक हैं या अधिक, यह बहस का मसला नहीं है, लेकिन दोनों मिल कर एक अनैतिक साहित्यिक-सत्ता का प्रदर्शन करना चाहते थे। ‘ज्ञानोदय’ दरअसल कितना छपता है इसका कुछ अंदाज हमें है; लेकिन बेशक कालिया ने उसमें और ज्ञानपीठ प्रकाशन में अपनी ‘वल्गर’ प्रतिभा से कुछ अस्थायी प्राण जरूर फूंके हैं। हम यह भी जानते हैं कि ज्ञानपीठ का प्रबंधन मूलत: राजनीतिक हवामुर्ग रहा है। कालिया अपने कांग्रेसी रिश्तों की वजह से ज्ञानपीठ में हैं, यह न तो ठीक-ठीक जाना जा सकता है और न उसकी जरूरत है।
मुझे शांतिप्रसाद-रमा जैन और लक्ष्मीचंद्र जैन के युग का ज्ञानोदय और ज्ञानपीठ याद हैं – वर्तमान निजाम को उसकी शर्मनाक अवनति ही कहा जा सकता है। लेकिन हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता का उत्थान और पतन मुंबई के ‘धर्मयुग’ और ‘सारिका’ से होता हुआ नया ज्ञानोदय तक देखा जा सकता है। कुछ संपादकों ने मुख्यत: कहानी को स्त्रियों का शिकार करने की विधा में बदल दिया और रवींद्र कालिया उसी परंपरा की सड़ांध-भरी तलछट हैं। उन्हें दो बड़ी सुविधाएं हैं; उनके पास एक पत्रिका है, एक प्रकाशन-गृह है जिनके प्रबंधक साहित्य को सिर्फ बिक्री के तराजू में तौलना जानते हैं और उन्हें एक ऐसा लेखक-समाज मिला है जो अधिकांशत: किसी भी नैतिक कीमत पर सिर्फ छपना चाहता है।
साहित्यिक पत्रकारिता में बाजारवाद ‘धर्मयुग-सारिका’ से शुरू हुआ था जो अब अन्य पत्रिकाओं के अलावा ‘ज्ञानोदय-ज्ञानपीठ’ में पूर्ण-कुसुमित महारोग का विकराल रूप ले चुका है। अपनी सत्ता और सफलता से राय-कालिया गठबंधन इतना प्रमादग्रस्त हो गया था कि उसने सोचा कि वह हिंदी समाज में ‘छिनाल’ को भी निगलवा लेगा, पर वह उसके गले की हड्डी बन गया।
जनसत्ता से साभार 
 
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