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15 अगस्त 1947 का टाइम्स

 राजकुमार सोनी

आज मैं जिला पंचायत में अध्यक्ष रहे अपने मित्र अशोक बजाज से मिलने गया था. इधर-उधर की चर्चाओं के बाद श्री बजाज ने मुझे द टाइम्स आफ इंडिया की फोटो प्रति भेंट की। यह फोटो प्रति कई मायनों में ऐतिहासिक निकली. दरअसल जिस अखबार की फोटो प्रति दी गई थी वह उस रोज प्रकाशित हुआ जब देश आजाद हुआ था। 15 अगस्त 1947 को खुली हवा में सांस लेने का दिन शुक्रवार था। बांबे से निकले टाइम्स आफ इंडिया की कीमत दो आने थी। इस अखबार में जो सबसे खास बात थी वह यह थी कि पंडित जवाहरलाल नेहरू को पहली खबर के लायक समझा गया था। ऐसा नहीं था कि प्रथम पृष्ठ में महात्मा गांधी का जिक्र नहीं था. अपने बापू का भी एक खबर में उल्लेख था लेकिन सिंगल कालम में उनके बारे में यह बताया गया था कि वे उपवास रख रहे हैं। अखबार का यह पृष्ठ यह साबित करता है कि भारतीय मीडिया प्रारंभिक दिनों से सत्ता के करीब रहने का गुर जानता था।
सच तो यह है कि कुछेक संस्थानों को छोड़ दे तो मीडिया आज भी सत्ता की चौखट पर याचक की मुद्रा में खड़ा हुआ ही नजर आता है। किसी को सत्ता से विज्ञापन चाहिए तो किसी को तेल का कारखाना खोलने के लिए जमीन। नवधनाढ्य सेठ-साहूकारों ने जब से अखबार का धंधा खोला है तब से उनकी जरूरतें भी बेहद पूंजीवादी हो गई है। अभी कुछ दिनों एक चैनल में काम करने वाले मेरे एक मित्र ने जानकारी दी कि छत्तीसगढ़ में एक व्यापारी ने सिर्फ इसलिए चैनल प्रारंभ किया क्योंकि उसे बड़े सम्मान के साथ सीएम हाउस में प्रवेश नहीं मिल पा रहा था। चैनल खोलने के बाद व्यापारी के यहां काम करने वाले इसलिए परेशान हो गए है क्योंकि अब सीएम हाउस का प्रवेश भी प्रतिबंधित हो गया है और राजभवन में जाने के लिए तो डेली का पास बनता ही नहीं है। खैर आप अखबार को देखिए और विचार करिए कि जिस मीडिया को आप लोकतंत्र का चौथा खंबा समझ रहे हैं वह खंबा क्या सचमुच में सीधा खड़ा है।
 
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